Thursday, December 31, 2015

लाल लकीर पर चहलकदमी का बैलेंस


 उपन्यास-लाल लकीर लेखक - ह्रदयेश जोशी
प्रकाशक-हार्पर इंडिया
मूल्य  - तीन सौ पचास रुपए

 ह्दयेश जोशी के इस उपन्यास में कहीं लिखा है- इस लाल लकीर के पीछे रहे तो पुलिस की हिंसा और अगर लकीर को पार किया तो क्रान्तिकारियों की हिंसा। हम इस लकीर के गुलाम हैं-
यह तकलीफ है, बस्तर और छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित इलाके में रहने वालों की। उनके लिए यह बेहद मुश्किल है कि वह सत्ता और नक्सलियों के बीच की इस विभाजक रेखा के दरम्यां रहकर एक संतुलन कायम रख सकें। यही दिक्कत अखबारनवीसों, साहित्यकारों और लेखकों के लिए भी है। ह़दयेश ने नक्सलवाद जैसे बेहद संवेदनशील मसले पर उपन्यास लिखने में गजब का हुनर दिखाया है… लाल लकीर पर चलते हुए बैलेंस बनाने का। उपन्यास पढ़ने के बाद आप यह कतई बता पाने की स्थिति में नहीं होंगे कि लेखक लकीर के इधर है या उधर।
नक्सली समस्या पर किताब लिखना आसान नहीं। ज़रा सी चूक हो जाए तो लेखक को तरह तरह के तमगों से सुशोभित किए जाने का रिस्क होता है पर आप लाल लकीर को पढ़िए। लेखक ने इस खूबसूरती से लिखा है कि पाठक सिर्फ बस़्तर और छत्तीसगढ़ को जीना शुरू कर देता है। जोशी ने इसे रस्सी पर चलने वाले उस नट की तरह लिखा है जो बैलेंस बनाए रखने में निपुण है। नॉवेल खत्म होने के बाद याद रहते हैं तो सिर्फ उ
पन्यास के चरित्र। भीमा, रामदेव, रेड्डी, सुरी और दूसरे छोटे बड़े किरदार। उनके इर्द गिर्द बुना गया कथानक वास्तव में पिछले पंद्रह बरसों के दौरान बस्तर में घटित घटनाओं का निचोड़ है। इसमें नायक नायक नहीं नजर आता और विलेन खलनायक नहीं। आप किसी भी चरित्र से बहुत ज्यादा प्यार या घृणा नहीं कर सकते। सब अपने-अपने चरित्र को बिना लागलपेट जीते नजर आते हैं। चूंकि हृदयेश एक टीवी जर्नलिस्ट रहे हैं, बहुत सी घटनाओं को उन्होंने खुद मौके पर जाकर कवर किया है और बहुत से चरित्र ऐसे हैं जिनसे वास्तव में वह खुद रूबरू हुए हैं तो जाहिर है उनके लेखन में जीवंतता तो होगी ही और वह है भी।

मैने बस्तर, छत्तीसगढ़ और नक्सलवाद के बारे में यह पहली किताब पढ़ी। इससे पहले अखबारों, टीवी चैनल और फिल्मों के जरिए ही इन जगहों के बारे में जाना था। कभी गांव वालों का मारा जाना तो कभी नक्सलियों का। कभी सीआरपीएफ कैंप पर हमला तो कभी नेताओं के काफिले को उड़ा देना। पाठकों को इनकी जानकारी तो न्यूज के जरिए मिलती रही है। ह़दयेश का नॉवेल लाल लकीर आपको वहां के हालात में जीने का मौका देता है। यह हकीकत के करीब ले जाता है। बताता है कि सच के अपने अपने वर्जन होते हैं। कभी कभी हर पक्ष एकसाथ सच भी होता है और झूठ भी। हॉपर्र कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया ने यह उपन्यास मुझे तीस दिसम्बर 2015 की दोपहर कूरियर के जरिए भेजा था। यकीन मानिए हाथ में आते ही मैने इसे पढ़ना शुरू किया और रात नौ बजे तक खत्म कर दिया। ऐसा मेरे पढ़ने की रफ्तार या शौक की वजह से नहीं बल्कि उपन्यासकार की सजीव लेखनी की वजह से हुआ। एकदम किसी फिल्म की स्क्रिप्ट या पटकथा की तरह, जिसे फिल्मी पर्दे के बजाए एक किताब में उतारा गया हो। उपन्यास के संपादन में काफी ज्यादा कसावट है। नॉवेल में कहीं भी झोल नजर नहीं आते। यह बोर नहीं करता। वर्तनी और व्याकरण की कोई गलती भी नजर नहीं आई। यकीनन इसके लिए पब्लिकेशन और उसके एडिटर बधाई के पात्र हैं। ह्दयेश की तारीफ तो करनी ही होगी। वह एक पत्रकार हैं और संवेदनशील इंसान भी। उनका उपन्यास लाल लकीर इसका प्रमाण है।

Tuesday, December 29, 2015

फिल्म रिव्यू पर भरोसा करता तो बाजीराव देख ही न पाता

हाल ही में एक अखबार में जयप्रकाश चौकसे का फिल्म रिव्यू पढ़ा। फिल्म बाजीराव मस्तानी के बारे में। चूंकि काफी अरसे से उनको पढ़ता रहा हूं तो लगा जो लिखा है, सही ही होगा। रिव्यू पढ़कर लगा कि काफी कमजोर फिल्म है, नहीं देखनी चाहिए। फिर भी एक दोस्त ने कहा तो देखने पहुंच गया। यकीन मानिए बड़ी कोफ्त हुई चौकसे जी के रिव्यू के बारे में सोचकर। यह ठीक है कि संजय लीला भंसाली की यह फिल्म हम दिल दे चुके सनम जैसी नहीं, पर यकीन मानिए उन्हीं की देवदास से कहीं बेहतर है। मैं दावे से कह सकता हूं कि एक बार देखने के लिए लिहाज से फिल्म अच्छी है। खैर चौकसे जी का अपना आकलन है और मेरा अपना।
आइए बात करते हैं फिल्म की खूबसूरती के बारे में। यकीनन रणवीर, दीपिका और प्रियंका तीनों ने गजब ढाया है। एक योद्धा, एक प्रेमी और पति तीनों ही रोल में रणवीर छाये हुए हैं। मुझे पूरा यकीन है कि सर्जरी और झुर्रियों से भरे सलमान, आमिर और शाहरूख के लिए अब जल्द ही करैक्टर आर्टिस्ट के रोल गढ़े जाने लगेंगे। खुद के प्रोडक्शन हाउसेज में वह जरूर हीरो बन रह सकते हैं। बतौर हीरो अब आने वाला वक्त रणवीर जैसे स्टार का ही होगा। शारीरिक सौष्ठव और डॉयलाग में भी रणवीर अब कमजोर नजर नहीं आते। हालांकि फिल्म में बाजीराव का नृत्य करना कुछ अखरा पर हिन्दी फिल्म है, मसाले तो डालने ही पड़ेंगे। दीपिका और प्रियंका के रोल की तुलना हम देवदास की ऐश्वर्या और माधुरी दीक्षित से करें तो भी बाजीराव भारी पड़ती है। दीपिका और प्रियंका दोनों ने ही बेहतरीन एक्टिंग की हैं और दोनो ही बराबर से खूबसूरती लगी हैं। अलग अलग हिस्सो में कहीं प्रिंयका बीस नजर आती हैं तो कहीं दीपिका।

भंसाली ने मराठा इतिहास के इस हिस्से पर बेहतरीन स्क्रिप्ट लिखवायी है। इतिहास की बेहतर समझ  न रखने वालों को भी फिल्म को समझने में कोई खास दिक्कत नही होगी। हां संगीत के मामले में जरूर संजय लीला अपनी पुरानी फिल्मों को नहीं छू पाए हैं। हम दिल दे चुके और देवदास का म्यूजिक ज्यादा बेहतर था। दूसरी खटकने वाली बात सपोर्टिंग स्टार्स के रोल का ठीक से न उभर पाना है। आप शोले, मुगल ए आजम या थ्री इडियन जैसी किसी भी सुपर डुपर हिट फिल्म को देखिए। उसमें छोटे से छोटे रोल को भी उभारा गया। असल में फिल्म तभी ब्लॉक बस्टर होती है जब उसमें पूरी टीम सौ फीसदी करती नजर आए। खैर इसलिए यह फिल्म वन टाइम वॉच है, सभी का काम बेहतर होता तो यकीनन बहुत बड़ी हिट होती बाजीराव मस्तानी। खैर मै कोई फिल्म समीक्षक तो हूं नहीं। मैने वो लिखा जो मुझे लगा। जरूरी नहीं कि आपको पसंद आए। हां इतना जरूर कहूंगा कि समीक्षकों को जरूर पब्लिक पल्स समझनी चाहिए। जरूरी नहीं कि जो फिल्म उन्हें पसंद न आए वह आम लोगों को भी पसंद नहीं आएगी।

Sunday, December 27, 2015

मुकरी और नेतागीरी की ठुमरी


हाल ही में गांव से आए एक युवा से मुलाकात हुई। पूछने लगा कि डीडीसीए को लैपटॉप किराए पर कैसे दिए जाते हैं ? मैंने साफ कहा नहीं मालूम तो बेचारा मायूस हो गया। कहने लगा-अखबारों में पढ़ा कि दिल्ली क्रिकेट असोसिएशन वाले सोलह हजार रुपये रोज पर लैपटॉप किराए पर लेते हैं। मेरे दिमाग की भी अचानक बत्ती जली। फिर मन में सवाल उठा कि काले अंग्रेज कौन हैं? कुछ साल पहले अन्ना आंदोलन के दौरान यह नारा चला था कि काले अंग्रेजों भारत छोड़ो। हुआ यूं कि उस युवा से बातचीत से कुछ देर पहले ही इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के बारे में कुछ पढ़ रहा था तो नजर पड़ी भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की लिखी कुछ लाइनों पर। वहां लुटेरों के संदर्भ में अंग्रेजों का जिक्र था। उन्होंने लिखा था-

भीतर भीतर सब रस चुसै । हँसि हँसि का तन मन धन मूसै । 

जाहिर बातन मैं अति तेज । क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।

पढ़ते ही समझ में आ गया कि इशारा किस तरफ था। आज से डेढ़ सौ साल पहले यकीनी तौर पर अंग्रेजों की छवि हमारे देश में लुटेरों की थी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने जो लाइनें लिखी थीं, वह दो सहेलियों की बातचीत पर आधारित हैं। एक सहेली दूसरी से किसी ऐसे शख्स के बारे में बता रही है जो मीठी-मीठी बातें करने वाला धोखेबाज और धूर्त है। उस शख्स की तुलना अंग्रेज से की गई है। भारतेन्दु ने साहित्य की जिस विधा में यह लाइनें लिखी हैं उन्हें मुकरी कहते हैं। मुकरी को स्पष्ट करना जरूरी है। सबसे पहले यह बता दूं कि फिल्मी कॉमेडियन मुकरी से इस शब्द का कोई वास्ता नहीं। मुकरी का बड़ा साधारण सा मतलब है मुकर जाना। इस तरह के लेखन में भी यही होता है। चार लाइनों की इस रचना में पहली तीन लाइनों में कोई घटना या प्रसंग होता है। आखिरी लाइन में उसे खारिज करते हुए एक पहेली सी बुनती है। जैसा कि ऊपर दर्ज भारतेन्दु की लाइनों में नजर आती है-क्यों सखि सज्जन नहीं अंग्रेज ? तो घूम फिर कर अंग्रेज शब्द पर आते हैं और इसे मुकरी से जोड़ते हैं। साहित्यिक विधा मुकरी हो या आज की शासन सत्ता में बैठे लोग। मुकर जाना दोनों की प्रवृत्ति है। मुकरी मे आखिरी लाइन में मुकरा जाता है और सियासत में चुनावों या वादों के बाद। मिसाल के तौर पर खाऊंगा न खाने दूंगा जैसे सियासी नारे की दूसरी लाइन पहली लाइन को खारिज करती हुई पहेली पूछती दिखती है कि क्या वाकई में ?

 हर तरफ नारे वाले संदर्भ में लोग खाते-पीते नजर आ रहे रहे हैं। जिधर देखिए भारतेन्दु की मुकरी वाले अंग्रेज ही नजर आते हैं। जिन्हें अन्ना आंदोलन के वक्त काले अंग्रेज कहा गया। यानी आजादी से पहले जो काम अंग्रेज कर रहे थे, अब वही हमारे अपने बीच के जोशीले वादे करने वाले नेता कर रहे हैं। अब लैपटॉप का मामला ही ले लीजिए। यूपी सरकार ने जितने लड़के-लड़कियों को लैपटॉप दिए हैं, अगर उन सब ने दिल्ली क्रिकेट क्लब को किराए पर दे दिए होते तो सब के सब करोड़पति हो गए होते। थोड़ा सा तालमेल होता तो यूपी के मुख्यमंत्री सारी दुनिया में डंका पीट सकते थे कि उन्होंने तीन साल में यूपी के नौजवानों को करोड़पति बना दिया। पर नहीं, अंधा बांटे रेवड़ी तो अपने अपने को दे। सब दिल्ली वाले खा पचा गए। यहां बेचारे नौजवान यूट्यूब पर शॉर्ट फिल्में ही देखते रह गए। वैसे सही बताऊं-हर बार दिल करता है कि कुछ अच्छी अच्छी बातें लिखूं। मसलन बेरोजगारी दूर हो गई है, भ्रष्टाचार मिट गया है। जाम खत्म हो गया है, मुफ्त शिक्षा और इलाज मिल रहा है, रेलवे के टिकट सस्ते हो गए हैं, पेट्रोल डीजल तो नालियों में बह रहा है और हर गरीब की कटोरी में अरहर की दाल है पर हर बार कुछ न कुछ फ्रस्टेशन निकल ही आता है। जैसे इस बार भारतेन्दु की मुकरी और नेतागीरी की ठुमरी। पर अब और ज्यादा नहीं। अपने और आप जैसे लोगों के दिल की बात अदम गोंडवी की इन लाइनों के जरिए और बात खत्म-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है