Thursday, September 30, 2010

बच्चो...आप भी सीखो इन ...स्पेशल चिल्ड्रन... से

यह प्यारी नन्ही गुडिय़ा ब्रेल लिपि में लिखी एक किताब पढ़ रही थी। उसकी एक फोटो को मैंने फेसबुक पर डाला। तुरंत मेरे मित्र कवि सर्वेश अस्थाना का एक कमेंट आया। कविता की शक्ल में। लाइनों पर गौर करिए-



अंतरमन की आंखों से, हमको तो -कुछ दिखता है
स्पर्श से हम पढ़ लेते हैं, हम को को कु लिखता है
ये कोमल नाज़ुक हाथ मेरे, आंखों का का निभाते हैं
वो अक्षर पढ़ते जाते हैं, हम भाव समझ मुस्काते हैं...






और सच में अगर कोई भी व्यक्ति संवेदनशील है तो श्रीगंगानगर के श्री जगदंबा अंध विद्यालय के इस परिसर में रहने वाले ..स्पेशल चिल्ड्रन.. से मिलने के बाद भावुक हुए बगैर नहीं रह सकता। यह बच्चे वाकई विशिष्ट हैं। इसलिए नहीं कि उनमें किसी तरह की अपंगता है। बल्कि इसलिए कि उनमें कोई न कोई ऐसी विशिष्टता है जो आम बच्चों में नहीं होती। उनके इस खास किरदार के लिए परमहंस स्वामी ब्रह्मदेव जी और उनकी टीम वाकई काबिलेतारीफ है।
संस्थान अपना 30वां स्थापना वर्ष मना रहा है। दो और तीन अक्टूबर को यहां के पुराने विद्यार्थियों का महासम्मेलन भी होने जा रहा है। ऐसे में विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रतापसिंह के आमंत्रण पर मैं वहां गया। एक लाइन में अगर इस विद्यालय को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं..देश में मूक, बधिर और नेत्रहीन बच्चों के गिने चुने विद्यालयों में से यह एक है..। देश के विभिन्न राज्यों के ..स्पेशल चिल्ड्रन..यहां पढऩे आते हैं। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी। कोई फीस नहीं। जो देने की स्थिति में हैं, वह अपने बच्चों के अलावा दूसरे का खर्चा भी उठा सकता है। जो नहीं दे सकता, वह ऐसे ही अपना बच्चा यहां रख सकता है। नेत्रहीन बच्चों के लिए दसवीं और मूक-बधिर बच्चों के लिए आठवीं तक की पढ़ाई यहां कराई जाती है। ब्रेल लिपि की किताबें, सांकेतिक भाषाओं को समझाने वाले यंत्र, छात्रावास, भोजन और इन सबसे बढ़कर शिक्षकों और देखभाल करने वालों का प्यार इस विद्यालय की खासियत है। स्वामी ब्रह्मदेव ने बताया-..ये बच्चे सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं, डांट-पिटाई से वह टूट जाते हैं..आमतौर पर घरों में इनकी बात समझ न पाने के कारण घर वाले ही उनसे दुव्र्यवहार करते हैं, ऐसे में वह चिड़चिड़े या गुस्सैल हो जाते हैं..पर यहाँ रहने वाले बच्चों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं।
मैंने कई मूक-बधिर बच्चों को गणित के खास फार्मूलों के जरिए कठिन से कठिन सवालों को हल करते देखा। वह उंगलियों व संकेतों की भाषा से अपने टीचर की बात व सवाल समझ रहे थे। फिर उन्हें ब्लैकबोर्ड पर हल कर देते। मेरे जन्म की तारीख के दिन कौन सा दिन था, यह एक बच्चे ने चुटकियों में सही-सही बता दिया। एक दस साल की नन्ही नेत्रहीन बच्ची ने ब्रेल लिपि में लिखी किताब का पाठ पढ़कर सुनाया। उसकी होशियारी दंग करने वाली थी। यहां रोजी-रोजगार के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। मूक-बधिर लड़कियों की एक टोली हंसते-खिलखिलाते हुए बैग बनाने में जुटी थी। उनकी टीचर ने बताया कि यह लड़कियां न सुन सकती हैं और न बोल सकतीं हैं पर खुद को अभिव्यक्त करना उन्हें अच्छी तरह से आता है। कोई भी व्यक्ति अगर कुछ देर उनके साथ रह जाए तो वह उनकी सारी भाषाएं समझ सकता है। यह सब देखकर मुझे लगा कि अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ यहां आकर इन विशिष्ट बच्चों को दिखाना चाहिए। यह बोल, सुन और देख नहीं सकते। फिर भी अपने टीचर्स की प्यार भरी भाषा से सबकुछ समझ जाते हैं। डांस टीचर सनी ने बताया कि यहां के मूक-बधिर लड़के बहुत अच्छे डांसर हैं। जिन कठिन स्टेप्स को सामान्य लड़के सीखने में महीना भर लगाते हैं, वह यह चार दिन में ही कर लेते हैं। बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था भी बहुत दुरुस्त है- अलग-अलग समय पर लंगर चलते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर भी यहां है। यह सेंटर नेशनल स्कूल फॉर द विजुअली हैंडीकैप्ड देहरादून से संबद्ध है।

Saturday, September 18, 2010

उसका जाना: एक कालखंड का अंत

वो मेरा सबसे करीबी, सबसे अजीज़ और हमेशा साथ रहने वाला था। हर वक्त ऐसे मेरे साथ चलता, जैसे साँसें। सोते जागते, उठते-बैठते, यहाँ तक कि बाथरूम और टॉयलेट में भी। वो यानी मेरा नोकिया-एन 72 मोबाइल। काले रंग का था वो। उसका नीला स्क्रीनसेवर हमेशा मेरी आँखों में बसा रहता। 17 सितम्बर 10 को महज पांच साल की उम्र में वो मेरा साथ छोड़ गया। या यूँ कहिए कि मेरी गलती से बेचारा परलोक सिधार गया। पिछले कुछ समय से मैं उसे कमीज के बजाए जींस की पिछली जेब में रख रहा था। बुरा हो उन वैज्ञानिकों के उल्टे-सीधे रिसर्च पेपर्स का जिन्हें पढ़-पढ़कर मैंने ऐसा किया। वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि मोबाइल ऊपर की जेब में रखने से इसका सीधा असर दिल पर पड़ता है। मोबाइल तरंगें और वाइब्रेशन आप को दिल का मरीज बना सकती है। मुझे भी पता नहीं क्या खुराफात सूझी? दिल का मर्ज देने वाली तमाम दूसरी चीजों को छोड़ मैंने अपने प्यारे मोबाइल को ही दिल से दूर कर दिया। विश्वकर्मा पूजन के वक्त दफ्तर में धम्म से जमीन पर बैठ गया। ध्यान ही नहीं रहा और बेचारा नोकिया चकनाचूर हो गया। मैं अवाक रह गया।
भगवान विश्वकर्मा की ओर देखा और मन ही मन कहा-हे भगवान क्या गलती हो गई...
मैं इतने जोर से बैठा था कि मोबाइल की आत्मा रूपी सिम और प्राण वायु बैटरी को छोड़कर बाकी सारा नश्वर शरीर स्वर्गवासी हो गया। आसपास बैठे लोग मातमपुर्सी में जुट गए। एक-दो साथियों ने ध्वस्त मोबाइल को नोकिया केयर के वेंटीलेटर पर ले जाकर मरी चुहिया को गोबर सुंघा कर जिलाने जैसी कोशिश भी की। पर सब नाकाम। अब यादों के सिवा कुछ नहीं था। एक-एक करके तमाम पुरानी बातें याद आने लगीं। कितने शौक से मैने उसे तेरह हजार सात सौ रुपए में खरीदा था। बेटा शुभांग बड़ा हो रहा था। उसे भी मेरा मोबाइल बहुत पसंद था। वह कभी वीडियो बनाता तो कभी गेम खेलने लगता। अक्सर मोबाइल को लेकर वह मुझसे डांट खाता था। वैसे मैं खुद भी इस मोबाइल को लेकर अक्सर डांटा जाता। हमारी गृहलक्ष्मीजी की आदत है कि वह मोबाइल पर बात करते वक्त बड़ी गहराई मेरी फेस रीडिंग करती रहती हैं। चेहरे के भावों को देखकर उस अदृश्य आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश करना उनका पसंदीदा शगल है। बातचीत के वक्त मेरा खिला चेहरा, चहकती आँखें और हल्की मुस्कराहट नजर आती तो खैर नहीं। अगर मैं अपने मनोभावों को छिपाने की कोशिश भी करता तो कभी उनकी सूक्ष्म निगाहों की एक्स-रेज से बच पाया। उन्हें यह बिलकुल पसंद नहीं कि कोई महिला मुझे फोन करे। अक्सर मोबाइल झगड़े की वजह भी बन जाता। मोबाइल की डेड बॉडी देखकर मैं फिर सोचने लगा कि श्रीमती जी शायद अब जरूर खुश होंगी। ठीक उसी तरह जब मैंने अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर दान की थी। तब उन्होंने चैन की लम्बी साँस ली थी। मोबाइलफोन की तरह ही श्रीमती जी को मेरी स्कूटर की पिछली सीट से बेहद एलर्जी थी। उस पर बैठते वक्त हमेशा उनके मन में एक नकारात्मक भाव आता कि शादी से पहले जाने कितनी इस पर बैठी होंगी।
खैर, स्कूटर की बात फिर कभी। अभी तो हमें अपने मोबाइल को ही श्रद्धांजलि देनी है। जाने कितनी मिस कॉल्स उसमें दर्ज थीं। जाने कितनी टॉक वैल्यू उसमें खर्च हुई। कभी हिसाब करने को मन ही नहीं किया। मुझे याद है कि किस तरह अपने प्यारे मोबाइल को एक बार जब मैंने बेसाख्ता चूम लिया तो आसपास देखने वालों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा था। उन्हें लगा कि जरूर फोन पर कोई रासलीला हुई है। हकीकत यह थी कि उस दिन फोन पर बताया गया था कि मुझे यूरोप जाने का वीजा मिल गया है। वो कितना अजीज़ था, इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बात करते-करते अक्सर वह गरम हो जाता। इतना गरम कि कान जलने लगते, फिर भी मैं उसे नहीं हटाता था। कभी-कभी सात-आठ किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती और मुझे पता भी नहीं चलता कि मैं कितनी दूर चल आया हूं। ऐसा था मेरा एन-72...
मोबाइल और भी जाएंगे पर अब वो कभी नहीं आएगा। असमय उसका जाना, जाने क्यों मुझे एक कालखंड के अंत सरीखा लग रहा है...
मेरी यादें, मेरे अफसाने और वो रूठने-मनाने की बातें लेकर वो सदा के लिए चल बसा...

Wednesday, September 15, 2010

वो सूखे झड़ते पत्तों को

वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था
उन चुर-मुर करते पत्तों की आह कभी न सुनता था
रोते थे, वो तड़पते थे ..पर हम को तो मालूम न था
उन तिनका-तिनका पत्तों को ये दर्द मुझी सा होता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

वो पत्ते थे, हाँ पत्ते थे पर क्यूं लगता है वो मै ही था
टूट के टहनी से गिरता फिर खुद को रौंदा करता था
रोके कौन और टोके कौन मैं कब किसकी सुनता था
सब कहते थे वो जुल्मी हैं पर मैं तो उन पर मरता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

उनकी एक झलक को मैं तब सौ-सौ सजदे करता था
वो तिरछे-तिरछे रहते थे ..मैं पीछे-पीछे चलता था
उनकी खुशबू, उनकी आहट मैं हर पल खोया रहता था
वो कहते थे, हैं नहीं मेरे..और मैं सुनकर रोया करता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

Thursday, September 2, 2010

शेखर...तुम वाकई बहादुर हो

सुबह दस बजे के करीब शेखर का मोबाइल पर मैसेज़ आया-
...आफ्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट प्रोसेज़ ऑफ न्यू सेल्स फार्मेशन कॉजेज फ्लक्चुएशन इन बीपी, वेट गेन-लॉस, टेरिबल वीकने, स्टोमच डिसऑर्डर... कुड नॉट वॉक और सिट फॉर लास्ट 10 डेज़, इट्स लाइक गोइंग टू बैक इनफैन्ट्स स्टेज़.. ..बट फ्यू डेज़ बैक आई डिसाइडेड टू टुक फर्स्ट बेबी स्टेप विदआउट सपोर्ट... इट फील लाइक बिगनिंग ऑफ ए न्यू लाइफ...
...यस, फ्यू मोर चैलेंजेज विल हैव टू फेस बिफोर गेटिंग डिस्चाच्र्ड फ्रॉम द हॉस्पिटल...
...शुड कम आउट फ्रॉम आइसोलेशन अराउंड फस्र्ट वीक ऑफ सेप्टम्बर एंड फाइनल डिस्चार्ज वुड बी अराउंड सेकेंड
...शेखर
संदेश पढ़ते ही मैं समझ गया कि शेखर की हालत ठीक नहीं है। वो मेरे बहुत करीबी दोस्तों में एक है। पहली मुलाकात 2006 में मुंबई में हुई थी। काइज़र फाउंडेशन की एचआईवी-एड्स कान्फ्रेंस में मैं भी आमंत्रित था। शेखर उस वक्त लोकसत्ता के चीफ कॉपी एडिटर थे। शेखर और मैं दोनों ही काइज़र फेलो थे। मेरा पहला असाइनमेंट महाराष्ट्र था। मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के बुधवारपै जैसे रेडलाइट इलाकों और पंचगनी में फादर टॉमी के टीबी सेनीटोरियम में जाकर एचआईवी एड्स से जुड़े सामाजिक-आर्थिक तथ्यों को जुटाने में शेखर ने मेरी काफी मदद की। बाद में मणिपुर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, म्यांमार, कनाडा और यूरोप के कई देशों में फेलोशिप पर काम करते वक्त हम साथ-साथ थे। मौत से जूझते बेबस लोगों, समाज के तिरस्कृत व्यक्तियों और एचआईवी-एड्स जागरूकता को लेकर शेखर बेहद जुनूनी है। हाल ही में मराठी में लिखी उसकी किताब ...पॉजिटिव माइंड्स... आई तो उसकी पहली चंद प्रतियों में से एक शेखर ने मुझे भेजी। इससे पहले जब भी कोई बड़ी कामयाबी मिली या परेशानी हुई तो हमेशा उसका फोन आया। तीन साल पहले उसे इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला। फिर वह अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में हुई तीन हफ्ते की वर्कशॉप में भाग लेने के लिए गया। विषय था-...लीडरशिप इन स्टै्रटजिक हेल्थ कम्युनिकेशन...। लौटने के बाद उसने वहाँ के अनुभव बताए थे। साथ ही यह भी बताया था कि अब उसका अगला विषय ...माइग्रेशन या पलायन... और उसके आर्थिक-सामाजिक प्रभाव हैं। बहरहाल, शेखर के बारे में इतनी सारी बातें करने का मकसद सिर्फ यह बताना है कि उसकी एक पत्रकार के तौर पर क्या हैसियत है। देशभर के अस्पतालों, गरीबों की सेहत, इलाज के सरकारी ढाँचे और एचआईवी-एड्स जैसे गूढ़ विषयों के बारे में शेखर जैसी गहरी जानकारी रखने वाले जर्नलिस्ट गिने-चुने ही हैं। उसके इस जुनून के पीछे सिर्फ एक संवेदनशील पत्रकार होना ही नहीं, बल्कि इंसानियत भी है। बतौर इंसान शेखर के दिल में आम लोगों के लिए मैंने जो कसक देखी, वह कम लोगों में होती है। ऐसा शख्स आज खुद अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहा है। वह हिम्मती है। उसकी लेखनी ने ना जाने कितने मरते हुए जिस्मों में जान फूँकी है।
...वह मुझे भी कुछ न बताता। उसका मैसेज मेरे कई बार फोन और मैसेज करने के बाद आया। इतना अंदाजा तो मुझे पहले ही था कि जरूर कोई गंभीर बात है, पर हालत यहाँ तक पहुँच गई होगी, इसका मुझे अंदाज नहीं था। कुछ महीने पहले बात हुई थी तो शेखर ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज में बताया था कि पीठ में कुछ गांठे हैं। जाँच में शुरुआती दौर का कैंसर निकला है। डॉक्टरों ने कहा है, ठीक हो जाएगा। बाद में उसने बताया कि खून के कुछ कम्पोनेंट ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। इसके लिए काफी पैसों की जरूरत भी थी और मुझसे बातचीत का सार यह था कि किस तरह से अधिक से अधिक मदद जुटाई जा सकती है। हम दोनों ने मिलकर कुछ कोशिशें भी की। फिर काफी दिनों तक कोई बात नहीं हुई। आज शेखर का मैसेज मिला तो काँप गया।
मैंने तुरंत दूसरा संदेश भेजा-
.. शेखर मैं तुम्हारे लिए अपने दोस्तों से मदद की अपील करना चाहता हूँ... क्या तुम्हारी इजाजत है...

करीब दो घंटे बाद उसका जवाब आया-

सुधीर... चिंता मत करो ...15 दिन में डिस्चार्ज करने की बात डॉक्टर ने कही है... कैंसरस सेल खत्म हो चुके हैं ...स्टेम सेल थेरेपी...क्यूरेटिव मैथेड है...आनेवाले 5-6 महीने संक्रमण से बचना होगा...आप सबकी दुआ तो साथ है ही...तो कोई टेंशन नहीं..। थोड़ी देर बाद फोन भी आ गया। उसने कहा..तुम तो जानते ही हो कि हमने एचआईवी से लड़ते लोगों के बीच काम किया है। वो लोग तो बीमारी के साथ-साथ तिरस्कार भी झेलते हैं। कम से कम अपने साथ ऐसा नहीं है। लोग मुझसे मिलने आते हैं। मेरे सामने वाले बेड पर रायपुर के एक बच्चे को भी मेरी जैसी बीमारी है। उसके इलाज का खर्चा 50 लाख से ज्यादा है। मेरा कम से कम इतना तो नहीं है। मैं उसे देखता हूँ तो मेरी चिंता और तकलीफ दोनों कम हो जाती हैं..तुम चिंता मत करो। .. मैं जानता हूँ कि शेखर स्वाभिमानी पत्रकार है। लोकसत्ता के उसके पुराने सम्पादक कुमार केतकर ने उसके इलाज के लिए काफी कोशिश की हैं। वह अब किसी से कुछ नहीं कहेगा और मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा ..शेखर तुम वाकई बहुत बहादुर हो..ईश्वर तुम्हारे जैसी हिम्मत हर उस शख्स को दे, जो बीमारी या मुसीबतों से लड़ रहा है-आमीन।

Tuesday, August 31, 2010

एक दिन रिचर्ड गेर के साथ

बात शायद 1991 की है। बीस साल की उम्र थी। बीए फर्स्ट ईयर में था। हिन्दी मीडियम से पढ़ा था। मुंबइया फिल्में देखता था। लिहाजा अंग्रेजी फिल्मों की खास समझ मुझमें थी नहीं। फिर भी दोस्तों के कहने पर मैं लखनऊ के मेफेयर सिनेमाघर में ..प्रेटी वुमन.. देखने गया। बकौल एक दोस्त-फिल्म में काफी ..सीन.. थे। हमारे जैसे ज्यादातर छात्र अंग्रेजी फिल्मों को खास इसी उद्देश्य से देखने जाते थे। खैर फिल्म देखने जाने से पहले अपने एक मित्र से मैंने कहानी जान ली और पहुँच गए मेफेयर पर जब बाहर निकले तो कोई ..सीन.. याद नहीं था, याद था तो बस जूलिया रोबर्ट्स का खूबसूरत चेहरा और रिचर्ड गेर की जबरदस्त एक्टिंग। फिल्म देखते वक्त कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं खुद रिचर्ड गेर के साथ म्बा वक्त बिताऊँगा। पर वो दिन मेरी जिंदगी में आया...

तारीख 13 अगस्त 2006, टोरंटो आए करीब एक हफ्ता बीत चुका था। यह मेरे जर्नलिज्म करियर के तब तक के बेहतरीन असाइनमेंट्स में से एक था। असाइनमेंट यानी ..वर्ल्ड एड्स कान्फ्रेंस.. का कवरेज। मुझे यह मौका हेनरी जे काइज़र फैमिली हेल्थ फाउंडेशन के फेलो के तौर पर मिला। हिन्दुस्तान लखनऊ में मैं सीनियर कॉरस्पॉन्डेंट के तौर पर हेल्थ बीट कवर करता था। एचआईवी एड्स पर काम करने के लिए यह फेलोशिप उसी दौरान मिली थी। सांध्य समाचारपत्र ..संसार लोक.. से नौकरी शुरू करने के बाद खुद को इस हद तक लाने की खुशी से मैं काफी हद तक आत्ममुग्ध था। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, यूनिसेफ, वल्र्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और कई अन्य यूएन एजेन्सियों के प्रमुखों से रूबरू हो चुका था। एक्साइटमेंट उस वक्त चरम पर पहुँचा जब पहले ही दिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान आमना-सामना हुआ। पहली बार समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रेस कान्फ्रेंस किस हद तक प्रायोजित होती हैं। सवाल पूछने वाले पत्रकार पहले ही तय होते हैं। मीडिया मैनेजमेंट से जुड़े लोग उनके सवाल एक पर्ची में लिखकर ले लेते हैं ताकि जवाब देते वक्त कोई दिक्कत न हो। सवाल तो पूछ नहीं पाए, ऊपर से रही-सही कसर क्लिंटन के सुरक्षा घेरे ने पूरी कर दी। उस वक्त बड़ा क्रेज था क्लिंटन का। कुछ ही देर में क्लिंटन हाथ हिलाते हुए वापस चले गए। उनके जाते ही कल्पना जैन आ गईं। वो उस वक्त काइजर फाउंडेशन की अंतरराष्ट्रीय फेलो थीं। उनसे मैंने हेल्थ जर्नलिज्म के बारे में काफी कुछ सीखा था। वो सबको काइजर के कैम्प ऑफिस में ले आईं। काइजर फाउंडेशन की सीनियर ऑफिसर पैनी डैखम पहले से ही मौजूद थीं। पैनी एक कुशल मैनेजर के साथ-साथ बेहद संवेदनशील मेहमाननवाज भी थीं। उन्होंने यह बताकर सबको खुश कर दिया कि हॉलीवुड स्टार रिचर्ड गेर सिर्फ काइज़र से जुड़े पत्रकारों से मिलने के लिए खासतौर पर वहाँ आने वाले हैं। रिचर्ड गेर का नाम सुनते ही मेरे सामने हॉलीवुड फिल्म ..प्र्रिटी वुमन.. के कुछ दृश्य घूम गए। विदेशी फिल्मों की अल्प जानकारी के बावजूद अभिनेत्री जूलिया रोबर्ट्स को मैं काफी पसंद करता था। जूलिया ..प्रिटी वुमन.. की नायिका थी और रिचर्ड गेर उनके को-स्टार। इन दोनों की एक और फिल्म ..रन अवे ब्राइड.. भी मैंने देखी। रिचर्ड गेर के बारे में मेरी तब तक की जानकारी इन दो फिल्मों की वजह से ही थी। तब तक उनका जयपुर का खासा चर्चित शिल्पा शेट्टी चुंबन कांड नहीं हुआ था, जिसमें उनकी गिरफ्तारी तक के आदेश हो गए थे। अलबत्ता इतना मैं तब भी जानता था कि रिचर्ड गेर का हॉलीवुड में वही दर्जा है जो बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन का। दोनों हैं भी समकालीन। अमिताभ की पैदाइश चालीस के दशक की है और रिचर्ड गेर की 1949 की। सत्तर के दशक की शुरुआत में अमिताभ जंजीर और दीवार से फिल्मों में जबरदस्त एंट्री ले रहे थे। ठीक उसी सम में रिचर्ड गेर ..अमेरिकन जिगेलो.. के जरिए हॉलीवुड पर छाने की तैयारी में थे। दुनिया की मशहूर मॉडल सिंडी क्राफोर्ड से लम्बा इश्क लड़ाने के बाद उन्होंने शादी की। यह जानकारियाँ तो गाहे-बगाहे मुझे पहले भी मिल चुकी थीं, पर टोरंटो में वह बिलकुल नए रूप में सामने थे। यहाँ उनका परिचय एचआईवी-एड्स एक्टिविस्ट के तौर पर था। दोपहर एक बजे के करीब रिचर्ड गेर काइज़र के कैम्प में पहुँचे। फिल्मों में हमेशा उन्हें क्लीन शेव देखा था, पर अभी उनके चेहरे पर अच्छी खासी दाढ़ी-मूछ थी। इससे नीली जींस पहने इस शख्स के स्टारडम में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। गेर के पीछे-पीछे मुंबई की मशहूर उद्योगपति परमेश्वरन गोदरेज और उस वक्त स्टार टीवी के सीईओ पीटर मुखर्जी भी दाखिल हुए। हमें उनके आने की उम्मीद नहीं थी। खैर तीनों लोगों ने एक संक्षिप्त प्रेस कान्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने भारत में एचआईवी-एड्स जागरूकता को लेकर चलाए जा रहे ..हीरोज़ प्रोजेक्ट.. से जुड़ी कु जानकारियाँ दीं, जिसमें सबसे अहम बात यह थी कि इन तीनों सेलेब्रेटीज़ के आर्गनाइजेशन मिलकर इस प्रोजेक्ट को भारत में अभी दो साल और चलाएँगे। जाहिर है प्रोजेक्ट के आगे बढऩे से हिन्दुस्तान में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों और एचआईवी संक्रमित लोगों को फायदा पहुँचने वाला था। परमेश्वरन गोदरेज मुझे कुछ रिजर्र्व महिला लगीं। अलबत्ता पीटर मुखर्जी और रिचर्ड गेर बेहद जमीनी नजर आए। पीसी के बाद दोनों के साथ करीब एक घंटे तक मेरी व अन्य पत्रकारों की खूब बातचीत हुई। इस दौरान न तो पीटर ने कभी इस बात का अहसास होने दिया कि वे स्टार टीवी के सीईओ हैं और न ही रिचर्ड गेर ने कि वे हॉलीवुड के कितने बड़े स्टार हैं। पीटर यह भाँप चुके थे कि वहाँ मौजूद कई लोगों के मन में यह ख्वाहिश है कि वो रिचर्र्ड के साथ फोटो खिंचवाए। मुखर्जी ने बड़ी आत्मीयता से सबको अपनी तरफ से ऑफर किया कि आप लोग फोटो कराएँ। इस दौरान गेर ने बताया कि किस तरह से वे तिब्बत को आजाद कराने की मुहिम पर लगे हुए हैं। किस तरह चीन उनका विरोध करता है। गेर फाउंडेशन के बारे में बताया कि किस तरह उनका संगठन भारत में एचआईवी एड्स के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा है। सारा कुछ बहुत मजेदार रहा। रिचर्ड ने मुझसे पूछा..हिन्दी के पत्रकार एचआईवी-एड्स के लिए क्या कर रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि उस वक्त तक खुद पत्रकार भी इस संक्रमण को लेकर खास जागरूक नहीं थे। अक्सर संक्रमित व्यक्तियों के सही नाम पते के साथ उनके बीमार होने की खबर को जोर-शोर से छाप दिया जाता है। खबर के असर से संक्रमितों के समाज से बहिष्कृत होने के उदाहरण भी उन्हें बताए। गेर को पहले से भी यह जानकारी थी कि भाषायी पत्रकारों में खासतौर पर हेल्थ, एचआईवी और यौनकर्मियों से जुड़ी खबरों को लेकर वैसी संवेदनशीलता नहीं है, जैसी कि अंग्रेजी पत्रकारिता में। उनकी राय थी कि कस्बा और जिला स्तर पर पत्रकारों को सही व संवेदनशील पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है। दिलचस्प बात यह रही कि रिचर्ड ने इस दौरान फिल्मों पर कोई बात नहीं की। उन्होंने साफ कहा कि फिलवक्त सिर्फ एचआईवी। खैर तब तक परमेश्वरन गोदरेज घड़ी की ओर इशारा करने लगीं। पीटर और रिचर्ड ने बात खत्म की और निकल गए। बाहर दुनिया भर से आए सैकड़ों पत्रकार उनसे एक्सक्लूसिव बात करने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे थे। भारत से गया हम पत्रकारों का दल खुशनसीब था कि इन सेलेब्रेटीज़ के साथ हमें एक घंटे का वक्त कुछ इस तरह मिला कि वे हमारे ही बीच के बंदे हों। थैंक्स टू ..काइजर.., थैंक्स पैनी और वेरी-वेरी थैंक्स टू कल्पना जैन...

Monday, August 23, 2010

...याद आई अभी...

यादों के उलटते पन्नो में,
तुम फड.फड. करती आई अभी,

चेहरा तंज और आँखें लाल,
गुस्से से भरी, तमतमाई हुई,

हर बात में इक उलाहना थी,
हर अदा में शिकायत भरी हुई,

मैं कितना बेजा था तब भी,
तुम हर पल जायज़ थी अब सी,

वो उसको देख मेरा हँसना,
फिर तेरा हफ़्तों लड़ते रहना,

मैं कैसा भोला पागल था,
न खुद को समझा, न तुम्हे कभी,

यादों
के उलटते पन्नो में,
तुम फिर याद आई अभी...

Saturday, July 10, 2010

गूलर का फूल

बारिश का मौसम है। नीम की रसीली निमकौरियाँ टपाटप टपक रही हैं। खरे दादा की बगिया भी खूब हरियाई हुई है। बगिया के बाहरी कोने में लगे पेड़ में लाल-लाल गूलर लगे हैं। भीतर बगिया में अमरूद, शहतूत और मौसमी भी लगी हुई हैं। दादा ने बड़े जतन से लखनऊ की गरमी में भी मौसमी उगायी है, जिन तक आमतौर पर चौथी क्लास में पढऩे वाले चीटू जैसे छोटे बच्चों की पहुँच कम ही है। हाँ, अमरूद के मौसम में बगिया जरूर उजड़ती है। खरे परिवार की लाख पहरेदारी के बावजूद बच्चों की वानर सेना घुसपैठ का मौका ढूंढ़ ही लेती है। बड़े बच्चों के झुंड में चीटू भी हाथ साफ कर लेता है। एक बार मौका मिला तो फिर बच्चे बगिया की ऐसी सफाई करते हैं कि क्या अमरूद और क्या मौसमी, कच्चा हो या पक्का सब जेबों में या फिर नेकर में खुसी हुर्ई शर्ट के भीतर। आज फिर इस टिड्डे दल ने बगिया को उजाड़ दिया था। दादा ने बगिया को देखा तो उनका हार्ट फेल होते-होते बचा। खरे दादा निकल पड़े शिकायत करने। पहली शामत चीटू की थी।

घर के बाहर कुंडी खटकी और आवाज़ आई-अरे भाई मिश्रा जी, घर में हो क्या?
चीटू के पापा कुछ देर पहले ही घर पहुँचे थे। उनकी कुछ खास आदतें हैं। जैसे जब कभी वह बाहर से घर वापस आते हैं तो कम से कम आधा घंटे तक उनका पारा सातवें आसमान पर रहता है। उनकी हनक और सनक से घर वाले तो घर वाले बाहर वाले भी काँपते हैं। पर बेचारे खरे दादा की बगिया उजड़ी थी। तबाही मचाने वालों की उनकी फेहरिस्त में पहला नाम चीटू का ही था।
तीसरी बार जैसे ही आवाज आई-मिश्रा जी...
वो बिना कमीज-बनियान सिर्फ तहमद लपेटते हुए ही बाहर निकल आए और बोले-बताइए।
खरे दादा उनका रौद्र रूप देखते ही दहल गए और रिरियाते हुए बोले-कुछ नहीं मिश्राजी, बस मैं ये कह रहा था कि चीटू को थोड़ा संभालिए। नाले वाले फिरोज, चांद और ननके के साथ रहेगा तो बिगड़ जाएगा। आज इन लोगों ने पूरी बगिया तहस-नहस कर दी। अरे अगर इसे अमरूद या मौसमी चाहिए तो घर आ जाया करे, मैं खुद ही दे दिया करूंगा।
इतना कहकर खरे दादा तो खिसक लिए। बड़ी उमस थी उस वक्त।
ऊपर से जब भी मिश्राजी गुस्सा करते तो चीटू ऐसे ही पसीने में नहा जाता था। मिश्राजी ने पहले तो रेडियो तेज किया। फिर आव देखा न ताव कपड़े पीटने वाली मुगरी उठाई और दे-दनादन पीठ लाल कर दी।
साथ ही बोल रहे थे-भूखा रखता हूँ तुझे, साले बदनामी कराता घूम रहा है पूरे मोहगे में। चीटू हाथ जोड़े रोने लगा।
'पापा नहीं, मैं तो गूलर तोड़ रहा था। बगिया में गया ही नहीं।'
इतना सुनते ही मिश्राजी ने हुक्मनामा सुना दिया-आज खाना नहीं मिलेगा इसे। बेटा गूलर ही खाना अब।
यह सारी बातें घर वालों के बीच ही रहीं। बाहर तो लोगों को सिर्फ गाना ही सुनाई पड़ रहा था। मिश्राजी बड़े तमीज वाले हैं। घर में जब भी मारपीट करते हैं तो रेडियो जोर से बजा देते हैं। ताकि गली के लोगों तक रोना-धोना और गालीगलौज न पहुँचे।
चीटू चुपचाप छत पर निकल लिया।
तब तक आँटी बोलीं-जरा राजू को बाहर घुमा लाओ, खाना बनाना है।
आँटी यानी चीटू की दूसरी माँ।
चीटू गुस्से में तो था ही (सोचने लगा)-खाना तो मिलना नहीं है मुझे। इस राजू को और घुमाओ।
डेढ़ साल का राजू न जाने क्यों जोर-जोर से रो रहा था।
खैर चीटू ने राजू को गोद में उठाया और फिर पहुँच गया टीले पर मंदिर के पास गूलर के पेड़ के नीचे। गूलर का यह पेड़ उसका ही नहीं, मोहल्ले के सारे बच्चों और बुजुर्र्गों का दोस्त है। इसकी छाँव में गली की पंचायत से लेकर देश की राजनीति तक पर चर्चा होती है। शाम का वक्त है। चाची पहले से ही बैठी हुर्ईं हैं। चाची पूरे मोहल्ले की चाची हैं। मिश्राजी भी उन्हें चाची कहते हैं और चीटू भी।
चीटू को उनकी एक बात सबसे अच्छी लगती है कि रेडियो के तेज गानों के बावजूद वो आसानी से जान जाती हैं कि मिश्राजी ने घर में कब किसको पीटा।
चीटू की रोनी सूरत देखते ही उन्होंने कहा-क्या हुआ?
वो पहले से ही भरा हुआ था। तुरंत फफक पड़ा-पापा ने मारा है।
चाची ने तुरंत धोती के पल्लू से आँसू पोछे और बोलीं-तुम्हारी आंटी ने बचाया नहीं।
वो कुछ नहीं बोला।
चाची ने साथ बैठी औरतों के साथ हाथ नचा-नचाकर प्रवचन शुरू कर दिया- यही होता है सगी माँ के मरने पर। तीन महीने हुए नहीं, दूसरी ब्याह लाए मिश्रा। अब बच्चों की तो छीछालेदर हो गई।
शुक्लाइन ने सुर में सुर मिलाया-बताओ भला।
चीटू का मुँह और उतर गया।
सामने से रमन चाचा आते हुए दिखाई दिए।
चाची को देखते ही चाचा बोले-चाची पाँव लागी।
खुश रहो-तुम तो गुलरी केर फूर हुर्ई गए, हौ कहाँ।
बाकी बातें क्या हुई, चीटू ने ध्यान नहीं दिया पर गुलरी केर फूर यानी गूलर के फूल को लेकर उसकी जिज्ञासा जाग उठी।
पूछ ही बैठा-चाची ये गूलर का फूल क्या है?
चाची बोलीं-कभी गूलर का फूल देखा है।
उसने कहा नहीं।
चाची बोलीं-मैंने भी नहीं देखा पर हमारे नाना को एक फूल मिला था। उन्होंने एक चुड़ैल की चुटिया काटी थी। उसी चुड़ैल ने लाकर दिया था।
चीटू की आँखें फैल गईं-हैं... चुड़ैल की चुटिया।
'हाँ... अगर कोई चुडै़ल की चुटिया काट ले तो फिर चुड़ैल उसकी जिंदगी भर गुलामी करती है। मेरे दादा ने उसकी चुटिया तभी वापस की जब उसने गूलर का फूल लाकर दिया।'
चाची के चेहरे पर फ्लैशबैक में जाने जैसे भाव थे-जब तक नाना के पास गूलर का फूल रहा, उनके घर बड़ी जमींदारी रही। बड़े-बड़े अंग्रेज बहादुर भी आते थे उनसे मिलने। फिर फूल चोरी हो गया।
चीटू को समझ नहीं आया कि गूलर के फूल में ऐसी क्या बात है?
चाची बोलीं-चीटू अगर गूलर का फूल मिल जाए तो हर मुराद पूरी हो जाती है।
तब तक चाची का बुलावा आ गया और वो वापस चली गईं।
चीटू भी उनके पीछे-पीछे अपने घर चला गया। राजू रो रहा था, उसे आँटी के हवाले किया।
मिश्राजी बरामदे की अलमारी में परदे के पीछे से मुंह पोछते हुए निकले।
हुक्म मिला-जाओ ऊपर।
चीटू समझ गया, ये रोज का नियम था। अंग्रेजी दारू की एक अद्धी हर दूसरे दिन खुलती था। भुने हुए काजू, कटा हुआ पनीर और सलाद।
हाँ, खास बात यह थी कि उन्हें पीते हुए कोई नहीं देख पाता।
मिश्राजी का मानना था कि शराब पीना बुरी बात है। लिहाजा बच्चों के सामने नहीं पीनी चाहिए। अलबत्ता सिगरेट वो चीटू से मंगाकर ही पीते थे।
तब तक चीटू को भी भूख लगने लगी। पेट में चूहे कूद रहे थे और आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी।
मन ही मन सोचने लगा-मम्मी होती तो कितना अच्छा होता। मजाल क्या थी कि पापा इस तरह से पीट पाते। बेचारी खुद आगे आकर मार खा लेती थीं पर मुझे नहीं पिटने देतीं।
अचानक याद आई-कितनी अच्छी भिंडी बनाती थीं वो। पराठों के साथ।
भगवान, क्या मम्मी वापस नहीं आ सकतीं?
अचानक चीटू को चाची की बात याद आई-गूलर का फूल और इच्छा पूर्ति।
अगर गूलर का फूल मिल जाए तो? हाँ तब तो जरूर मम्मी फिर से जिंदा हो जाएँगी।
चीटू को अस्पताल में लेटी मम्मी का चेहरा याद आने लगा।
डॉक्टर कह रहे थे-नाइंटी पर्सेन्ट बर्न है, नो होप।
पाँव के नाखून से सिर के बालों तक वो बुरी तरह से झुलसी हुर्ई थीं।
चेहरे की खाल जगह-जगह से उधड़कर लटक रही थीं।
तभी उन्होंने चीटू को बुलाया।
उनकी हालत देखकर चीटू रोने लगा। मम्मी का चेहरा एक अजीब सी भावहीन द्रणता ओढ़े हुआ था। शायद तकलीफ और दर्द का अहसास ही खत्म हो चुका था।
वो बोलीं-पास आओ बेटा।
चीटू उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
उन्होंने बिना सिर या गरदन हिलाए उसकी आँखों में देखा और बोलीं-बेटा, खूब पढऩा, बड़े आदमी बनना और हाँ अपने पापा का हमेशा कहना मानना।
उसके बाद उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
चीटू को सब ने बाहर निकाल दिया।
सुबह पाँच बजे के करीब उनकी मौत हो गई।
चीटू की सोच की तंद्रा टूटी-वो सोचने लगा कि ये मम्मी भगवान के घर जाते-जाते क्या कह गईं?
पापा कितने बेरहम हैं। इतना मारते हैं। खाना भी बंद कर देते हैं।
भूख और जोरों से लगने लगी थी।
तब तक मिश्राजी की आवाज आई-नीचे आओ।
सब लोग खाना खाकर बिस्तर पर जा चुके थे।
मिश्राजी आंगन में पड़े तखत पर बैठे हुए थे। दोनो हाथ पीछे की ओर करके टेक लगाए हुए। आसमान में बादल थे और मिश्राजी के चेहरे पर दारू का सुरूर घुमड़ा पड़ रहा था।
चीटू जानता था अब पापा के लेक्चर का टाइम हो गया, मगर उनके चेहरे पर अचानक दार्शनिक भाव आ गए और उन्होंने बोलना शुरू किया-क्या हूँ मैं? दुश्मन हूँ् तुम्हारा। यही सोचते होगे पर तुम, पर तुम नहीं जानते कि तुम्हारे बाप को अपने बच्चों की इज्जत कितनी प्यारी है। मैं कैसे जीया मुझे कोई परवाह नहीं पर कोई साला आकर मेरे बच्चों को कुछ कहे...उसकी माँ...।
फिर अचानक उनकी आँखों से आँसू निकलने लगे।
तुम क्या सोचते हो, तुम्हें मारकर या भूखा रखकर मुझे सुख मिलता है। पर ये प्रताडऩा जरूरी है नहीं तो तुम लोग भी बड़े होकर कुछ नहीं बन पाओगे। मेरे जैसे रह जाओगे।
फिर अचानक उठे और किचन से खाने की थाली लाकर चीटू के सामने रख दी।
अचानक उसे पापा अच्छे लगने लगे। वो खाने पर टूट पड़ा।
मिश्राजी सोने चले गए।
चीटू के पेट की भूख शांत हो चुकी थी पर पीठ का दर्र्द तेज हो उठा।
वो पापा के बारे में सोचने लगा-सुबह फिर ताव खाएँगे और किसी न किसी बात पर मारेंगे। मम्मी की फिर याद आयी। दिमाग में अभी भी गूलर का फूल नाच रहा था। सब लोग सो चुके थे। उसने चुपचाप बाहर वाले दरवाजे की कुंडी खोली। रात के पौने बारह बज चुके थे। चाची ने कहा था कि गूलर का फूल रात में ठीक बारह बजे दिखता है। जिन्न और अप्सराएँ उन्हें तोडऩे आते हैं। अंधेरे में डरते-डरते चीटू पेड़ के नीचे पहुँचा। ऊपर कुछ नजर नहीं आ रहा था। हरे-हरे पत्तों के बीच गूलर की मोटी-मोटी डालियाँ दैत्य के हाथ-पाँव जैसी नजर आ रही थीं। बारह बज चुके थे। कहीं कोई फूल नजर नहीं आया। वो हारकर वापस घर आ गया। बहुत देर तक नींद नहीं आई। पीठ दुख रही थी। आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। चीटू के बचपन का यह सिलसिला लम्बे अरसे तक चला। चीटू को जब मार पड़ती, कोई तकलीफ होती या दुख होता, उसे सिर्फ गूलर के फूल में उम्मीद नजर आती। हमेशा उम्मीद रही कि एक न एक दिन जरूर गूलर का फूल मिलेगा।
वह फूल के आगे अपनी ख्वाहिश रखेगा-मेरी मम्मी को जिंदा कर दो।
चीटू को खुद पता नहीं चला कि कब वो इस सच को समझने लगा। सच यानी गूलर का फूल कभी नहीं खिलता और न ही कभी वो मम्मी वापस आती है, जो भगवान के घर चली गई।
अब वो गूलर के नीचे नहीं जाता.. बड़ा जो हो गया है...