Thursday, September 30, 2010

बच्चो...आप भी सीखो इन ...स्पेशल चिल्ड्रन... से

यह प्यारी नन्ही गुडिय़ा ब्रेल लिपि में लिखी एक किताब पढ़ रही थी। उसकी एक फोटो को मैंने फेसबुक पर डाला। तुरंत मेरे मित्र कवि सर्वेश अस्थाना का एक कमेंट आया। कविता की शक्ल में। लाइनों पर गौर करिए-



अंतरमन की आंखों से, हमको तो -कुछ दिखता है
स्पर्श से हम पढ़ लेते हैं, हम को को कु लिखता है
ये कोमल नाज़ुक हाथ मेरे, आंखों का का निभाते हैं
वो अक्षर पढ़ते जाते हैं, हम भाव समझ मुस्काते हैं...






और सच में अगर कोई भी व्यक्ति संवेदनशील है तो श्रीगंगानगर के श्री जगदंबा अंध विद्यालय के इस परिसर में रहने वाले ..स्पेशल चिल्ड्रन.. से मिलने के बाद भावुक हुए बगैर नहीं रह सकता। यह बच्चे वाकई विशिष्ट हैं। इसलिए नहीं कि उनमें किसी तरह की अपंगता है। बल्कि इसलिए कि उनमें कोई न कोई ऐसी विशिष्टता है जो आम बच्चों में नहीं होती। उनके इस खास किरदार के लिए परमहंस स्वामी ब्रह्मदेव जी और उनकी टीम वाकई काबिलेतारीफ है।
संस्थान अपना 30वां स्थापना वर्ष मना रहा है। दो और तीन अक्टूबर को यहां के पुराने विद्यार्थियों का महासम्मेलन भी होने जा रहा है। ऐसे में विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रतापसिंह के आमंत्रण पर मैं वहां गया। एक लाइन में अगर इस विद्यालय को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं..देश में मूक, बधिर और नेत्रहीन बच्चों के गिने चुने विद्यालयों में से यह एक है..। देश के विभिन्न राज्यों के ..स्पेशल चिल्ड्रन..यहां पढऩे आते हैं। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी। कोई फीस नहीं। जो देने की स्थिति में हैं, वह अपने बच्चों के अलावा दूसरे का खर्चा भी उठा सकता है। जो नहीं दे सकता, वह ऐसे ही अपना बच्चा यहां रख सकता है। नेत्रहीन बच्चों के लिए दसवीं और मूक-बधिर बच्चों के लिए आठवीं तक की पढ़ाई यहां कराई जाती है। ब्रेल लिपि की किताबें, सांकेतिक भाषाओं को समझाने वाले यंत्र, छात्रावास, भोजन और इन सबसे बढ़कर शिक्षकों और देखभाल करने वालों का प्यार इस विद्यालय की खासियत है। स्वामी ब्रह्मदेव ने बताया-..ये बच्चे सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं, डांट-पिटाई से वह टूट जाते हैं..आमतौर पर घरों में इनकी बात समझ न पाने के कारण घर वाले ही उनसे दुव्र्यवहार करते हैं, ऐसे में वह चिड़चिड़े या गुस्सैल हो जाते हैं..पर यहाँ रहने वाले बच्चों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं।
मैंने कई मूक-बधिर बच्चों को गणित के खास फार्मूलों के जरिए कठिन से कठिन सवालों को हल करते देखा। वह उंगलियों व संकेतों की भाषा से अपने टीचर की बात व सवाल समझ रहे थे। फिर उन्हें ब्लैकबोर्ड पर हल कर देते। मेरे जन्म की तारीख के दिन कौन सा दिन था, यह एक बच्चे ने चुटकियों में सही-सही बता दिया। एक दस साल की नन्ही नेत्रहीन बच्ची ने ब्रेल लिपि में लिखी किताब का पाठ पढ़कर सुनाया। उसकी होशियारी दंग करने वाली थी। यहां रोजी-रोजगार के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। मूक-बधिर लड़कियों की एक टोली हंसते-खिलखिलाते हुए बैग बनाने में जुटी थी। उनकी टीचर ने बताया कि यह लड़कियां न सुन सकती हैं और न बोल सकतीं हैं पर खुद को अभिव्यक्त करना उन्हें अच्छी तरह से आता है। कोई भी व्यक्ति अगर कुछ देर उनके साथ रह जाए तो वह उनकी सारी भाषाएं समझ सकता है। यह सब देखकर मुझे लगा कि अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ यहां आकर इन विशिष्ट बच्चों को दिखाना चाहिए। यह बोल, सुन और देख नहीं सकते। फिर भी अपने टीचर्स की प्यार भरी भाषा से सबकुछ समझ जाते हैं। डांस टीचर सनी ने बताया कि यहां के मूक-बधिर लड़के बहुत अच्छे डांसर हैं। जिन कठिन स्टेप्स को सामान्य लड़के सीखने में महीना भर लगाते हैं, वह यह चार दिन में ही कर लेते हैं। बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था भी बहुत दुरुस्त है- अलग-अलग समय पर लंगर चलते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर भी यहां है। यह सेंटर नेशनल स्कूल फॉर द विजुअली हैंडीकैप्ड देहरादून से संबद्ध है।

Saturday, September 18, 2010

उसका जाना: एक कालखंड का अंत

वो मेरा सबसे करीबी, सबसे अजीज़ और हमेशा साथ रहने वाला था। हर वक्त ऐसे मेरे साथ चलता, जैसे साँसें। सोते जागते, उठते-बैठते, यहाँ तक कि बाथरूम और टॉयलेट में भी। वो यानी मेरा नोकिया-एन 72 मोबाइल। काले रंग का था वो। उसका नीला स्क्रीनसेवर हमेशा मेरी आँखों में बसा रहता। 17 सितम्बर 10 को महज पांच साल की उम्र में वो मेरा साथ छोड़ गया। या यूँ कहिए कि मेरी गलती से बेचारा परलोक सिधार गया। पिछले कुछ समय से मैं उसे कमीज के बजाए जींस की पिछली जेब में रख रहा था। बुरा हो उन वैज्ञानिकों के उल्टे-सीधे रिसर्च पेपर्स का जिन्हें पढ़-पढ़कर मैंने ऐसा किया। वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि मोबाइल ऊपर की जेब में रखने से इसका सीधा असर दिल पर पड़ता है। मोबाइल तरंगें और वाइब्रेशन आप को दिल का मरीज बना सकती है। मुझे भी पता नहीं क्या खुराफात सूझी? दिल का मर्ज देने वाली तमाम दूसरी चीजों को छोड़ मैंने अपने प्यारे मोबाइल को ही दिल से दूर कर दिया। विश्वकर्मा पूजन के वक्त दफ्तर में धम्म से जमीन पर बैठ गया। ध्यान ही नहीं रहा और बेचारा नोकिया चकनाचूर हो गया। मैं अवाक रह गया।
भगवान विश्वकर्मा की ओर देखा और मन ही मन कहा-हे भगवान क्या गलती हो गई...
मैं इतने जोर से बैठा था कि मोबाइल की आत्मा रूपी सिम और प्राण वायु बैटरी को छोड़कर बाकी सारा नश्वर शरीर स्वर्गवासी हो गया। आसपास बैठे लोग मातमपुर्सी में जुट गए। एक-दो साथियों ने ध्वस्त मोबाइल को नोकिया केयर के वेंटीलेटर पर ले जाकर मरी चुहिया को गोबर सुंघा कर जिलाने जैसी कोशिश भी की। पर सब नाकाम। अब यादों के सिवा कुछ नहीं था। एक-एक करके तमाम पुरानी बातें याद आने लगीं। कितने शौक से मैने उसे तेरह हजार सात सौ रुपए में खरीदा था। बेटा शुभांग बड़ा हो रहा था। उसे भी मेरा मोबाइल बहुत पसंद था। वह कभी वीडियो बनाता तो कभी गेम खेलने लगता। अक्सर मोबाइल को लेकर वह मुझसे डांट खाता था। वैसे मैं खुद भी इस मोबाइल को लेकर अक्सर डांटा जाता। हमारी गृहलक्ष्मीजी की आदत है कि वह मोबाइल पर बात करते वक्त बड़ी गहराई मेरी फेस रीडिंग करती रहती हैं। चेहरे के भावों को देखकर उस अदृश्य आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश करना उनका पसंदीदा शगल है। बातचीत के वक्त मेरा खिला चेहरा, चहकती आँखें और हल्की मुस्कराहट नजर आती तो खैर नहीं। अगर मैं अपने मनोभावों को छिपाने की कोशिश भी करता तो कभी उनकी सूक्ष्म निगाहों की एक्स-रेज से बच पाया। उन्हें यह बिलकुल पसंद नहीं कि कोई महिला मुझे फोन करे। अक्सर मोबाइल झगड़े की वजह भी बन जाता। मोबाइल की डेड बॉडी देखकर मैं फिर सोचने लगा कि श्रीमती जी शायद अब जरूर खुश होंगी। ठीक उसी तरह जब मैंने अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर दान की थी। तब उन्होंने चैन की लम्बी साँस ली थी। मोबाइलफोन की तरह ही श्रीमती जी को मेरी स्कूटर की पिछली सीट से बेहद एलर्जी थी। उस पर बैठते वक्त हमेशा उनके मन में एक नकारात्मक भाव आता कि शादी से पहले जाने कितनी इस पर बैठी होंगी।
खैर, स्कूटर की बात फिर कभी। अभी तो हमें अपने मोबाइल को ही श्रद्धांजलि देनी है। जाने कितनी मिस कॉल्स उसमें दर्ज थीं। जाने कितनी टॉक वैल्यू उसमें खर्च हुई। कभी हिसाब करने को मन ही नहीं किया। मुझे याद है कि किस तरह अपने प्यारे मोबाइल को एक बार जब मैंने बेसाख्ता चूम लिया तो आसपास देखने वालों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा था। उन्हें लगा कि जरूर फोन पर कोई रासलीला हुई है। हकीकत यह थी कि उस दिन फोन पर बताया गया था कि मुझे यूरोप जाने का वीजा मिल गया है। वो कितना अजीज़ था, इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बात करते-करते अक्सर वह गरम हो जाता। इतना गरम कि कान जलने लगते, फिर भी मैं उसे नहीं हटाता था। कभी-कभी सात-आठ किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती और मुझे पता भी नहीं चलता कि मैं कितनी दूर चल आया हूं। ऐसा था मेरा एन-72...
मोबाइल और भी जाएंगे पर अब वो कभी नहीं आएगा। असमय उसका जाना, जाने क्यों मुझे एक कालखंड के अंत सरीखा लग रहा है...
मेरी यादें, मेरे अफसाने और वो रूठने-मनाने की बातें लेकर वो सदा के लिए चल बसा...

Wednesday, September 15, 2010

वो सूखे झड़ते पत्तों को

वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था
उन चुर-मुर करते पत्तों की आह कभी न सुनता था
रोते थे, वो तड़पते थे ..पर हम को तो मालूम न था
उन तिनका-तिनका पत्तों को ये दर्द मुझी सा होता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

वो पत्ते थे, हाँ पत्ते थे पर क्यूं लगता है वो मै ही था
टूट के टहनी से गिरता फिर खुद को रौंदा करता था
रोके कौन और टोके कौन मैं कब किसकी सुनता था
सब कहते थे वो जुल्मी हैं पर मैं तो उन पर मरता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

उनकी एक झलक को मैं तब सौ-सौ सजदे करता था
वो तिरछे-तिरछे रहते थे ..मैं पीछे-पीछे चलता था
उनकी खुशबू, उनकी आहट मैं हर पल खोया रहता था
वो कहते थे, हैं नहीं मेरे..और मैं सुनकर रोया करता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

Thursday, September 2, 2010

शेखर...तुम वाकई बहादुर हो

सुबह दस बजे के करीब शेखर का मोबाइल पर मैसेज़ आया-
...आफ्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट प्रोसेज़ ऑफ न्यू सेल्स फार्मेशन कॉजेज फ्लक्चुएशन इन बीपी, वेट गेन-लॉस, टेरिबल वीकने, स्टोमच डिसऑर्डर... कुड नॉट वॉक और सिट फॉर लास्ट 10 डेज़, इट्स लाइक गोइंग टू बैक इनफैन्ट्स स्टेज़.. ..बट फ्यू डेज़ बैक आई डिसाइडेड टू टुक फर्स्ट बेबी स्टेप विदआउट सपोर्ट... इट फील लाइक बिगनिंग ऑफ ए न्यू लाइफ...
...यस, फ्यू मोर चैलेंजेज विल हैव टू फेस बिफोर गेटिंग डिस्चाच्र्ड फ्रॉम द हॉस्पिटल...
...शुड कम आउट फ्रॉम आइसोलेशन अराउंड फस्र्ट वीक ऑफ सेप्टम्बर एंड फाइनल डिस्चार्ज वुड बी अराउंड सेकेंड
...शेखर
संदेश पढ़ते ही मैं समझ गया कि शेखर की हालत ठीक नहीं है। वो मेरे बहुत करीबी दोस्तों में एक है। पहली मुलाकात 2006 में मुंबई में हुई थी। काइज़र फाउंडेशन की एचआईवी-एड्स कान्फ्रेंस में मैं भी आमंत्रित था। शेखर उस वक्त लोकसत्ता के चीफ कॉपी एडिटर थे। शेखर और मैं दोनों ही काइज़र फेलो थे। मेरा पहला असाइनमेंट महाराष्ट्र था। मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के बुधवारपै जैसे रेडलाइट इलाकों और पंचगनी में फादर टॉमी के टीबी सेनीटोरियम में जाकर एचआईवी एड्स से जुड़े सामाजिक-आर्थिक तथ्यों को जुटाने में शेखर ने मेरी काफी मदद की। बाद में मणिपुर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, म्यांमार, कनाडा और यूरोप के कई देशों में फेलोशिप पर काम करते वक्त हम साथ-साथ थे। मौत से जूझते बेबस लोगों, समाज के तिरस्कृत व्यक्तियों और एचआईवी-एड्स जागरूकता को लेकर शेखर बेहद जुनूनी है। हाल ही में मराठी में लिखी उसकी किताब ...पॉजिटिव माइंड्स... आई तो उसकी पहली चंद प्रतियों में से एक शेखर ने मुझे भेजी। इससे पहले जब भी कोई बड़ी कामयाबी मिली या परेशानी हुई तो हमेशा उसका फोन आया। तीन साल पहले उसे इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला। फिर वह अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में हुई तीन हफ्ते की वर्कशॉप में भाग लेने के लिए गया। विषय था-...लीडरशिप इन स्टै्रटजिक हेल्थ कम्युनिकेशन...। लौटने के बाद उसने वहाँ के अनुभव बताए थे। साथ ही यह भी बताया था कि अब उसका अगला विषय ...माइग्रेशन या पलायन... और उसके आर्थिक-सामाजिक प्रभाव हैं। बहरहाल, शेखर के बारे में इतनी सारी बातें करने का मकसद सिर्फ यह बताना है कि उसकी एक पत्रकार के तौर पर क्या हैसियत है। देशभर के अस्पतालों, गरीबों की सेहत, इलाज के सरकारी ढाँचे और एचआईवी-एड्स जैसे गूढ़ विषयों के बारे में शेखर जैसी गहरी जानकारी रखने वाले जर्नलिस्ट गिने-चुने ही हैं। उसके इस जुनून के पीछे सिर्फ एक संवेदनशील पत्रकार होना ही नहीं, बल्कि इंसानियत भी है। बतौर इंसान शेखर के दिल में आम लोगों के लिए मैंने जो कसक देखी, वह कम लोगों में होती है। ऐसा शख्स आज खुद अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहा है। वह हिम्मती है। उसकी लेखनी ने ना जाने कितने मरते हुए जिस्मों में जान फूँकी है।
...वह मुझे भी कुछ न बताता। उसका मैसेज मेरे कई बार फोन और मैसेज करने के बाद आया। इतना अंदाजा तो मुझे पहले ही था कि जरूर कोई गंभीर बात है, पर हालत यहाँ तक पहुँच गई होगी, इसका मुझे अंदाज नहीं था। कुछ महीने पहले बात हुई थी तो शेखर ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज में बताया था कि पीठ में कुछ गांठे हैं। जाँच में शुरुआती दौर का कैंसर निकला है। डॉक्टरों ने कहा है, ठीक हो जाएगा। बाद में उसने बताया कि खून के कुछ कम्पोनेंट ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। इसके लिए काफी पैसों की जरूरत भी थी और मुझसे बातचीत का सार यह था कि किस तरह से अधिक से अधिक मदद जुटाई जा सकती है। हम दोनों ने मिलकर कुछ कोशिशें भी की। फिर काफी दिनों तक कोई बात नहीं हुई। आज शेखर का मैसेज मिला तो काँप गया।
मैंने तुरंत दूसरा संदेश भेजा-
.. शेखर मैं तुम्हारे लिए अपने दोस्तों से मदद की अपील करना चाहता हूँ... क्या तुम्हारी इजाजत है...

करीब दो घंटे बाद उसका जवाब आया-

सुधीर... चिंता मत करो ...15 दिन में डिस्चार्ज करने की बात डॉक्टर ने कही है... कैंसरस सेल खत्म हो चुके हैं ...स्टेम सेल थेरेपी...क्यूरेटिव मैथेड है...आनेवाले 5-6 महीने संक्रमण से बचना होगा...आप सबकी दुआ तो साथ है ही...तो कोई टेंशन नहीं..। थोड़ी देर बाद फोन भी आ गया। उसने कहा..तुम तो जानते ही हो कि हमने एचआईवी से लड़ते लोगों के बीच काम किया है। वो लोग तो बीमारी के साथ-साथ तिरस्कार भी झेलते हैं। कम से कम अपने साथ ऐसा नहीं है। लोग मुझसे मिलने आते हैं। मेरे सामने वाले बेड पर रायपुर के एक बच्चे को भी मेरी जैसी बीमारी है। उसके इलाज का खर्चा 50 लाख से ज्यादा है। मेरा कम से कम इतना तो नहीं है। मैं उसे देखता हूँ तो मेरी चिंता और तकलीफ दोनों कम हो जाती हैं..तुम चिंता मत करो। .. मैं जानता हूँ कि शेखर स्वाभिमानी पत्रकार है। लोकसत्ता के उसके पुराने सम्पादक कुमार केतकर ने उसके इलाज के लिए काफी कोशिश की हैं। वह अब किसी से कुछ नहीं कहेगा और मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा ..शेखर तुम वाकई बहुत बहादुर हो..ईश्वर तुम्हारे जैसी हिम्मत हर उस शख्स को दे, जो बीमारी या मुसीबतों से लड़ रहा है-आमीन।