Friday, April 1, 2011

लीडरशिप-महेन्द्र सिंह धोनी से सीखिए

  • सुधीर मिश्र
खुद को एक बेस्ट लीडर या सर्वश्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता के तौर पर कैसे विकसित किया जाए? यह सीखें, रांची के साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले असाधारण महेन्द्र सिंह धोनी से। याद कीजिए 2005 के उस धोनी को। श्रीलंका के खिलाफ 183 रन की पारी खेली थी। शतक मारने के बाद बल्ले को बंदूक की तरह आसमान की ओर तानते हुए फायरिंग की मुद्रा में धोनी के फोटो छपे थे। यह उनका आगाज़ था। उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ तक जॉन अब्राहम सरीखी उनकी जुल्फों पर फिदा थे। ठीक दो साल बाद धोनी भारतीय टीम के उपकप्तान बने। एक अच्छे लीडर या नेतृत्वकर्ता का गुण होता है कि वक्त के हिसाब से खुद को बदले। जिम्मेदारी मिलते ही सबसे पहले उन्होंने न केवल अपने बाल कटवाए बल्कि खेलने का तौर-तरीका भी बदल दिया। यह जिक्र इसलिए क्योंकि तब तक विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री में धोनी की ब्रान्डिंग एक ग्लैमरस क्रिकेटर के तौर पर हो चुकी थी। इसके बावजूद आसमान की ऊंचाइयों के सपने देखने वाले धोनी ने अपने व्यक्तित्व को एकदम बदल डाला। फिर उन्हें कप्तानी मिली। वर्ष 2007 के आईसीसी ट्वन्टी-ट्वन्टी कप में उन्हें ..कैप्टन कूल.. का तमगा मिला। धोनी घिसी-पिटी रवायतों या तौर-तरीकों पर नहीं चलते। उनमें हालात को सूंघने और बेखौफ साहसिक फैसले करने की अद्भुत क्षमता है। कई उदाहरण हैं जब उन्होंने विशेषज्ञों की आलोचनाओं को दरकिनार किया। मसलन ट्वेंटी-20 कप के फाइनल में जोगिंदर शर्मा को आखिरी ओवर देना। या फिर आर.अश्विन जैसे अपने बेस्ट बॉलर की कीमत पर वल्र्ड कप के सेमीफाइनल में आशीष नेहरा को लेना, जिन्हें साउथ अफ्रीका से मिली हार का जिम्मेदार माना गया था। अपनी टीम व खिलाडिय़ों का मनोबल बढ़ाने में शायद ही कोई पूर्ववर्ती कप्तान उनके बराबर हो। ट्वन्टी-ट्वन्टी कप जीतने के बाद जहां पूरी टीम जोश से भरकर नाच रही थी, वहीं धोनी बेहद शांत थे। कप लेने के बाद उन्होंने इसे अपने युवा खिलाडिय़ों के हवाले कर दिया। इस जीत के बाद मुंबई में खुली बस पर निकले विजय जुलूस में भी श्रीसंत व युवराज डांस कर रहे थे। भगाी व सहवाग भी मस्ती में थे पर धोनी वहां भी एकदम शांत व संयत। जश्र मनाने का सारा मौका वे हमेशा अपनी टीम को देते रहे। रही बात खुद के प्रदर्शन की तो वन डे हो या टेस्ट या फिर ट्वन्टी-ट्वन्टी। हर जगह उन्होंने अपनी श्रेष्ठता को टीम के सदस्यों के लिए प्रेरणा बनाया। वह 2008 व 09 में आईसीसी के प्लेयर ऑफ द ईयर रहे। विजडन की ड्रीम टीम के लिए भी उन्हें कप्तान घोषित किया गया था। बेहद शांत व संयत होने के बावजूद वे एक आक्रामक कप्तान हैं। यह सही है कि इंग्लैंड के खिलाफ लाड्र्स में जीत के बाद पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली ने टी-शर्ट उतारकर जो आक्रामकता दर्शायी थी, वह अभूतपूर्व थी लेकिन धोनी उससे कहीं आगे निकल चुके हैं। माही की आक्रामकता उनकी बॉडी लैंग्वेज में नहीं बल्कि फैसलों में दिखती है। मीडिया से मुखातिब होने में उनका जवाब नहीं। एक-एक शब्द नपा-तुला। फिजूल की बयानबाजी नहीं। विवादों को कभी तूल नहीं देते। सहवाग के साथ मतभेद की खबरें भी उनके रवैये के कारण शांत हो गईं। एक खिलाड़ी और कप्तान के अलावा जबरदस्त व्यावसायिक सोच भी उनकी क्षमताओं में चार चांद लगाती है। वह पंद्रह से अधिक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के लिए मॉडलिंग करते हैं। शाहरूख खान के साथ स्टेज शो में नाचते हैं और देश में सबसे ज्यादा इनकम टैक्स अदा करने वालों में शुमार किए जाते हैं। अब वल्र्डकप के फाइनल में धोनी अपनी टीम को पहुंचा चुके हैं। टीम जीते या हारे पर इतना तय है कि महेन्द्र सिंह धोनी देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए आदर्श बन चुके हैं जो छोटे या मझोले शहरों में अपनी दुश्वारियों के बीच आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचने का ख्वाब देखते हैं।