Monday, February 6, 2017

लोग कहेंगे घी वाली पार्टी के विधायक जी हैं

  in खुले मन से 

शहरयार का एक मशहूर शेर है-
तेरे वादे को कभी झूठ नहीं समझूंगा
आज की रात भी दरवाजा खुला रखूंगा
हमारे वोटरों के दरवाजे भी हमेशा खुले ही रहते हैं। वादों पर हमें बड़ा भरोसा रहा है। नेता तोड़ते रहते हैं और हम उम्मीद जोड़ते रहते हैं। अब मामला वादों से आगे चला गया है। जीते तो मुफ्त का वादा। पहले कभी गरीबी हटाओ नारा था। गरीबी तो हटी नहीं, गरीब किनारे लगते गए। अमीर और अमीर हुए, गरीब और गरीब होते चले गए। नेताओं ने लोगों को सिर्फ जेब से गरीब नहीं बनाया। उन्हें दिमागी तौर पर भी भिखारी बना दिया है। आज हालत यह है कि मुफ्त के मोबाइल सिम को लेने के लिए लोग आधी रात से लाइन में लग जाते हैं। सियासत के मैनजर जानते हैं कि अब मुफ्त के लॉलीपॉप का जमाना है। प्रबंधक चुनावों के धंधे से पहले रोजमर्रा की चीजें बेचने वाली कंपनियों में रहे होते हैं। वह जानते हैं कि इलेक्शन के कारोबार में कस्टमर यानी वोटर को क्या चाहिए ?
अब देखिए न। जनता का तेल निकालने के बाद अब मुफ्त घी देने के वादे हैं। इस बार पंजाब में 25 रुपये किलो के हिसाब से हर गरीब को दो किलो घी देने का वादा एक पार्टी ने किया। मतलब, जितने में मॉल में एक पानी की बोतल मिलती है, उतने में दो किलो घी मिलेगा। साथ में दस रुपये किलो के हिसाब से पांच किलो चीनी भी मिलेगी। घी में शक्कर सानो, खाओ और सेहत बनाओ। सिर्फ पंजाब में ही नहीं। यूपी में कुपोषित गरीब बच्चों को घी और पाउडर दूध देने का वादा किया गया है। राम जाने, बेचारों को दूध-घी हजम हो पाएगा भी या नहीं।
फ्री स्मार्ट फोन, लैपटॉप और वाई-फाई तो बंटेगा ही। बिजली और पानी मुफ्त देने के वादे पहले भी कई सरकारें कर चुकी हैं। इस बार प्रेशर कुकर भी मिल सकता है। गोवा में तो एक पार्टी ने वादा किया है कि छात्रों को हर महीने पांच लीटर पेट्रोल मुफ्त मिलेगा। दक्षिण भारत इस मामले में हमसे कहीं आगे रहा है। वहां नेता तो पिछले कई चुनावों से मुफ्त खाना, कलर टीवी और सिलाई मशीन देते रहे हैं। फिलहाल पांचों राज्यों की जनता को इंतजार है नतीजों का। घी मिलेगा या लैपटॉप, दूध मिलेगा या पेट्रोल, यह सब-कुछ नतीजों पर ही निर्भर करता है।
इस बार चुनावों के नतीजे कुछ इस अंदाज में पेश हो सकते हैं। फलां राज्य में नहीं मिल पाएगा मुफ्त घी। राज्य में फ्री पेट्रोल देने वालों की जीत। जैसा कि आप जानते हैं कि इस बार चुनाव में नेताओं ने दल बदल करने में अभूतपूर्व सौहार्द दिखाया है। इस हद तक कि उन्हें पार्टी या विचारधारा के आधार पर तो पहचानना मुश्किल ही होगा। उनकी पहचान हो सकती है कुकर वाली पार्टी के विधायक या फिर घी वाली पार्टी के एमएलए। देश की जनता भी जान चुकी है कि गरीबी-बेरोजगारी दूर करने, जात-पात खत्म करने और खुशहाली लाने जैसे चुनावी वादों में कुछ रखा नहीं है।
वोटर के लिए गिफ्ट के साथ-साथ अपनी जाति और अपने मजहब वाला देखना तो बनता है। जाति-धर्म का मिलान हो जाने के बाद भी जनता चाहती है कि पार्टियां तुरंत दान महा कल्याण करें। पंचायत और नगर पालिका जैसे चुनावों में तो वोटर मतदान से पहले ही साड़ी, बिंदी, दारू और घड़ी जैसी चीजें लेकर कीमत वसूल कर लेते हैं। बड़े-बड़े क्रांतिकारी संगठनों के आंतरिक चुनाव दारू-मुर्गे की पार्टियों और बड़े संगठनो के पदाधिकारी फाइव स्टार दावतों के जरिए चुनकर आते हैं। कुल मिलाकर राजनीति ने मुफ्तखोरी को हमारा राष्ट्रीय चरित्र बना दिया है।
मुफ्त का माल उड़ाने के ख्वाहिशमंद वोटरों से नेताओं को कभी डर नहीं लगता। ऐसे वोटरों में कभी वह आग नहीं होती, जो अपनी सरकार से यह सवाल पूछ सके कि आपकी कानून व्यवस्था इतनी खराब क्यों है? कभी ऐसे सवाल नहीं उठते कि तुम्हारी डिवेलपमेंट की परिभाषा क्या है? हां, अगर बदलाव चाहते हैं, तरक्की पसंद करते हैं तो मुफ्तखोरी भूलनी होगी। सही लोगों का चुनाव करना होगा। अगर ऐसा किया तो फिर हातिम शेख जहरुद्दीन का यह शेर आप जैसे लोगों के लिए ही तो है-
किया था दिन का वादा रात को आया तो क्या शिकवा
उसे भूला नहीं कहते जो भूला घर में शाम आया

Thursday, December 22, 2016

मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसां हो गईं



सुधीर मिश्र
अहमद फराज़ साहब के एक शेर पर गौर करिए-
मैंने देखा है बहारों में चमन 
को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर 
बताने वाला
सारा मुल्क आजकल ख्वाब देख रहा है। तरह-तरह के सपने हैं। किसी को उम्मीद है कि देश सोने की चिड़िया बन जाएगा। कोई यह सोचकर खुश है कि अब देश को बदलने का दावा करने वाले खुद ही बदल जाएंगे। कोई बुरे सपने देख रहा है कि कहीं इनकम टैक्स का छापा न पड़ जाए। कोई यह सोचकर खुशी में सो नहीं पा रहा कि पड़ोस की हवेलीवालों को अब फकीर बनने में देर नहीं।
खैर, जैसी नींद वैसे ख्वाब। जैसा खाएंगे अन्न, वैसा रहेगा मन। तो मियां हुआ यूं कि ख़्वाब पूरे होंगे या नहीं, यह समझने के लिए एक शाम निकल पड़े। खाली पड़े एटीएम के बाहर एक फ्रेंचकट दाढ़ी वाला शख्स खड़ा था। शक्ल से ही लग रहा था कि कोई कवि टाइप आदमी है। मैंने पूछा-भाई पैसा है या नहीं एटीएम में। झुंझलाते हुए उसने जवाब दिया-दिखाई नहीं पड़ रहा है क्या। पैसा होता तो हम तुम अकेले खड़े होते यहां। गुस्सा वाजिब था। मैंने कहा-भाई थोड़ा सब्र करो, परेशानी दूर होगी। अच्छे दिन आएंगे। इतना कहना था कि उसके भीतर छिपे व्यंग्यकार ने विकराल रूप धारण कर लिया। बोला आएंगे नहीं, आ चुके हैं-देखिए न पूरा देश अपने पैरों पर खड़ा है।
मैंने बोला, इससे महंगाई तो कम हुई ही है। वह फिर फट पड़ा- जी हां, बिल्कुल महंगाई ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली है। दाल तो इतनी सस्ती हो गई है कि नमक को खुद पर घमंड हो रहा है। आपने देखा नहीं, पूरे प्रदेश में ब्लैक में बिक रहा था। टमाटर सड़कों पर कुचला जा रहा है। आलू विधानसभा के सामने मुफ्त बांटा जा रहा है। वह बोलता चला गया- तेल तो इतना निकल रहा है कि हम रूस, अमेरिका को निर्यात करने की हैसियत में आ चुके हैं। रोजगार इतना बढ़ गया है कि ट्रम्प को अमेरिकियों के भारत में हो रहे ब्रेन ड्रेन को रोकने के लिए कानून बनाना पड़ रहा है। अब यहां इतनी नौकरियां होंगी कि अमेरिकी नौजवानों को भर्ती किया जाएगा। अपन फिर बोल पड़े- महोदय कम से कम कालेधन वालों की तो आफत आ ही गई है। बैंकों में छापे पड़ रहे हैं। नए-पुराने अरबों के नोट पकड़े जा रहे हैं। उसने फिर से जवाब दिया-अरे भइया पूछिए मत। काले धनवाले तो बस अब फांसी लगाने वाले हैं। सारे फाइव स्टार होटल बंद हो जाएंगे। उनकी जगहों पर रिटायर फौजियों के ढाबे खुलेंगे। और आतंकवाद तो ऐसा मिटेगा कि चीन पाकिस्तान तक लाइन ऑफ कंट्रोल से पांच किलोमीटर पीछे अपनी सेनाएं रखेंगे।
अब अपन को भी गुस्सा आ गया। मैंने कहा, मज़ाक क्यूं कर रहे हो तो वह मुझ पर उल्टा चढ़ बैठा और बोला-शुरू किसने किया था। तब तक पास से गुजर रहे कुछ और लोग वहां आ गए। बीचबचाव शुरू हुआ तो मामला बढ़ने लगा। हम दोनों किनारे हो चुके थे और लोग आपस में भिड़े थे। बीच-बचाव के दौरान ही वहां किसी ने बहस शुरू कर दी थी कि नोटबंदी ज्यादा अच्छी है कि शराबबंदी। नोट और शराब से ऊपर उठकर मामला नेताओं तक पहुंचने लगा। मुझे लगा-मामला बिगड़ने वाला है। व्यंग्यकार कवि ने मुझे देखा और बोला-भाई जी, निकल ही लिया जाए यहां से। मामला बिगड़ रहा है। तब तक नोट से भरी बैंक की वैन वहां आ पहुंची। आनन-फानन में सारा झगड़ा खत्म हो गया। लोग एकदम से लाइन में खड़े हो गए। मैं सबसे पीछे था। मेरे आगे कवि खड़ा था और मैं ग़ालिब के इस शेर को याद करते हुए सोच रहा था कि चलो कम से कम लाइनों में लगने का सलीका तो आया।
रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसां हो गईं

Saturday, May 21, 2016

ढाई सौ रुपए में नैनीताल टूर-1989

1989 की बात है। 18 साल की उम्र थी। बचपन की मासूमियत के जवानी के नूर में तब्दील होने वाले दिन थे।
उस साल हम लोगों ने इंटरमीडियट का एक्जाम बस पास ही किया था। खुशी कुछ ज्यादा थी क्योंकि हममें से कुछ को तो पास होने तक की उम्मीद नहीं थी। जुलॉजी का पर्चा बेहद खराब हुआ था। इतना खराब कि साथ के एक लड़के ने जहर तक खा लिया था। अपन भी भयंकर डिप्रेशन में जी रहे थे। खैर नतीजे आए थे तो खराब पर्चे में ठीकठाक नंबर मिले। हमने यूपी बोर्ड में कॉपी जांचने की महान परम्पराओं को सिर माथे रखा और जश्न की तैयारियों में जुट गए। कुल छह दोस्त थे। मैं, अनूप श्रीवास्तव, रवि श्रीवास्तव और लक्ष्मण सिंह रावत तो जुबली कॉलेज के बायो ग्रुप के एक ही सेक्शन वाले थे। बाकी दो मैथ्स साइड वाले निश्चल भटनागर और रंजीत दास। मिलकर प्लान किया कि आठ दिनों के लिए नैनीताल चलेंगे। नैनीताल ही क्यों ? इसकी वजह थे जनाब रंजीत दास जो नए नए दोस्त बने थे। साथ पढ़ते नहीं थे। उनसे मुलाकात के निश्चल भटनागर के घर पर हुई थी।

1989 के उस दौर में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। रंजीत के पापा मरहूम गोपालराम दास जी उस वक्त उत्तर प्रदेश  के पर्यटन राज्य मंत्री थे। तब यूपी में उत्तराखंड भी शामिल था। हमारे आने जाने और ठहरने का इंतजाम वही करने वाले थे। इस इंतजाम से मैं बहुत खुश था। वह इसलिए क्योंकि तब तक मुझे घर से सिर्फ दो रुपए रोज का खर्च मिलता था। दसवीं तक तो सिर्फ एक रुपया और आठवीं तक दस पैसे रोज ही मिलते थे। ट्यूशन्स पढ़ाना शुरू कर चुका था पर वह पैसा भी सौ रुपए महीने से ज्यादा नहीं था। कुल मिलाकर जेब खाली ही रहती थी। पर दोस्तों पर भरोसा था। थोड़ी हिम्मत करके पापा से पैसे मांगे तो डेढ़ सौ रुपए मिले। इतने से काम नहीं चलना था। पड़ोस में नाना रहते थे। कुछ उनकी मिन्नतें कीं। सौ रुपए वहां से मिले। ढाई सौ रुपए इकट्ठे करने से पहले मैं एक बड़ी मुसीबत दूर कर चुका था। वह थी नैनीताल जाने की इजाजत। दरअसल मैं कभी भी घरवालों के बिना लखनऊ से बाहर नहीं गया था। उस वक्त अाज की तरह न मोबाइल फोन्स थे और न ही घर मेंं टेलीफोन लगा था। पापा जाने की इजाजत नहीं दे थे। वह डरते थे कि आठ दिन तक इतनी दूर नैनीताल में मैं दोस्तों के साथ महफूज रह पाऊंगा या नहीं। खैर अनूप और रंजीत ने घर आकर पापा को भरोसा दिलाया कि आप चिंता न करिए। कोई दिक्कत नहीं होगी। यानी अब हमारे पास अपनी जिंदगी के पहले आउट बाउंड पर खर्च करने के लिए पैसे भी थे और इजाजत भी। उस वक्त मुझसे ज्यादा खुश और अमीर शायद ही कोई हो।


जाने की तारीख करीब आई और हम सब नैनीताल एक्सप्रेस से नैनीताल के लिए रवाना हो गए। रंजीत साथ में नहीं थे। उसे किच्छा में उसके मामा के घर से लेना था। लिहाजा रात भर ट्रेन यात्रा करके हम सुबह किच्छा पहुंचे। फ्रेश होकर नाश्ता किया और टैक्सी से नैनीताल रवाना हुए। बादलों से भरी खूबसूरत पहाड़ियों और उनके बीच सुंदर नैनी झील को देखते ही सबकी थकान गायब हो गई। एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरह पहाड़। पूरा रास्ता ऐसा ही था। कभी बादल ऊपर हम नीचे और कभी बादल नीचे तो हम ऊपर। कुछ ही देर में हम नैनीताल पहुंच गए। टैक्सी स्टैंड पर हम सब ने अपने अपने सूटकेस गाड़ी से उतारे। अब हमें यहां से पैदल नैनीताल क्लब जाना था। रंजीत के पापा बागेश्वर के विधायक थे और वहीं उसका घर था। लिहाजा नैनीताल भी उसके लिए घर जैसा ही था। सामान उतारते ही कुलियों ने घेर लिया। हमने कहा नैनीताल क्लब, उन्होंने सामान उठाया और दौड़ते हुए चले गए। मैं तो  घबरा गया। मैने रंजीत की तरफ देखा तो वह हंसने लगा, बोला परेशान न हो, सामान सही जगह पहुंच जाएगा। खैर हम लोगों ने पैदल मार्च शुरू किया। गर्मियों की छुट्टियां थी। लिहाजा काफी भीड़ थी पर यकीन मानिए आज के जैसी नहीं। आप आराम से घूम सकते थे और चल फिर सकते थे। वहां की हरियाली, झील में तैरती नावों की रंगीनियां और खूबसूरती देखते देखते हम कब नैनीताल क्लब पहुंच गए, पता ही नहीं चला। दोपहर हो चली थी। रिशेप्सन की औपचारिकताएं रंजीत ने पूरी कीं। हमारा सामान क्लब के एक बड़े से हॉल में पहुंचाया जा चुका था। वहां कुल दस बेड थे। हर एक पर दो लोग सो सकते थे और हम थे सिर्फ छह। सब ने तय किया कि एक एक बेड पर एक एक व्यक्ति सोएगा। खैर तब तक जोरोंं की भूख लग रही थी। हम सब क्लब के डाइनिंग रूम में पहुंचे थे। मंत्री जी के मेहमान थे लिहाजा बेहतरीन आवभगत हो रही थी।
वैसे भी तब का नैनीताल क्लब आज के मुूकाबले ज्यादा खूबसूरत था। वहां का डाइनिंग हाॅल भी और डाइनिंग रूम भी। हाल ही मेंं पिछले साल जब बच्चों को लेकर मैं दोबारा नैनीताल क्लब गया तो वैसी रौनक नहीं थी। खैर अभी की बातें बाद में। पहले 1989 में वापस चलते हैं। खाना सर्व किया गया। बढ़िया दाल फ्राई, मिक्स वेज और आलू की सब्जी के साथ रोटी और चावल। जोर की भूख लगी थी। खूब जमकर खाया। क्लब के ड्राइंग रूम में कई फैमिली पहले से ही बैठी थीं। एक मोहतरमा हसन जहांगीर का उस वक्त का मशहूर हिन्दी पॉप -हवा हवा ऐ हवा खुशबू लुटा दे- सुन रही थीं। हसन जहांगीर पाकिस्तानी पॉप सिंगर था जो उस वक्त हिन्दुस्तान में बहुत पापुलर था। वैसे उस वक्त सबसे ज्यादा पापुलर आमिर खान थे जिनकी कयामत से कयामत तक हाल ही में रिलीज हुई थी। बहरहाल हम लोग भी अपना वॉकमैन लेकर गए थे। उस वक्त सबसे ज्यादा हिट गाने फिल्म लाल दुपट्टा मल मल का के थे। वही कैसेट हमारे वॉकमैन में लगा हुआ था। अब हम घूमने निकले। हममें से एक के हाथ में कैमरा थे तो दूसरे की कमर की बेल्ट में लटका वॉकमैन। हम इनका इस्तेमाल अदल बदल कर किया करते थे। उस वक्त तक फैशन की जरा भी तमीज नहीं थी। पैंट के साथ स्पोर्ट्स शूज पहना करते थे। लिहाजा हाथ में कैमरा या साथ में वॉकमैन हो तो खुद की नजर में अपनी हैसियत थोड़ी ऊपर हो जाती थी। यही सोचते थे कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे पर्यटक  खासतौर पर हमउम्र लड़कियां भी ऐसा ही सोचती होंगी। बात लड़कियों की छिड़ी तो यहां यह जिक्र जरूरी है कि उस पूरे टूर में हम सबके के लिए सबसे बड़ा आकर्षण लड़कियों को देखना और उनके बारे में बात करना ही होता था। हमारी फोटोग्राफी का फोकस भी हम दोस्तों के चेहरों पर नहीं बल्कि दांये बांये से गुजर रही लड़कियों पर ही रहता। उम्र का असर और परिवार से दूर होने की आजादी। शायद यह सबका मिलाजुला असर था।
मल्ली ताल से तल्ली ताल घूमते घूमते शाम होने को आई। बादल भी घिर आए थे। हम सब वापस नैनीताल क्लब यानी अपने ठिकाने की ओर चल दिए। रूम पर पहुंचकर कुछ देर आराम किया और फिर डाइनिंग रूम में डिनर के लिए पहुंचे। यहां यह बता देना जरूरी है कि उस वक्त तब हममें से कोई भी सिगरेट, बीयर या शराब नहीं पीता था। खाना खाकर एक बार फिर हम लोग टहलते हुए झील तक गए और देर रात वापस कमरे पर पहुंचे। अब आई सोने के बारी। दोपहर में हमने तय किया था कि हम सब अलग अलग एक बेड पर एक सोएंगे। पर तब तक प्लान बदल चुका था। हममें से सबको पता था कि निश्चल भटनागर को रात में डर लगता है। वह जब टॉयलेट गया तो सबने उसे डराने का प्लान बनाया। उसके वापस आते ही हम लोगों ने डरावनी कहानियां सुनानी शुरू कीं। जब डर का माहौल बनने लगा तो हमने तय किया कि अब हम एक बेड पर दो लोग सोएंगे। निश्चल मेरे हिस्से लगा। मैने और डरावनी कहानियां सुनानी शुरू कीं। नैनीताल क्लब के इसी कमरे में हुए एक लड़की की हत्या की झूठी कहानी और उसके आत्मा बन जाने के किस्से। तब तक बाहर जोरदार बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी। डर के माहौल का क्लाईमेक्स कुछ यूं बना कि मैं अचानक उठा और अनूप व रवि के बीच में जाकर लेट गया-यह कहते हुए कि मुझे उधर डर लग रहा है। अब निश्चल अकेला था। वहां सबसे प्रार्थना कर रहा था कि भाई मुझे अपने साथ लिटा लो और हम सब साजिशन उसे डराने के लिए नहीं माने। वह रात इतनी मजेदार बीती कि क्या बताएं। निश्चल रात भर हम लोगों को गालियां देता रहा और कोसता रहा। हम कब सो गए, पता ही नहीं चला। सुबह देर से उठे और सोकर उठते ही हंगामा हो गया। लक्ष्मण और निश्चल की रात के किस्सों को लेकर लड़ाई हो गई। यूं समझिए कि  मारपीट की नौबत आ गई। मैं बीचबचाव करने गया तो निश्चल मुझ पर भी हमलावर हो गया। खैर मुझे भीतर ही भीतर हंसी आ रही थी। किसी तरह सबको शांत कराया और हम नाश्ता करने नीचे पहुंचे।
उस दिन सबके अपने अपने प्लान थे। कोई एक राय बन ही नहीं रही थी।  जिनकी जेबों में ज्यादा पैसे थे, उनके प्लान अलग। जो मुझ जैसे थे, उनके अलग। बहरहाल मैने और निश्चल ने फोकट वाला प्लान बनाया कि चाइना पीक पर चढ़ा जाए। मेरे ख़याल से नीचे से पांच किलोमीटर की चढ़ाई तो होगी ही। बाकी लोग मल्ली ताल की ओर निकल गए। हम दोनों चाइना पीक के रास्ते पर। रास्ते भर खूब गप्पबाजी हुई। आधे रास्ते पहुंचते पहुंचते हम थकान से निढाल होने लगे। खासतौर पर निश्चल की हालत ज्यादा खराब थी। कुछ दूर और चलने पर वह कहने लगा-भाई मैं नहीं चढ़ पाऊंगा। मेरा कुछ दिन पहले ही ऑपरेशन हुआ है। यह सुनकर मेरी हालत खराब। छोड़कर जाने का सवाल नहीं था और पीठ पर लादकर ले न जा पाता। खैर जैसे तैसे हिम्मत भरकर धीरे धीरे निश्चल को भी ऊपर तक चढ़ा ले गया। वहां का नज़ारा वाकई मदहोश कर देने वाला था। ठंडी खुशबूदार हवा। चीड़ देवदार के लम्बे पेड़। एक छोटा सा रेस्ट्रां भी था वहां। टैम्परेचर नीचे के मुकाबले सात आठ डिग्री तो कम होगा ही। न कोई फ्रीज न बिजली। जरूरत भी नहीं थी। कोल्डड्रिंक की बोतले और जूस के पैकेट ऐसे ही ठंडे थे। कंजूस द ग्रेट सुधीर यानी मैने दस रुपए खर्च किए थे। जूस पिया और कुछ खाने को लिया। हम घंटों वहां बैठे रहे। वहां एक दूरबीन लगी थी। हमें दिखाने की कोशिश की गई कि दूर चीन देश यहां से नजर आता है। खैर हमें बादलो में छिपी कुछ चोटियों के सिवा कुछ नहीं दिखा। चाइना पीक मेरे लिए दूसरी दुनिया  जैसी थी। उस वक्त तब मैने इतनी सुंदर जगह नहीं देखी थी। मुकाबले के लिए मुझे देहरादून की सहस्त्रधारा और मसूरी का कैम्पटीफॉल ही याद आता था जहां मै घर वालों के साथ जा चुका था। चाइना पीक उन सबसे से ज्यादा सुंदर जगह थी। मुझे वहां के पेड़ों के तनों पर लिखे लड़के लड़कियों के नामों में दिलचस्पी थी। सोच रहा था कि यह नाम लड़कों ने अकेले ही आकर लिखे होंगे या उनकी साथी भी साथ आई होगी। और अगर आई होगी तो इस खूबसूरत जगह पर उससे ज्यादा खूबसूरत लम्हा ओर क्या होगा। मैने भी लोहे की एक कील उठाई और एक नाम खुरचने की कोशिश की। फिर अचानक मैं रुक गया। मैने अपने भीतर चल रहे एकतरफा प्रेम के युद्ध को युद्धविराम दिया। यह सोचकर कि जब दूसरी तरफ से भी ग्रीन सिग्नल होगा तो साथ में आकर दोनो नाम लिखूंगा।
दोपहर बीत रही थी। वापस चलना शुरू किया। चूंकि ढलान थी इसलिए अब उतनी थकान नहीं थी। हां थोड़ा संभल संभल कर चलना पड़ा क्योंकि बारिश में रास्ता गीला हो चुका था। शाम होते होते हम तल्ली ताल पहुंच चुके थे। तब मोबाइल नहीं होते थे। दोस्तों को सिर्फ मानसिक तरंगों से जुड़ना पड़ता था और हम जुड़े हुए थे। हमारे दोस्त हमें वहां घूमते हुए मिल गए। सैकड़ों दूसरे पर्यटकों के बीच। हम सब वहां से नैना देवी मंदिर गए। दर्शन किए। अगले दिन के लिए तय हुआ कि सब लोग बोटिंग करेंगे। अगले दिन हम लोगों ने बोटिंग की। एक बोट पर तीन तीन। खूब फोटोग्राफी हुई। अनूप और रंजीत बीच बीच मे अक्सर गायब हो जाते थे। कहां जाते थे नहीं मालूम पर हमें शक था कि यह लोग कुछ खर्च करना चाहते हैं। साथ में रहेंगे तो ज्यादा खर्च होगा इसलिए कट लेते हैं। तो छह सात दिन इसी तरह बीते। खूब घूमे। क्लब में रहने आए काफी लोगों से दोस्ती हुई। बीच बीच में आपस में झगड़े भी किए। हां और एक खास बात। इस दौरान हमारा मन किया कि कुछ घर वालों के लिए ले जाया जाए। मल्लीताल की बाजार में मैने आसपड़ोस व घर वालों के लिए माले पसंद किया। दुकानदार ने दाम कुछ ज्यादा बताए तो मैने  नहीं लिया। क्लब वापस आया तो हमारे ग्रुप में शामिल एक दोस्त ने कहा-तुमने माला क्यों नहीं लिया। मैने कहा-महंगा था। उसने फिर पूछा-कितने चाहिए। मैने कहा चार। उसने करीब बीस माले निकाले और दस मुझे दे दिए और बोला रख ले क्या याद करेगा। मैने कहा अबे इतने सारे, तूने कब लिए। जवाब मिला-जब मै मोलभाव कर रहा था। मुझे याद आ गया उसका हुनर। दरअसल हमारे दो दोस्तों को तकरीबन यह बीमारी सी थी कि वह कहीं भी खड़े हो जाएं तो चोरी कर लेते थे। हमारे क्लास में भी ज्यादातर लोगों के कलम चोरी हो जाते थे। बहरहाल अच्छे दिन बीते। फिर वापसी की तैयारी शुरू हुई। लौटते वक्त रुड़की से निकलने वाली एक तेज रफ्तार नहर व एक झरने पर भी वक्त बिताया। यह बातें 27 साल पुरानी हैं। काफी कुछ भूल चुका हूं पर फिर जाने कितना कुछ ऐसा है जो यादों के झरोखों से अक्सर झांकता है। उस तांकझांक की इस झांकी को कोशिश करके कैद कर लिया। ताकि आगे भूल भी जाऊं तो पढ़कर याद कर सकूं। उस वक्त ढाई सौ रुपए में मैने आठ दिन नैनीताल के गुजारे थे। बेहद खूबसूरत दिन। थैक्स टू रंजीत। हम सब दोस्त अब अलग अलग हैं। अनूप लखनऊ में ही डिप्टी सीएमओ है। निश्चल चंडीगढ़ के एक अखबार में पत्रकार। रंजीत के बारे में किसी ने बताया कि वह उत्तराखंड के सीएम का निजी सचिव है और बाकी लोगों से काफी समय से मुलाकात नहीं हुई।

Tuesday, May 17, 2016

भार्गव आंटी-आप बहुत याद आती हैं...

फोन, फेसबुक और व्हाट्सअप। सुबह से फोन चार्जर पर ही लगा हुआ था। सालगिरह मुबारक हो या हैपी बर्थ डे। यह सुनना आखिर किसे खराब लगेगा। पर जब कॉल पर कॉल चढ़ी रहे और व्हाट्सअप फेसबुक की घंटियां लगातार बजती रहें तो सोचना पड़ता है? आखिर कैसे इतने सारे लोगों का शुक्रिया अदा करूं?
 सोचा कुछ नया करता हूं। उन लोगों को याद करता हूं जो मुझे ऐसी ही बधाइयां उस वक्त देते थे,सेलिब्रेट करते थे जब मैं वह नहीं था जो आज हूं। उनमें पहला नाम याद आता है मुझे अपनी आंटी मृदुला भार्गव जी का। वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। मृदुला आंटी से मेरी मुलाकात 1993-94 के दौरान हुई। मैने पत्रकारिता में डिप्लोमा कोर्स के लिए लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ काम्युनिकेशन हजरतगंज में दाखिला लिया था। आंटी ने भी यही कोर्स ज्वाइन किया था। वैसे वह महिला कॉलेज में इंटरमीडियट क्लासेज में इंग्लिश पढ़ाती थीं। कोर्स के दौरान ही उनसे बातचीत होने लगी। कोर्स खत्म होते होते उनसे अच्छी पहचान हो गई। फिर मैने शाम के अखबार में नौकरी करनी शुरू कर दी। इस बीच नरही की भार्गव लेन स्थित उनके घर भी आना जाना होने लगा।
मेरे और मृदुला आंटी के बीच एक बेहतरीन केमेस्ट्री थी। शायद इसलिए कि वह जानती थीं कि मेरी मां नहीं हैं। और शायद इसलिए भी कि मैं जानता था कि वह अपने बेटे रजत को बहुत मिस करती हैं। रजत आंध्र प्रदेश कैडर के आईएएस हैं। जाहिर है काफी व्यस्त रहते थे। उनकी पत्नी भी आईआरएस थीं। लिहाजा उन दोनों के पास वक्त कम था। आंटी लखनऊ में ही जॉब करती रहीं, उन्हें यह शहर बहुत पसंद था। ऐसे में हमारी खूब बातचीत होती। मैं तब तक कुछ निजी कारणों से घर छोड़ चुका था। हॉस्टल में रहता था। लिहाजा अक्सर शाम का खाना आंटी के साथ होता। वह बड़े प्यार से तरह तरह की चीजें बनाकर खिलाती थीं। 
उनके पति यानी भार्गव अंकल इरीगेशन में चीफ इंजीनियर से रिटायर हुए थे। हर दर्जे के ईमानदार। लोग उन्हें झक्की समझते थे। एक एक्सीडेंट के बाद उनके दिमाग पर थोड़ा असर भी हुआ था। लिहाजा उनके काम को अक्सर सनक समझा जाता। वह रोजाना सुबह पांच बजे तड़के बोटेनिकल गार्डेन जाते थे। नियम के इतने पक्के थे कि चाहें जितनी मूसलाधार बारिश हो, वह छतरी लेकर घूमने जाते। तमाम सरकारी विभागों के खिलाफ उनके पास अलग अलग फाइलें थीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग छिड़ी रहती। उससे वह बेचारे अकेले ही लड़ रहे थे। एक बार वह लखनऊ संसदीय सीट पर अटल बिहारी वाजपेयी जी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव भी लड़ गए। उनका चुनाव चिह्न पतंग था और वह पीठ पर पतंग बांधकर गली गली वोट मांगने के लिए अकेले  घूमते। आंटी को अंकल का यह रवैया पसंद नहीं था। वह उन्हें समझा समझाकर हार चुकी थीं। मैं जब कभी भी शाम को आंटी के पास पहुंचता तो अंकल मुझे पहले घेर लेते। उनके पास मोटी मोटी फाइलें होती थीं। वह मुझे समझाने में लग जाते। खबर बनवाने के लिए। मैं निरीह सा आंटी की तरफ देखता। आंटी समझ जातीं। वह तकरीबन लड़-भिड़कर जबरदस्ती अंकल को ऊपर वाले कमरे में भेज देतीं। फिर शुरू होती मेरी आवभगत। मैं जब भी जाता तो सबसे पहले मुझे वह चिलगोजे और पिस्ते खाने को देतीं। उसके बाद चाय नाश्ता और फिर रात का खाना। उनसे खूब बातें होतीं। मैं अपनी एक एक बात उनको बताता। बचपन से लेकर तब तक की। घर के बारे में, दोस्तों के बारे में, यूनीवर्सिटी के बारे में और जर्नलिज्म के बारे में। इस बीच रजत भैया भी कभी कभार आते। उनसे भी अच्छी दोस्ती हो गई थी।
यह बात शायद 1996 की है। मई का महीना था। बात बात में मेरे मुंह से बर्थ डे का किस्सा निकला। दरअसल तब मुझे अपना बर्थ डे मनाना बहुत पसंद था। जब तक घर पर रहा, उस दिन खूब धूम होती। अक्सर कानपुर से रिश्तेदार आते थे। दोस्तों का जमावड़ा लगता। जर्नलिज्म में आने से पहले ही घर छूट चुका था। जेब में इतने पैसे कभी होते ही नहीं थे कि चार लोगों को भी ठीकठाक पार्टी दे सकूं। तब तक मैने लखनऊ यूनीवर्सिटी में एमए राजनीति शास्त्र में एडमिशन ले लिया था। ठीकठाक मित्रमंडली थी और पार्टी देने के पैसे नहीं। आंटी को पता चला तो उन्होंने खूब डांटा और कहा-मेरे रहते तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। तैयारियां शुरू कर दीं। पहले तो नए कपड़े दिलवाए। फिर केक ऑर्डर हुआ। उसके बाद दोस्तों की लिस्ट मांगी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस पार्टी में यूनीवर्सिटी से शिल्पी, अपर्णा, आराधना, पुराने दोस्तों में रंजना, प्रवीन और परिवार के कुछ लोग शामिल थे। उन्होंने तैयारियां शुरू कीं। वह लायंस क्लब की मेम्बर थीं। उनकी क्लब की दोस्तों ने तय किया कि वह लोग अपने अपने घर से कुछ कुछ बनवाकर भेजेंगी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि छोले और पनीर की सब्जी लामार्टिनियर वाली अग्निहोत्री आंटी के यहां से आए थे। उनका बेटा मीतू अमिताभ भी आया था। तो खैर बेहतरीन पार्टी हुई। खूब गाने गाए गए जमकर मस्ती हुई। एक बेहतरीन दिन था। आज अचानक जब काफी लोगों की बधाइयां आने लगीं तो मुझे आंटी याद आ गईं। सोचा उनसे जुड़ी यादों को ब्लॉग पर दर्जकर आप से शेयर किया जाए। शेयर करने के पीछे एक मंशा यह भी थी कि मैं उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता दर्ज कर सकूं जो परिवार से न होते हुए भी परिवार से बढ़कर कर रहे। शायद मेरी मां होतीं तो बिलकुल भार्गव आंटी जैसी ही होतीं। उनमें उतनी ही ममता थी, जितनी मेरी स्वर्गीय मां। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब कैंसर की आखिरी स्टेज में आंटी अस्पताल में तकलीफ से जूझ रही थीं तो मैने उनसे पूछा था-आंटी आप को क्या महसूस हो रहा है। उन्होंने जवाब दिया था-मुझे लगता है कि मुझे सफेद कपड़े पहने हुए देवदूत ऊपर खींच रहे हैं। वहां बहुत सुहाना मौसम है, जितना ऊपर जाती हूं मेरी तकलीफ कम होती जाती है। लेकिन नीचे से तुम, रजत और अपनी बेटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि-तुम लोग मुझे नीचे खींच रहे हो, यहां बहुत तकलीफ है, दर्द है। कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गईं। वह चली गई पर मुझे हमेशा याद रहती हैं। हमेशा यह अहसास रहता है कि आखिरी पलों में उनकी नजर में मेरा दर्जा वही था, जो उनके अपने बेटे और बेटी का था।

ज्ञान बाबा की पार्टी
बर्थ डे का जिक्र चल ही रहा है तो ज्ञान बाबा की पार्टी मैं कैसे भूल सकता हूं। मेरी पहली नौकरी थी संसार लोक अखबार में। पांच सौ रुपए महीने मिलते थे और फिर वही मुसीबत यानी बर्थ डे आ गया। दोस्तों की फरमाइश पार्टी की और जेब में पैसे नहीं। ज्ञान बाबा यानी ज्ञान सक्सेना नए नए मित्र बने थे। वह सीनियर थे और आज अखबार के रिपोर्टर थे। उन्होंने कहा, चिंता मत करो, बर्थ डे मनेगी। कोहिनूर होटल में सारे मित्र बुलाए गए। कई पत्रकार और अफसर भी आए। दोस्त और घर के लोग तो खैर थे ही। शानदार पार्टी हुूई। अब सवाल यह खड़ा हुआ कि पेमेन्ट कैसे और कितना किया जाए। कुछ पै
से ज्ञान बाबा ने डाले, कुछ हमने और बाकी लिफाफे फाड़कर निकाले गए। मैनेजर बाबा का दोस्त था। सो नो प्रॉफिट नो लॉस पर भुगतान कर दिया गया। सबने खूब वाह वाह की पर मुझे उसी पार्टी में मशहूर कार्टूनिस्ट मंजुल का बनाया एक ग्रीटिंग कार्ड संजीव भाई ने दिया। उसमें स्प्रिंग पर बैठा एक चूहा जोर से जम्प ले रहा था। किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं  पर मैने व्यंग्य को समझ लिया। मंजुल का इशारा किस ओर था। मुझे चूहों वाली छलांग नहीं लगानी थी लिहाजा उस तरह की पार्टी मैंने फिर कभी नहीं की। अपनी हैसियत को समझा और उसी के हिसाब से जीने का फैसला किया।

Monday, April 25, 2016

कोई सरकार बोलेगी कि हम भ्रष्ट नहीं


कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर है-
नज़र मिला न सके, उससे उस निगाह के बाद
वही है हाल हमारा, जो हो गुनाह के बाद
खुदा कसम उत्तराखंड हाई कोर्ट ने तो गजब कहा। जज साहब ने कहा-अगर भ्रष्टाचार पर सरकारें गिरने लगीं तो कोई भी सरकार पांच साल पूरे नहीं कर पाएगी। क्या खूब भरोसा था न्यायाधीश महोदय को। पूरे देश में एक भी सरकार ऐसी नहीं निकली, जिसका मुखिया सीना तानकर कह सकता कि जी मैं हूं, मेरी सरकार में भ्रष्टाचार नहीं होता। और कहे तो कौन कहे। भ्रष्टाचार का हाल तो यह है कि बाबू कहे जाने से नाराज होने वाली कौम के अफसर दफ्तर की कुर्सी से उठकर सीधे जेल जा रहे हैं। कुर्सी और पैसों का ऐसा मोह है कि जेल जाने का डर ही नहीं रहा। खासतौर पर कुछ ब्यूरोक्रेट्स तो मानो इसके लिए घोड़े पर सवार हैं।
अब लखनऊ का ही उदाहरण देख लीजिए। नोएडा में लैंडयूज का खेल करने वाले आईएएस साहब कुछ दिन पहले जेल चले गए। चीफ सेक्रेटरी रह चुकीं मोहतरमा पहले ही वहां जा चुकी हैं। फिर भी उनके बिरादर डर नहीं रहे। यहां घर, दफ्तर और बाजार का फर्क ही मिटता जा रहा है। अब बताइए जिस आदमी ने रिहायशी इलाके में सुकून से रहने के लिए घर लिया हो, उसे यह कैसे अच्छा लगेगा कि बगल के घर में शराब की दुकान खुले, होटल-रेस्त्रां चले या फिर दुकान-शोरूम बने। फिर भी नहीं जी, हम तो अवैध को वैध बनाकर रहेंगे। तो बनाइए... लेकिन ठहरिए, सोचिए, जैसे नोएडा वालों के दिन बहुरे हैं, वैसे आप के भी बहुर सकते हैं। एवरी डॉग हैव हिज डे। खैर, बात घोड़े पर सवार लोगों की हो रही थी। घुड़सवारों से पहले घोड़ों की भी बात कर ली जाए। भारतीय इतिहास में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बाद शायद शक्तिमान सबसे ज्यादा चर्चित घोड़ा हुआ है। देहरादून में एक विधायक जी ने कथित तौर पर उसे लाठी से मारा था। अब घोड़े को आखिरी सलामी देते अफसरों की फोटो अखबारों में छप रही है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों के नेता उसकी मूर्ति लगवाने की बात कर रहे हैं, जो विधायक जी घोड़े पर हमले को लेकर जेलयात्रा तक कर आए हैं, वह भी आंसू बहा रहे हैं। शक्तिमान कोई सूरज का सातवां घोड़ा नहीं था। छोटे-छोटे बच्चे तक पूछ रहे हैं कि शक्तिमान को लेकर सब इतने दुखी क्यों हैं?
 तो साहब जब किसी राज्य की सत्ता एकसाथ दो घोड़ों पर सवार होती है तो ऐसा ही होता है। उत्तराखंड की कुछ दिनों से ऐसी ही हालत है। कभी लगता है बीजेपी तो कभी कांग्रेस। शहीद शक्तिमान महज एक घोड़ा नहीं, बिम्ब है, प्रतीक है सियासी रस्साकशी का। शक्तिमान के शोर में बहुत सी बातों पर चर्चा नहीं होती। इस घोड़े के चक्कर में उस हॉर्स ट्रेडिंग को दबाया जा सकता है, जो पहाड़ों पर चल रही है। इसमें नौ 'हॉर्सेज' की जान आफत में है। इस शोर से उस राजनीति को नंगा होने से ढका जा सकता है, जिसमें सरकार को बचाने के एवज में करोड़ों के 'टॉपअप' की बातें होती हैं। कुल मिलाकर मामला घोड़े और घास का है। सही भी है। घोड़े घास से दोस्ती कर लेंगे तो खाएंगे क्या। पर इस बार की घास ऐसी है कि जो न खाते बनती है और न उगलते। हाई कोर्ट है कि वह किसी को भी इतनी फुरसत नहीं दे रहा कि कोई घोड़े बेचकर सो सके। घोड़े को मारने वाले भी परेशान हैं और उसकी मौत पर दुख जताने वाले भी। शक्तिमान चिंतन जारी है। उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना सभा हो रही हैं। ट्विटर ट्रेंड हो रहे हैं और फेसबुक पर आंसू बहाए जा रहे हैं। कोई इस बात पर चिंता नहीं जता रहा कि हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? देश में एक भी सरकार ऐसी नहीं, जो भ्रष्टाचार के मसले पर सत्ता छीने जाने की हालत में अपना टाइम पूरा कर सके। सवाल बड़ा कठिन है। जवाब अपने पास भी नहीं। हम भी शक्तिमान की बात करते हैं। उसकी तरफ से कैफी आज़मी का एक शेर-
वो तेग मिल गई जिससे हुआ है कत्ल मिरा
किसी के हाथ का इस पे निशां नहीं मिलता
अब देखने वाली बात है कि इस घोड़े के कत्ल में किसी को सजा मिलती है या नहीं।

Saturday, April 16, 2016

जाति ही पूछो साधु की


कबीर दास जी ने कहा है-
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान। 
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान॥
हाल ही की बात है। एक मित्र, जो अब सरकारी अफसर हैं, उनका फोन आया। कहने लगे-भाई साहब 18 को शादी है छोटे भाई की। आइएगा जरूर। मैंने कहा-जरूर आऊंगा। उन्होंने दोबारा जोर देकर कहा-नहीं भाई साहब आपकी उपस्थिति जरूरी है, आप तो जानते ही हैं, हम लोग कान्यकुब्ज ब्राह्मण हैं। भाई की शादी दूसरी जाति में हो रही है, इसलिए माहौल ठीक नहीं। आप खड़े होंगे तो ठीक रहेगा। मैं सोच में पड़ गया। अच्छे खासे संपन्न लोग। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि सिविल सर्विसेज पास करने वाली विद्वता भी है। इसके बावजूद गैर बिरादरी में विवाह को लेकर इतना अपराधबोध। समाज का यह दबाव क्यों है? आखिर दो पढ़े-लिखे शख्स जाति बंधन भूलकर एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, तो इसमें रिश्तेदारों और पड़ोसियों को क्यों दिक्कत होनी चाहिए।
लेकिन दिक्कत है। लोग परेशानी में रिश्तेदार की मदद भले ही न करें, पर शादी ब्याह में अगर बिरादरी से बाहर निकले तो नाक-भौं जरूर चढ़ा लेंगे। जीजा-फूफा आने से मना कर देंगे। ताऊजी ऐसे मुंह फुलाकर बैठ जाएंगे कि मानो दुनिया ही उजड़ गई हो। आजादी के इतने साल बीत गए। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई पर पुरानी पीढ़ी अब भी बदलने को तैयार नहीं। इसकी वजह है। लोग कबीर दास जी की नहीं सुनते, नेताओं की सुनते हैं। समाज के भीतर राजनीति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि राजनीति में जाति ही सबसे पहले पूछी जा रही है। उत्तर प्रदेश के चुनाव होने वाले हैं। चारों तरफ गंध मची हुई है। तेरी जाति, मेरी जाति। इस जाति का वोटबैंक उस जाति का वोटबैंक। आदमी इंसान नहीं, एक जाति है, एक खास जाति का वोट है। आम आदमी तो आम आदमी, महापुरुषों और राष्ट्रनायकों का हाल भी ठीक नहीं। केंद्र सरकार बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर की जयंती 10 दिन तक मना रही है। उत्तर प्रदेश सरकार भी यह साबित करने में कतई पीछे नहीं कि बाबासाहेब का उनसे बड़ा अनुयायी कोई नहीं। जो पार्टियां सरकार में नहीं हैं, वह भी बाबासाहेब की जय जयकार में लगी हैं। सवाल उठता है किस लिए? क्या वाकई में इन सभी राजनीतिक दलों की श्रद्धा बाबासाहेब के विचारों में है या फिर दलित नायक की उस छवि में, जो आजादी के बाद से अब तक बड़े करीने से गढ़ी गई है, जो वोट दिला सकती है।
बाबासाहेब राष्ट्रनायक थे। वो देश का भला करना चाहते थे। जातिवाद खत्म करना चाहते थे। वो चाहते थे कि ऐसा स्वस्थ समाज हो, जिसमें जातियों का अस्तित्व न हो। भेदभाव और ऊंच-नीच न हो। अमीरी-गरीबी और अर्थशास्त्र को लेकर उनके मौलिक विचार थे। इनका जिक्र नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन तक ने किया। क्या उनके आर्थिक विचारों का जिक्र नेता करते हैं? सही बातों से वोट नहीं मिलते। लिहाजा कोई भी दल जातिवाद मिटाने की बात नहीं कर रहा। सबका फोकस सोशल इंजीनियरिंग है। मतलब कैसे अधिकतम जातियों का वोट अपने साथ जोड़ें। यही वजह है कि राष्ट्रनायकों को उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बजाए जातियों से जाना जाता है। यह हमें नेताओं ने ही बताया है कि गांधीजी बनिया थे, डॉ राजेन्द्र प्रसाद कायस्थ थे, वल्ल्भभाई पटेल कुर्मी, परशुराम ब्राह्मण और महाराणा प्रताप क्षत्रिय थे। सैम पित्रोदा जैसे आईटी क्रांति लाने वाले शख्स को बढ़ई नेताओं ने ही बताया। उससे आगे की कड़ी में सियासी मैनेजर आ गए हैं। सियासी गठजोड़ अब इस बात पर नहीं होंगे की दलों के विचार मिलते हैं या नहीं। गठजोड़ इस बात पर होंगे कि वोटबैंक जुड़ते हैं या नहीं। अब सवाल है कि क्या यह जातिवाद ऐसे ही चलता रहेगा। जवाब है नहीं, कुछ तो बदलेगा। हमारे ब्राह्मण मित्र के भाई जैसे हजारों नौजवान लड़के-लड़कियां अब दूसरी जातियों में शादी कर रहे हैं। वही इस ऊंच-नीच को मिटाएंगे। देश को बदलेंगे। फूफा-ताऊ, जीजा और मामा टोका-टाकी करते हैं और करते रहेंगे। उनके लिए दूसरी जातियों में शादी करने वालों की तरफ से सुदर्शन फाकिर का यह शेर-
कुछ देर ठहर जाइये ऐ बंदा ए इंसाफ
हम अपने गुनाहों में ख़ता ढूंढ रहे हैं
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Friday, April 15, 2016

Flower of Sycamore


By Sudhir Misra

It is rainy season. The juicy flowers of Indian Lilac are also dripping. The nursery of Khare grandfather is also full of greenery. The tree at the outer corner of the nursery is full of red Sycamore.Within the nursery, guava, mulberry and navel orange are also growing. With a lot of effort grandfather has cultivated navel orange in the heat of Lucknow, which is usually out of reach for children studying in class fourth like Chitu. Yes, of course in the guava season the nursey gets desolated. Despite of keeping a very tight watch by Khare family, the children army somehow find the opportunity to infiltrate the nursery.
With the bunch of some older children Chitu also gets something. Once they get the opportunity then the children don’t leave anything, be it guava or navel orange no matter if it is raw or ripe, they just fill their pockets. Today also, this team of grasshoppers have ravaged the nursery. When Khare grandfather saw the nursery he got shocked.
Khare grandfather went to complain. The first target was Chitu.The door was knocked and a voice from out of the house came-Hey Mishra ji, are you in the house?Chitu’s father has just arrived home. He has some special habits. Whenever he returns home from somewhere, for at least half an hour his temper remains very high. Everybody in the house as well as outside is afraid of his temper. But the nursery of poor grandfather was desolated. The first name on the list ofthe people responsible for this devastation was Chitu.
At the third call of Mishraji, without a shirt and with just a cloth wrapped around his waist he came out and said – tell me.Khare grandfather was shocked when he saw his dire look and said – nothing Mishraji, Iwas saying that take care of Chitu a bit. If he will roam around with Firoz, Chand and Nanke, then he will be a spoilt brat.Today these people have destroyed the whole nursery. I am just saying that if he needs guava or navel orange, he should come to me, I will give him myself.After saying this Khare grandfather quickly got past him.
The weather was very humid at that time.However, whenever Mishraji gets angry, Chitu automatically gets drenched in sweat. Mishraji first increased the volume of radio. Then he picked up the wooden rod that is used to clean cloths and started beating Chitu, turnig his back red.With this he started saying – do I keep you hungry that you are doing such things and defaming in the whole society. Chitu folded his hands and began to weep.
'Dad, Iwas plucking the Sycamore. I did not go to the nursery. "
Hearing this Mishraji dictated – you will not get dinner tonight. Go eat Sycamore now.
All these things stayed within the family. People outside could only listen to the songs. Mishraji is very well mannered. Whenever he beats someone in the home, he increases the volume of the radio. So that people outside cannot hear the shouting and crying of the family members.
Chitu quietly went on the terrace.Just then Aunt Spoke – take Raju outside, I have to prepare dinner.Aunt is Chitu’s step-mother.Chitu was furious (thought) – First, Iwon’t be getting dinner & now I have to take Raju out also.One and half year old Raju was crying loudly.Well Chitu held Raju in arms and reached underthe sycamore tree near the temple on the hill. This fig tree was not only his, but was a friend of all the children as well as the old people of the neighborhood. From panchayat to the country's politics, everything is discussed under its shade.
It isevening time. Chachi (aunty) is already sitting. Chachi is chachi of the entire neighborhood. Both Mishraji and Chitu calls her Chachi.The one thing that Chitu liked very much about her was that despite of the high volume of the radio, she could easily understand who was beaten by Mishraji.Looking at the crying face of Chitu she asked – what happened?He was already very furious. He started to cry instantly and said – I was beaten by my father.Chachi instantly wiped his tears from dhoti drape and asked – your aunt did not save you? He did not say anything.Chachi with all the women sitting with her started discoursing – this is what happens after the death of mother. Mishra got married again even before 3 months were over. Now the children have grown Cichhaledr.Shuklain joined the chorus as well.Chitu became sadder.Raman uncle appeared to come fromthe front.Seeing chachi, uncle greeted her.Chachi said – where have you been? You have become like the flower of Sycamore.Chitu did not pay attention to what else they talked about. But flower of Sycamore aroused his curiosity.He asked - Chachi what is Sycamore’s flower? Chachi asked – Have you ever seen a Sycamore’s flower? He said no.Chachi said – even I have not seen it, but my grandfather had a flower. He reaped plait of a witch. The witch brought the flowerfor him.Chitu's eyes widened ... Witch’s plait."Yeah ... So if someone steals Witch’s plait of hair, the she becomes his slave throughout his life. MyGrand father returned her plait only after she brought her the flower. "Expressions of flashbacks appeared on Chachi’s face – when my grandfather had the flower, he had a large landlordism. Even the Englishmen came to meet him. Then the flower was stolen.
Chitu did not understand that what was so special in the sycamore flowers? Chachi said - Chitu if you get the sycamore flower, then all your desires will come true.Then Chachi was called back..Chitu also went home. Raju was crying, he handed him to Aunt.Mishraji came out frombehind the scenes in the wardrobe.Then the order followed – go upstairs.Chitu got it, it was the everyday’s routine. A half bottle of English wine opens every other day. Roasted cashew nuts, shredded cheese and lettuce.Yes, the special thing was that no one could see him drinking.Mishraji believed that drinking alcohol is bad. Therefore, he should not drink it in front of children.However, he used to send Chitu to fetch the cigarettes.Chitu was hungry by then. The sounds of his empty stomach could be heard clearly and tears were flowing from his eyes.He started to think that how good it would have been if his mother was still alive. His father could not dare to beat him like this. Mother would have taken the beating on herself but would have not allowed his father to beat Chitu.Suddenly he remembered how good ladyfinger dish she used to prepare, with breads.God, can Mummy not come back? Suddenly Chitu remembered what Chachi told him about Sycamore flower and wish fulfillment.What if he gets the sycamore flower? Yes, then he can resurrect his mummy.Chitu began to recall the face of his mummy lying in the hospital.Doctors were saying – its ninety percent burn, no hope.From feet to head, she was badly burnt.Facial skin was hanging fromall over herface.Then she called Chitu.Chitu saw her condition and began to cry. Mummy's face was strangely expressionless. Probably she had stopped feeling the discomfort and pain.She said: Come here son.Chitu went and stood beside her.She looked into his eyes and spoke without moving her head or neck - son, study well, become a great man and yes, always listen to your father.She then closed her eyes.Chitu was sent outside.Around five o'clock in the morning she died.
Chitu’s chain of thought broke – he started to think what did mother say before going to the house ofthe Lord? Father is so merciless. He beats me so much. He does not even give me food.Then the voice of Mishraji came - come downstairs.Everyone in the family have had their dinner and had gone to be.d.Mishraji was sitting on the bed in the balcony. Both hands were leaned backwards while. The sky was cloudy and joy on liquor was on the face of Mishraji.Chitu knew now was the time for Dad's lecture, but suddenly philosophical expressions appeared on his face and he began to speak - what amI? AmI your enemy? I know this is what you think, but you do not know for your father how important the respect of his children is. I don’t care how I lived, but if someone will come and say something about my children then... his mother....Then suddenly tears started coming from his eyes.What do you think? Do I get pleasure from beating you or keeping you hungry? But this harassment is important, otherwise you will not become successful when you grow up. You will be like me.Then suddenly he got up and brought dinner from the kitchen and kept it in front of Chitu.Suddenly he started to like Papa. He jumped on the food.
Mishraji went to sleep.Chitu had quelled the appetite of his stomach but the pain of his back increased.He started thinking about his father – in the morning he will again get angry on some orthe otherthing and will again beat him. He again recalled his mother. The thought of sycamore flower was still dancing in his mind. All the people were asleep. He quietly opened the outside doorlatch. The time was quarter to twelve in the night. Chachi said that sycamore flower blossoms exactly at twelve at night. Genie and Apsara come to pluck them. Into the darkness, Chitu timidly reached underthe tree. Nothing wasvisible. Through the green leaves, the thick branches of Sycamore were looking like giant’s hands and feet. It was already twelve in night. There seemed to be no flower. At last, with no success in finding the flower he returned home. He could not sleep for a long time. His back was hurting. Tears came floodingFrom his eyes.
This childhood process of Chitu went on for a very long period. Whenever Chitu was beaten or he was in any difficulty or suffering, the Sycamore flower seemed to be his only hope. There was always hope that one day he will definitely find the Sycamore flower.He will keep his wish in front of the flower – resurrect my mummy. Chitu himself didn’t know when he began to understand this truth. The truth that the Sycamore flower never blooms nor his mother who has gone to the home of God, will return.
.. Now he does not go underthe Sycamore treeAs he has grown up now.


Translated by Vasundhara Singh