Thursday, December 27, 2012

जिक्र आए उनका

जिक्र आए उनका तो पहले बताया करो
रातों में रोने की अब आदत नहीं रही
ख़यालों से उनके कह दो मत आया करो
पाबंद ए वक़त हूँ फ़ुरसत नहीं रही

Friday, February 10, 2012

...कुरसी के लिए जज्बात को मत छेडि़ए

सुधीर मिश्र...रिपोर्टर डायरी (19 सितम्बर 2008)
बटला हाउस एनकाउन्टर सही था या गलत। इसकी तस्वीरें देखने के बाद सोनिया गांधी रोईं थीं या नहीं? झूठ सलमान खुर्शीद-दिग्विजय सिंह बोल रहे हैं या गृहमंत्री और प्रधानमंत्री? सवाल सिर्फ इतने ही नहीं हैं। एक और सवाल है जो इन सबसे बड़ा है। क्या इस देश के सियासतदां इतने बेगैरत, अमानवीय, संवेदनहीन और स्वार्थी हो गए हैं कि उन्हें पीडि़त, परेशान और दुखी लोगों की भावनाओं से खेलने में जरा भी झिझक नहीं होती? आजमगढ़ में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के बयान देने और पलटने के बाद जनकवि मरहूम अदम गोंडवी की एक मशहूर कविता याद आती है-
हिन्दू या मुसलमान के अहसासात को छेडि़ए
..अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेडि़ए
दिन मंगलवार, 19 सितम्बर 2008। उस वक्त मैं एटीएस, कानून-व्यवस्था और आतंकवाद जैसे मसलों की रिपोर्टिंग करता था। मुंबई के एक सीनियर एटीएस अफसर ने मुझे तीन-चार दिन पहले बताया था कि दिगी में हुए सीरियल ब्लास्ट को लेकर आजमगढ़ और फैजाबाद में कुछ गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लिहाजा मैं 18 सितम्बर को आजमगढ़ पहुंच गया। बटला हाउस एनकाउन्टर से ठीक एक दिन पहले। मैंने शिबली कॉलेज के कुछ प्रोफेसरों से मुलाकात की। प्रतिबंधित संगठन ..स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी के अध्यक्ष शाहिदबद्र फलाही से बातचीत की जो जमानत पर छूट कर वहीं हकीमी करते हैं। सबका कहना था कि आजमगढ़ के मामले में कुछ गलत हो रहा है। आजमगढ़ आतंक की नर्सरी नहीं हैं। यहां रहने वाले नौजवानों को मजहबी तालीम दी जाती है न कि आतंक की। तालीम, साहित्य और सियासत के मामले में आजमगढ़ ऐतिहासिक जगह रही है। अगर किसी जगह से कुछ लोग आतंकवाद जैसे मामलों में पकड़े भी जाते हैं तो उससे सारा शहर, इलाका या एक खास कौम आतंकी नहीं हो जाती। मैं अपनी इस सोच पर तब भी कायम था और अब भी। आतंकवाद की घटनाओं में यहां के नौजवान शामिल थे या नहीं, इसकी पूरी पड़ताल मैं कर नहीं पाया। मेरे असाइनमेंट बदल गए क्योंकि जर्नलिज्म में मेरा रोल ही बदल चुका था।
खैर, 19 तारीख को मैं सुबह-सुबह ही सरायमीर इलाके में पहुंच गया। गुजरात, यूपी और दिगी में हुए सीरियल ब्लास्ट के सिलसिले में कुछ लोग आसपास के गांवों से उठाए गए थे। तभी दिगी से एक क्राइम रिपोर्टर का फोन आया-बॉस.. बटला हाउस में एक बड़ा एनकाउन्टर चल रहा है..कुछ आतंकवादी हैं आजमगढ़ के। मेरे कान खड़े हो गए। मैंने तुरंत उस वक्त आजमगढ़ के एसपी रमित शर्मा और एडीजी लॉ एंड ऑर्डर बृजलाल से बात की। कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। दोपहर तक मुझे एटीएस के ही कुछ सूत्रों से पता चला कि लड़के संजरपुर गांव के हैं। मैं, दिगी से आए दो पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ स्थानीय संवाददाता संजरपुर पहुंच गए। पता चला कि इस गांव में रहने वाले समाजवादी पार्टी के एक नेता का बेटा भी गिरफ्तार हुआ है। यहां रहने वाले आतिफ अमीन और मो. साजिद मारे गए थे जबकि सैफ और जीशान नाम के दो लड़कों को गिरफ्तार किया गया था। गांव में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। हम सपा नेता के घर पहुंचे और उनसे बातचीत शुरू की। तब तक गांव वालों का उनके घर के बाहर जमावड़ा लगना शुरू हो चुका था। ज्यादातर लोग मुसलमान ही थे। गुस्से में भरे हुए, उनके चेहरों से आग बरस रही थी। अभी बातचीत चल ही रही थी कि कुछ लोग चिगाने लगे-मारो इन मीडिया वालों को। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दो स्थानीय संवाददाताओं व फोटोग्राफरों को लोगों ने लाठी-डंडों से पीटना शुरू कर दिया। इत्तेफाक से पिटने वाले सभी पत्रकार भी मुस्लिम ही थे। लिहाजा यह बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि वहां हिन्दू-मुसलमान का कोई मुद्दा था। हमने उन्हें बचाने की कोशिश की तो लोग हमारी ओर भी लपके। सब गालियां बक रहे थे और गुस्से में आगबबूला हो कर कह रहे थे..जहां बम फटा-वहां इन हरामजादों को सिर्फ लम्बा कुर्ता और छोटा पजामा पहने दाढ़ी वाला नजर आने लगता है। सबको आतंकी बना देते हैं साले। आज बताते हैं इनको कि आतंक क्या होता है..सबको फूंक देंगे।
यह रिफरेंस महज़ इसलिए कि मैं बताना चाहता हूं कि स्थानीय लोगों में इस मसले को लेकर कितना गुस्सा था और अब भी बना हुआ है, खैर तब तक मैं डीजीपी, अखबार के साथियों, डीआईजी व एसपी और होम सेक्रेटरी को चुपचाप मैसेज कर चुका था कि हम गंभीर खतरे में हैं। इधर, गांव के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव शुरू किया। उनमें वह सपा नेता भी शामिल थे जिनका लड़का गिरफ्तार हुआ था। करीब एक घंटे बाद पुलिस पहुंची। पुलिस की गाडिय़ों को वहां मौजूद सैकड़ों लोगों ने तोड़ दिया और आग लगाने की भी कोशिश की। तब तक अंधेरा होने लगा था। लग रहा था कि आज तो जान गई। खैर किसी तरह पुलिस और गांव के ही कुछ लोगों व एक समझदार मौलाना की मदद से सभी पत्रकार किसी तरह गांव से निकले और हमारी जान बची। वहां से निकलने के बाद मैंने महसूस किया कि पत्रकारों की गलत रिपोर्टिंग किसी खास समुदाय में इतनी नफरत पैदा कर सकती है कि वो वह भी बनने को तैयार हो जाते हैं, जो वो वास्तव में नहीं होते। यह गुस्सा महज इसीलिए था कि पुलिस किसी को भी आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ्तार करती है तो ज्यादातर अखबार उसे आरोपित या एक्यूज्ड लिखने के बजाए टेरेरिस्ट या आतंकवादी लिख देते हैं। पत्रकारिता के बेसिक्स को फॉलो न करने वालों की गलती मुसलमान अक्सर भुगतते हैं। थोड़ी सी हम पत्रकारों ने भी उस दिन भुगती पर जो गलती अब राजनीतिज्ञ कर रहे हैं, उसका खमियाजा तो सारा देश झेल सकता है और झेलता रहा है।
गौर करिए दिग्विजय सिंह क्या कहते रहे हैं-बटला हाउस एनकाउन्टर शक के घेरे में है, उसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। सलमान खुर्शीद कहते हैं कि सोनिया गांधी एनकाउन्टर की तस्वीरें देखकर फफककर रोईं हालांकि बाद में वह बोले-रोईं नहीं भावुक हुई थीं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कहते हैं कि एनकाउन्टर सही था। वह मानवाधिकार आयोग की जांच का हवाला भी देते हैं। आखिर एक ही सरकार और एक राजनीतिक दल के भीतर इतने सारे विरोधाभास क्यों हैं। एक बात तो सच ही है न कि इनमें से आधे झूठ बोल रहे हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों को उनकी पार्टी यह कहकर खारिज करती रही है कि यह उनके निजी विचार हैं। अब सलमान खुर्शीद के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों, कांग्रेस में क्या इतनी अराजकता है कि कोई कुछ भी बोल सकता है या फिर सबकुछ जाने-बूझे ढंग से हो रहा है। खुद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी क्यों नहीं बोलतीं कि आखिर सच क्या है। चुनाव के वक्त मुसलमानों को रिझाने की यह कोशिश वास्तव में उनके घावों में मिर्च छिड़कने सरीखी ही है। दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद की कांग्रेस पार्टी में बड़ी हैसियत है। अगर वह समझते हैं कि बटला हाउस एनकाउन्टर गलत था तो उन्हें न्यायिक जांच करवाने के लिए अपनी पार्टी पर दबाव बनाना चाहिए। वोटिंग से एक दिन पहले आजमगढ़ के लोगों से झूठी-सगाी बातें करके वह क्या साबित करना चाहते हैं। इसका संदेश क्या जाता है, अल्पसंख्यकों में और देश के सभी नागरिकों में। वोट के लिए ऐसे तमाशे को देखकर तो एक बार फिर अदम गोंडवी ही याद आते हैं जो कह गए हैं-
छेडि़ए एक जंग, मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ
..दोस्त, मेरे मजहबी नज्मात को मत छेडि़ए
कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी क्या इस पर ध्यान देंगे, जो दावा कर रहे हैं कि वह उत्तर प्रदेश को बदल देंगे..क्या वह अपनी पार्टी के नेताओं को बदल पाएंगे ?
..और अभी लिखना बंद ही कर रहा था कि तभी खबर आई। उड़ीसा में बीएसएफ के चार अफसरों को नक्सलियों ने उड़ा दिया..फिर एक सवाल-क्या देश के किसी बड़े नेता या मंत्री की आंखों में आंसू रहे हैं..?

Tuesday, February 7, 2012

ले लो न सब आकर

कितना उधार है तेरा मुझ पर
ले लो सब आकर
वो जो तुमने गले से लगाया था अनायास यूं ही
और सांसों से सहलाया था कंधों को मेरे
ले लो सब आकर
कितना उधार है तेरा मुझ पर

बिलख कर रोई थीं उस दिन तना
इत्ती छोटी सी एक बात पर
खूब संभाल कर रखा है मेरे सफेद रुमाल ने
आंसुओं में लिपटे काजल को आज भी
ले लो सब आकर
कितना उधार है तेरा मुझ पर

कोहरे से भरी एक सर्द शाम को
लिपटे-लिपटे साथ चल रहे थे हम
हां, उसी दरख्त के नीचे पार्क में
बड़ी शरारत से पीली शर्ट पर
होठों की लाली से दो पंखुडिय़ां बनाई थीं तुमने
ले लो सब आकर
कितना उधार है तेरा मुझ पर

नहीं संभलती हैं ये स्मृतियां
डरता हूं बार-बार
भुला दूं इन बातों को वैसे ही
जैसे भूलकर चला आया था
दूर बहुत दूर तुमसे, सिर्फ यादों के साथ
ले लो सब आकर
कितना उधार है तेरा मुझ पर