Saturday, September 18, 2010

उसका जाना: एक कालखंड का अंत

वो मेरा सबसे करीबी, सबसे अजीज़ और हमेशा साथ रहने वाला था। हर वक्त ऐसे मेरे साथ चलता, जैसे साँसें। सोते जागते, उठते-बैठते, यहाँ तक कि बाथरूम और टॉयलेट में भी। वो यानी मेरा नोकिया-एन 72 मोबाइल। काले रंग का था वो। उसका नीला स्क्रीनसेवर हमेशा मेरी आँखों में बसा रहता। 17 सितम्बर 10 को महज पांच साल की उम्र में वो मेरा साथ छोड़ गया। या यूँ कहिए कि मेरी गलती से बेचारा परलोक सिधार गया। पिछले कुछ समय से मैं उसे कमीज के बजाए जींस की पिछली जेब में रख रहा था। बुरा हो उन वैज्ञानिकों के उल्टे-सीधे रिसर्च पेपर्स का जिन्हें पढ़-पढ़कर मैंने ऐसा किया। वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि मोबाइल ऊपर की जेब में रखने से इसका सीधा असर दिल पर पड़ता है। मोबाइल तरंगें और वाइब्रेशन आप को दिल का मरीज बना सकती है। मुझे भी पता नहीं क्या खुराफात सूझी? दिल का मर्ज देने वाली तमाम दूसरी चीजों को छोड़ मैंने अपने प्यारे मोबाइल को ही दिल से दूर कर दिया। विश्वकर्मा पूजन के वक्त दफ्तर में धम्म से जमीन पर बैठ गया। ध्यान ही नहीं रहा और बेचारा नोकिया चकनाचूर हो गया। मैं अवाक रह गया।
भगवान विश्वकर्मा की ओर देखा और मन ही मन कहा-हे भगवान क्या गलती हो गई...
मैं इतने जोर से बैठा था कि मोबाइल की आत्मा रूपी सिम और प्राण वायु बैटरी को छोड़कर बाकी सारा नश्वर शरीर स्वर्गवासी हो गया। आसपास बैठे लोग मातमपुर्सी में जुट गए। एक-दो साथियों ने ध्वस्त मोबाइल को नोकिया केयर के वेंटीलेटर पर ले जाकर मरी चुहिया को गोबर सुंघा कर जिलाने जैसी कोशिश भी की। पर सब नाकाम। अब यादों के सिवा कुछ नहीं था। एक-एक करके तमाम पुरानी बातें याद आने लगीं। कितने शौक से मैने उसे तेरह हजार सात सौ रुपए में खरीदा था। बेटा शुभांग बड़ा हो रहा था। उसे भी मेरा मोबाइल बहुत पसंद था। वह कभी वीडियो बनाता तो कभी गेम खेलने लगता। अक्सर मोबाइल को लेकर वह मुझसे डांट खाता था। वैसे मैं खुद भी इस मोबाइल को लेकर अक्सर डांटा जाता। हमारी गृहलक्ष्मीजी की आदत है कि वह मोबाइल पर बात करते वक्त बड़ी गहराई मेरी फेस रीडिंग करती रहती हैं। चेहरे के भावों को देखकर उस अदृश्य आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश करना उनका पसंदीदा शगल है। बातचीत के वक्त मेरा खिला चेहरा, चहकती आँखें और हल्की मुस्कराहट नजर आती तो खैर नहीं। अगर मैं अपने मनोभावों को छिपाने की कोशिश भी करता तो कभी उनकी सूक्ष्म निगाहों की एक्स-रेज से बच पाया। उन्हें यह बिलकुल पसंद नहीं कि कोई महिला मुझे फोन करे। अक्सर मोबाइल झगड़े की वजह भी बन जाता। मोबाइल की डेड बॉडी देखकर मैं फिर सोचने लगा कि श्रीमती जी शायद अब जरूर खुश होंगी। ठीक उसी तरह जब मैंने अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर दान की थी। तब उन्होंने चैन की लम्बी साँस ली थी। मोबाइलफोन की तरह ही श्रीमती जी को मेरी स्कूटर की पिछली सीट से बेहद एलर्जी थी। उस पर बैठते वक्त हमेशा उनके मन में एक नकारात्मक भाव आता कि शादी से पहले जाने कितनी इस पर बैठी होंगी।
खैर, स्कूटर की बात फिर कभी। अभी तो हमें अपने मोबाइल को ही श्रद्धांजलि देनी है। जाने कितनी मिस कॉल्स उसमें दर्ज थीं। जाने कितनी टॉक वैल्यू उसमें खर्च हुई। कभी हिसाब करने को मन ही नहीं किया। मुझे याद है कि किस तरह अपने प्यारे मोबाइल को एक बार जब मैंने बेसाख्ता चूम लिया तो आसपास देखने वालों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा था। उन्हें लगा कि जरूर फोन पर कोई रासलीला हुई है। हकीकत यह थी कि उस दिन फोन पर बताया गया था कि मुझे यूरोप जाने का वीजा मिल गया है। वो कितना अजीज़ था, इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बात करते-करते अक्सर वह गरम हो जाता। इतना गरम कि कान जलने लगते, फिर भी मैं उसे नहीं हटाता था। कभी-कभी सात-आठ किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती और मुझे पता भी नहीं चलता कि मैं कितनी दूर चल आया हूं। ऐसा था मेरा एन-72...
मोबाइल और भी जाएंगे पर अब वो कभी नहीं आएगा। असमय उसका जाना, जाने क्यों मुझे एक कालखंड के अंत सरीखा लग रहा है...
मेरी यादें, मेरे अफसाने और वो रूठने-मनाने की बातें लेकर वो सदा के लिए चल बसा...