Sunday, March 27, 2016

शराब के साथ इलाज भी तो सस्ता कीजिए

http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/sudhirmisra/please-cheapen-the-treatment-too-for-liquor-lovers/
सुधीर मिश्र
ग़ालिब तो जाने कब कह गए थे कि
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
तो सुरा प्रेमी भाइयों, यह गौरवशाली दिन अब ज्यादा दूर नहीं। बैंकों का कर्ज पहले ही सस्ता है और एक अप्रैल से दारू के दाम भी एक चौथाई कम हो रहे हैं। यानी अब आपके दोनों हाथों में लड्डू हैं। चाहे तो महीने का बजट घटा लें या फिर उतने ही बजट में रोज एक-दो पैग बढ़ा लें। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुरा-प्रेमियों के लिए सरकार घटी दरों पर अस्पताल, दवाइयों और मरहम-पट्टियों का भी इंतजाम करवाएगी। आप सभी को अच्छी तरह से मालूम है कि दुनिया की सबसे बहादुर कौम रोजाना शराब पीने वालों की ही होती है। वे जानते हैं कि ज्यादा शराब पीने से उनका लिवर खराब हो सकता है, आंतों की छीछालेदर हो सकती है, नशे में स्कूटर, मोटरसाइकिल या कार चलाकर खुदा को प्यारे हो सकते हैं। इसके बावजूद वह शराब नहीं छोड़ते। लगातार पीते हैं। लिहाजा अब यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि बेहतर न्यूरो सर्जन, गैस्ट्रोइन्ट्रोलॉजिस्ट और आर्थोपैडिक सर्जन भी तैयार करे।
यकीनन सरकार ने शराब सस्ती करने का अपना चुनावी वादा पूरा किया है। जाहिर है, अब लोग ज्यादा पिएंगे। ऐसे में सरकारी लोगों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। पीने वाला वोटर तो है पर वोट देने के लिए जीना भी जरूरी होता है। लिहाजा उनकी जान की हिफाजत के लिए अस्पताल, एंबुलेंस और डॉक्टर तो मिलने ही चाहिए। खासतौर पर लिवर ट्रांसप्लांट जैसी सुविधाओं के लिए दिल्ली-गुड़गांव के प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भरता कम की जानी चाहिए। जैसी जागरूकता रक्तदान अभियान के लिए पैदा की गई, वैसी ही प्रेरक कहानियां लिवर दान की सामने आनी चाहिए। लिवर कटवाकर सुराप्रेमियों की जीवन रक्षा करने वालों को यश भारती जैसे सम्मान भी दिए जा सकते हैं। इससे पीने वालों का हौसला बढ़ेगा। पुलिस वालों को भी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए कि पीने वालों के साथ कैसा व्यवहार करें। खासतौर से पुलिस वाले जब खुद पिए हों तब। ऐसा अक्सर देखने में आता है कि पीने के बाद क्रिमिनल और पुलिस वाले बेहद खतरनाक हो जाते हैं। पुलिस वालों की ट्रेनिंग के लिए यूपी में ही काम करने वाले कुछ ब्यूरोक्रेट्स की मदद ली जा सकती है। यहां ऐसे कई अफसर रहे हैं, जो दफ्तर में पीते थे और बेहतरीन परफॉरमेंस देते रहे। प्रशिक्षण के इस कार्यक्रम में कुछ डॉक्टरों, सर्जन, पत्रकारों और नेताओं की मदद भी ली जा सकती है।
 पुलिस वालों और क्रिमिनल्स के मुकाबले आम सुरा प्रेमी का व्यवहार आमतौर पर मानवीय होता है। इसे कभी भी अनुभव किया जा सकता है। मसलन आप भले ही अपने हमउम्र के साथ बैठे हों पर पीने के बाद सामने वाला हमेशा यही कहता हुआ मिलेगा कि तू मेरा छोटा भाई है। सुरापान के दौरान अगर साथी की त्योरियां जरा सी भी चढ़ें तो सामने वाला तुरंत यह कहकर मामला ठंडा कर देता है कि मैं तेरी दिल से इज्जत करता हूं। तू बोल क्या चाहिए, तेरे लिए मेरी जान हाजिर है। आत्मविश्वास तो इस कदर कि ज्यादा पीने वाला हमेशा गाड़ी खुद चलाना चाहता है। वह बड़े प्यार से कहता है-गाड़ी आज तेरा भाई चलाएगा। लिहाजा ऐसे प्रेमी जीवों के लिए शराबी, बेवड़ा, पियक्कड़ और दारूबाज शब्द के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। आखिर पीने वालों से मिलने वाले टैक्स से ही तो सरकारी कर्मचारियों को वेतन मिलता है, इसलिए सरकार को उनके सम्मान की रक्षा भी करनी चाहिए। पीने वालों के लिए अल्कोहल यूजर या सुरा प्रेमी जैसे सम्मानजनक संबोधन होने चाहिए। चूंकि शराब अब सस्ती हो ही रही है तो लगे हाथों सरकार को गलियों, नुक्कड़ों और कारों के भीतर पीने की इजाजत भी दे ही देनी चाहिए। शराब ठेकों के आसपास रहने वालों को सहनशील बनाया जाना चाहिए। उन्हें यह सिखाने की जरूरत है कि वह सुरा प्रेमियों के सम्मान में शाम होते ही अपने दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लें। गाली और बद्दुआएं देने की जरूरत नहीं क्योंकि यह काम तो शराब धीरे-धीरे खुद कर देती है। मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी शायद इसीलिए कह गए हैं-
सब को मारा जिगर के शेरों ने
और जिगर को शराब ने मारा...
तो यूपी के सुरा प्रेमियों तैयार हो जाओ। पचीस प्रतिशत सस्ती शराब पीने के लिए।

Sunday, March 13, 2016

उधार लेकर जियो, पर स्कॉच जरूर पियो


अपन हमेशा से गणित से घबराते हैं। सिर्फ मैं ही क्यूं, वह पूरी पीढ़ी जिसने यूपी बोर्ड से 1986-87 या आसपास के वर्षों में दसवीं पास की हो, उससे पूछ लीजिए। 75 प्रतिशत लोग खुले मन से यह बात मानेंगे कि गणित बहुत भयानक थी। उस वक्त तक नेताजी मुलायम सिंह यादव की सपुस्तक परीक्षा प्रणाली और फिर उदारता से अंक बांटे जाने वाली नीति लागू नहीं हुई थी। लिहाजा 25 से 27 प्रतिशत लोग ही दसवीं पास कर पाते थे। ज्यादातर के भगीरथ प्रयास दो से पांच साल तक जारी रहते थे। अपन खैर '86 में फेल होकर 87’ में गुड सेकंड डिवीजन में पास हो पाए।

यह बातें महज नॉस्टेल्जिया नहीं। इस प्रसंग की याद किंगफिशर कैलेंडर वाले अपने माल्या साहेब की वजह से आई। मेरे ख़याल से व्यवहार गणित को छोड़ बाकी गणित में उनकी भी कच्ची टिकिया ही रही होगी। यही वजह है कि इस 'एनआरआई' को भारतीय बैंकों का हजारों करोड़ लेकर विदेश फुर्र होना पड़ा। उनकी गणित भले ही कमजोर रही हो, पर दर्शन शास्त्र में यकीनन बेहतरीन पकड़ रही होगी। खासतौर पर हिन्दू दर्शन में। हिन्दुओं में दो तरह के दर्शन माने जाते हैं। आस्तिक और नास्तिक। आस्तिक में सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, वैशेषिक और वेदांत आते हैं। नास्तिक में जैन, बौद्ध और चार्वाक का जिक्र होता है। माल्या साहेब को चार्वाक दर्शन में महारथ हासिल है। चार्वाक कहते हैं-
यावज्जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥
आज के हिसाब से इसका अर्थ है कि जब तक जिंदा रहो, ऐश के साथ जियो। गुमनाम आई लैंड में सुरा-सुंदरी के साथ किंगफिशर कैलेंडर बनवाओ। स्कॉच पियो और मौज करो। चार्वाक कहते हैं कि अगला जन्म कुछ नहीं होता। लिहाजा इस जन्म में तो परलोक की चिंता मत करो। माल्या उससे आगे जाकर सोचते हैं कि इस जन्म में भी कोई क्या उखाड़ लेगा। एक विचारक हुए हैं विक्टर ओलिवर। उन्होंने कहा था-जो पैसे के पीछे भागता है वह पागल, जो जमा करता है वह पूंजीवादी, जो खर्च करता है वह प्ले बॉय, जो पाना नहीं चाहता वह महत्वाकांक्षाहीन, जिसे बिना किए कुछ मिल जाए वह परजीवी और जो इकट्ठा करके बिना उपभोग किए मर जाता है, उससे बड़ा मूर्ख कौन होगा? यकीनन माल्या मूर्ख तो कतई नहीं। हां, ओलिवर के हिसाब से वह प्ले बॉय हुए। ओलिवर हों या चार्वाक, उन्होंने अपने सिद्धांत काफी पहले दिए। माल्या साहेब ने आज के युग में उसे व्यवहार में जिया। गजब प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं। बैंकों का हजारों करोड़ स्कॉच के साथ गटक गए और डकार तक नहीं ली। अब आराम से लंदन में टेम्स के किनारे आयरिश कॉफी के मजे ले रहे होंगे। 
दूसरी तरफ गरीब किसान हैं। बैंकों के कुछ हजार के कर्ज से ही घबराकर आत्महत्या कर लेते हैं। बुंदेलखंड से लेकर विदर्भ तक विधवाओं के गांव बस गए हैं इन बैंकों के कर्ज के चक्कर में। अमेरिकी लेखक हेनरी मिलर के मुताबिक, सारी दुनिया में पैसा दो तरह से खर्च किया जाता है। पहला हार्ड मनी और दूसरा सॉफ्ट मनी। हार्ड मनी मतलब घर गृहस्थी चलाने के लिए रोजमर्रा की खरीदारी में खर्च किया जाने वाला पैसा। सॉफ्ट मनी मतलब अपने दोस्तों या गर्लफ्रेंड के तोहफों और पार्टियों पर खर्च किया जाने वाला पैसा। हमारी-आपकी हार्ड मनी के हिस्से से माल्या साहेब सॉफ्ट मनी खर्च करते रहे। न तो सीबीआई ने और न ही बैंकों ने कभी पूछा कि भैया, 14 करोड़ में युवराज सिंह को कैसे खरीद रहे हो, रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु का खर्च कहां से कर रहे हो। अब माल्या साहेब कोई किसान तो थे नहीं कि ट्रैक्टर उठवा लें या जमीन नीलाम करवा दें। कांग्रेस-बीजेपी सब दोस्त। दोस्ती निभाते रहे। हमें गरीब किसानों को साहेब से ट्रेनिंग दिलवानी चाहिए थी कि बैंकों से लोन लेकर कैसे मौज करें। वैसे अब भी कर्जदार किसानों की परेशान फौज है इस देश में। उनकी तरफ से मुमताज मिजी का यह शेर विजय माल्याजी को समर्पित-
तुम को हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही
आओ साहेब आओ, कुछ हम गरीबों को भी सिखाओ
(इस शेर में आखिरी मिसरा मेरी ओर से बामाफी)

Monday, March 7, 2016

घर घर में हो दीवारें मुखिया जी का मकसद है पांच बरस के बाद मिले फिर भी जनता गदगद है


कवि ओमप्रकाश यति की इन लाइनों पर गौर करिए-
जोखिम था उनके चेहरे पर धब्बे बतलाना
सबने ही तय कर डाला दर्पन झूठा था
जानवरों को खबर मिली तो काटे खून नहीं
जो फसलों का रखवाला था एक बिजूका था।
बड़ा मुश्किल होता जा रहा है लोगों को समझना। किसिम किसिम के लोग हैं। गोरे हैं, काले हैं, भूरे हैं। बूढे हैं, जवान हैं, बच्चे हैं। औरत हैं आदमी हैं। सारी किस्मों को मिला लें तो भी इस देश में दो तरह के लोग मोटे तौर पर नजर आते हैं। एक जिनके पास एक्स, वाई, जेड, जेड प्लस या किसी भी किस्म की सिक्युरिटी है। दूसरे जिनके पास कोई सिक्युरिटी नहीं है। पहली किस्म वाले राज करते हैं, शासन चलाते हैं। किसी न किसी किस्म की पावर में होते हैं। दूसरी कैटेगिरी में हमारे आपके जैसे लोग आते हैं, जिन पर राज किया जाता है। जो हमेशा माथे पर डर, खौफ या परेशानी का स्थायी भाव लिए रहते हैं। कोई न कोई डर इन्हें हमेशा तंग करता है। कभी महंगाई का डर तो कभी बच्चों की पढ़ाई का। कभी डकैत का तो कभी बकैत का।
पहली तरह के लोगों के परिवार, बच्चे, बेटी और महिलाएं तुलनात्मक रूप से सुरक्षित होती हैं। इनके साथ एक्स, वाई या जेड होती ही है। लिहाजा यह लोग बेखौफ होकर परिवार और बच्चों के साथ नाइट शो फिल्म देख सकते हैं। लाल या नीली बत्ती वाली गाड़ी बीच सड़क पर लगाकर आइसक्रीम खा सकते हैं। दूसरी तरह के लोगों का हाल भी दूसरा ही होता है। रात दिन घर चलाने की जद्दोजहद। ऐसे परिवारों में बड़ों की आंखें हमेशा दरवाजों पर लगी रहती हैं कि कब बच्चे घर वापस आएंगे। खासतौर पर बेटियां। घर की बच्चियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि कोई छेड़खानी हो तो इग्नोर करें। चूंकि इनके साथ एक्स, वाई या जेड नहीं होती लिहाजा इस श्रेणी के लोग परिवार के साथ फिल्म का नाइट शो नहीं देखते। इसी तबके में आने वाली महिला पुलिस तक बीच सड़क पर छेड़ दी जाती है। छेड़ने वाला अगर पहली श्रेणी वालों का चम्पू हो तो उसका अपना महकमा भी न्याय नहीं दिलवा पाता। इस तबके के लोग अपनों के लिए नहीं लड़ते। यह लोग अपनों से ही लड़ते हैं। यह वर्ग अपनी दिक्कतों पर सिर्फ बात करता है, उनके लिए लड़ता नहीं, शिकायत नहीं करता। इनके संघर्ष ज्यादातर पहली श्रेणी वालों की जरूरतों के हिसाब से होते हैं।
वैसे संघर्ष पहली किस्म के लोगों के भी हैं। पहली किस्म वालों की फाइट उस पद या कुर्सी पर बने रहने की होती है जो आपको एक्स, वाई या जेड सिक्युरिटी मुहैया कराती है। यह लड़ाई रोटी, भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की लड़ाइयों जैसी नहीं है। अक्सर इस क्लास के आपसी संघर्ष में दूसरी किस्म के लोगों को वीरगति प्राप्त होती है। दूसरे किस्म के लोग पहली किस्म के लोगों की लड़ाई को अपने दिल पर ले लेते हैं और फिर मुजफ्फरनगर जैसे कांड होते हैं। पहली किस्म के लोग आपस की लड़ाई में बेहद शिष्ट और लोकतांत्रिक होते हैं। वह कभी ऐसा कुछ नहीं करते, जिससे अपने किस्म के लोगों को कुर्सी के अलावा कोई नुकसान हो। वक्त बदलने पर पहली श्रेणी के लोग प्रतिद्वन्द्वियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा सिकंदर ने पोरस के साथ किया था। अक्सर इनकी लड़ाई फिक्स होती है। दूसरी तरह के लोग इनकी फिक्स लड़ाई को असली समझते हैं। फिक्स लड़ाई के फेर में यह तबका अपने युद्ध भूल जाता है। अपनी गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता। यह तबका नकली मुद्दों पर असली लड़ाई लड़ता है और हर युद्ध में शहीद होता है। यह सिलसिला आजादी के बाद से अब तक बदस्तूर चल रहा है। यही इस देश का लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र को समर्पित यति की दो और लाइनें, फिर बात खत्म-
घर घर में हो दीवारें मुखिया जी का मकसद है
पांच बरस के बाद मिले फिर भी जनता गदगद है।