Tuesday, December 17, 2013

शुक्रिया राजस्थान, शुक्रिया दैनिक भास्कर

तीन साल पहले १९ मार्च के दिन ही पहुंचा था श्री गंगानगर..पंजाब की मस्ती और राजस्थान के आतिथ्य भाव से सराबोर ये शहर मेरी जिन्दगी का माइल स्टोन साबित हुआ ..बतौर सम्पादक दैनिक भास्कर के साथ यहीं से मेरी तीन साल की यात्रा शुरू हुई ..एक खूबसूरत और जबरदस्त ट्रेनिंग वाली यात्रा ..घर, परिवार और दोस्तों से दूर ..इतने प्यारे लोग की कभी अकेलापन महसूस ही नहीं हुआ ..बात चाहे श्री गंगानगर की हो या बाड़मेर ..जैसलमेर ..जयपुर.. और उदयपुर की , हर जगह अपनी टीम के साथियों और वरिष्टों से काफी सीखा ..लखनऊ से एक रिपोर्टर राजस्थान आया था ...इसके आगे जो बना यहीं बना..अब जाने की तैयारी है ..वापस लखनऊ . ..शुक्रिया राजस्थान ..शुक्रिया दैनिक भास्कर ..

मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ

मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ
दस्तूर ही कुछ ऐसा आने जाने का
चाह कर भी रुक कहाँ पाता हूँ
एक हुनर जरूर सीख लिया है हमने
जो पलकों के पीछे है उसे छिपा ले जाता हूँ
मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ


 

इस फैले हुए काजल ने चुगली की है

इस फैले हुए काजल ने चुगली की है
कल रात सावन चुपके चुपके बरसा है




हम क्या कहें तुमको और तुम्हारी नाराजगियों को
तुम कैसे समझोगे मुझको और मेरी खामोशियों को





बूँद बूँद टपकती पत्तों से बारिश की बूंदों सी
तुम चली गयीं जाने कहाँ बारिश की बूंदों सी
हर फ़िक्र और जिक्र मे हम तुमको तलाशा किये
पर तुम तो खो गयी दरिया मे बारिश की बूंदों सी
 




आज फिर तपती धूप है
जलाती हुई झुलसाती हुई
उस सच को बताती हुई कि
थोडा रुक ये गर्मी ही बादल लायेगी
सूखी धरती पर हरियाली छायेगी
वक्त का क्या है वो भी ऐसे ही बदलता है
घनघोर अन्धकार से भी सूरज जरूर निकलता है
 

हमारे लिए पहले आप

सब कुछ ख्वाब सरीखा। या फिर किसी ऐसे ख्वाब की तामीर जो देखा तो था पर याद नहीं। भावनाओं पर काबू पाना आसान नहीं। फिर एक बार पीछे मुड़कर देखने को जी चाहता है। मां का चेहरा याद आता है, मौत से चंद घंटे पहले का। आखिरी बार उनका कहना-बेटा खूब पढ़ना बड़े इंसान बनना। बात करीब 33 साल पुरानी है पर आज बहुत याद आ रही है। वो सारे स्ट्रगल याद आ रहे हैं जो मैंने बरसों किए, वो सारे अच्छे लोग याद आ रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में आगे बढ़ाया, वो सारे अपने जिनकी दुआएं हमेशा साथ रहती हैं। अपने लखनऊ में नवभारत टाइम्स का संपादक बनने में जरूर मेरी मेहनत शामिल है पर आपके प्यार, दुआओं और साथ के आगे मेरे लिए उसका कोई मोल नहीं

खून बरसा है खेतों मे इस बार
सुना है खूब वोट उगेंगे इस बार
कलफ लगे खादी के सफेद कुर्ते वाले
भाई बंदी की तकरीरें करेंगे इस बार



काश लाशें बोल पातीं
वो जोर जोर चिल्लातीं
चिता मे शोर मचातीं
कब्रों से आवाज लगातीं
नेताओं.. वोट ले लो वोट
..मेरे खून से सने वोट



शब्द अम्रृत शब्द हैं विष
शब्दों से वार भी होते हैं
शब्द जीता दे शब्द हरा दे
शब्दों मे आकार भी होते हैं
 



हवा कुछ भीगी भीगी सी है
ये सीलन जाने क्या करेगी
हाँ ये दीवारें बदरंग तो हुई हैं
पुराने रंग झाँक रहे हैं इनमे से


वक्त किताब नहीं होता। इसके पन्ने भी नहीं होते। आप वापस कुछ नहीं पलट सकते। सिर्फ अहसास कर सकते हैं, बीते हुए पलों की उन खुशबुओं का, जो करीब न होते हुए भी खुद को महसूस कराती हैं, जो न होकर भी बसी होती हैं जेहन में, एक झूठ की तरह, एक फरेब की तरह, एक मृगतृष्णा सी, जो नहीं होकर भी दिखती है रेगिस्तान में पानी सी-  

हाँ थोड़ी सी टूटन तो थी

हाँ थोड़ी सी टूटन तो थी और ज़रा सी तड़प भी
खाली खाली सा हूँ अब उस खलिश के जाने से


कुछ हर्फ़ दिल से निकल कर कागजों पर क्या उतरे
खामोश पानी मे कंकर से उठ गयी जाने कितनी लहरें
हम तो खामोश थे ,खामोश ही हैं और खामोश रहेंगे
पर लफ्ज तो हैं आवारा, चाहूं भी तो मै ये कहाँ रुकेंगे

महकने लगी हवायें

महकने लगी हवायें मौसम हुआ सुहाना
गुजारिश है तुमसे जरूर खवाबों मे आना
हम बैठेंगे घने कोहरे मे उसी पेड़ के नीचे
जो गिर गया तूफा मे बन चुका अफसाना 


जब जब उलझी डोरों को सुलझाया हमने

जब जब उलझी डोरों को सुलझाया हमने
खुद को फिर और उलझा हुआ पाया हमने।

जिन्दगी काश इतनी आसां होती
लड़ाई सिर्फ दुश्मनों के साथ होती
दांव आते थे दुनिया भर के मुझको
कभी गैरों ने दुश्मनी तो अता की होती।

धुंधलाती सुरमई यादें...

धुंधलाती सुरमई यादों के उन पीले पड़ते पन्नों को
दिल के उस तनहा कोने मे मै रोज उलटता चुपके से
कुछ बाते थीं कुछ नगमे थे और किस्से खट्टे मीठे से
उस कोने की तन्हाई मे कुछ अब भी बिखरा बिखरा है

ओस मे भीगी चांदनी चुनरी ओढे चाँद मेरा

बड़ी अच्छी महक आ रही है। शायद कहीं रातरानी खिली है। रात गहरी और खुशबू लगातार गाढ़ी होती जा रही है। नींद तो पिछली कई रातों से गायब है। हल्की ठंडी हवा। खुला आसमान और छत पर मैं अकेला। चार छत छोड़कर दोमंजिले पर दो खड़ी चारपाइयों के बीच एक टेबिल लैंप जल रहा है। एक छाया झुककर कुछ पन्ने पलटती और फिर थोड़ी थोड़ी देर में उसे दोहराती। मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा और न मैं कुछ देख पा रहा हूं, थोड़ी ठंड लग रही है। सोचता हूं सारी रात मैं उस टेबिल लैम्प को तापूं- मेरी एक कहानी का हिस्सा बनेगा शायद यह टुकड़ा

बंधे बंधे से रहना ही नियति बन जाती है

वो मेरा हाथ देखकर एक बात कही थी तुमने। न जाने क्या देख लिया अंगूठे के पोरों के बीच में। जाने कितनी देर तक बेसाख्ता हंसती रही थीं तुम। सब कुछ भुला दिया, तुमने नहीं मैंने, सच कुछ भी याद नहीं आता। है न, कभी कभी हम अपने मन को भी बांध लेते हैं, ऐसी गाठों से जो दोबारा लाख चाहो तो भी नहीं खुल सकतीं। एक ऐसी जकड़न जो कभी आजाद नहीं होने देती, बंधे बंधे से रहना ही नियति बन जाती है-

...तुमको भी कितने काम हैं

मुड़ के देखता हूँ फलक को दूर तलक.. जाने कितने ही चेहरे नजर आते हैं धुंधले धुंधले से..वो जो चमकते थे कभी बारिश के बाद निकले चाँद से ..कुछ गुनाह मेरी नजरों का कुछ ऐब आ गया है उनमे भी ..चलो फिर आगे कहीं ..हम भी मसरूफ बहुत ..तुमको भी कितने काम हैं

आधी रात के बाद जब...

आधी रात के बाद जब नींद नहीं आती ..हाँ और जब तुम भी नहीं आतीं ..तब यादों के उलटते पन्नों से एक पुराने फूल सी तुम गिरती हो..मेरे सपनों के आँगन मे..बादलों की धुंध और धुंध के उस पार झील के किनारे ..फिर न जाने कहाँ खो जाती हो तुम ...

सवेरा-ए-अवध


बोझ हंसी का ढोना

बोझ हँसी का ढोना
फिर चुपके से रोना
नींद छुपी पलकों मे
खोल के आंखे सोना
फिर चुपके से रोना
बोझ हंसी का ढोना

सोचना अब और नहीं

मुकम्मिल
सच मे कोई नहीं
अधूरा
आखिर कौन नहीं
ख्वाहिशों
का कोई छोर नहीं
चिल यार
सोचना अब और नहीं

होशियार... कि जनता जाग रही है


बादलों से आज मेरी बातें हुई...

बादलों से आज मेरी बातें हुई ..उनके घर जाकर मुलाकातें हुई ..बारिशों की बूंदों से घिरी उस धुंध में ..शिकवे उनके मेरी शिकायतें हुई ..बादलों से आज मेरी बातें हुई ..छतरी जो देखी हाथ मे तो मुस्कराये वो ..मेघों के मल्हार मे इसको क्यों लाये हो..घूर के मैने कहा जानते हो आप भी ..वो तो चला गया पर आदत है आज भी..साये को उसके साथ रखता हूँ आज भी ..बूंदों से बचा कर तुम्हारी ..आगोश मे उसे रखता हूँ आज भी ..बादलों से आज मेरी बातें हुई


मेरे घर के सामने वाली पहाड़ी आज बादलों मे छुप गयी ..बारिशों की झूम ऐसी तन मन सब भिगो गयी ..याद आती है वो पुरानी छतरी जो अक्सर सूखी ही रहती थी ..सारे शहर मे बारिश होती थी फिर भी मेरी छत ना गीली होती थी ..बदले वक्त मे बारिशों ने भी रंग बदला है ..पानी शायद मेरे लिये सारा बचा के रखा है ..पर अब भीगने मे वो पहली सी खलिश नहीं होती ..बादलों तुम्हे वक्त पर बरसने की आदत क्यों नहीं होती..



दामिनी/निर्भया : इस शोक से सबक लेना होगा


परिक्रमा करने-रोकने का सियासी दांव


बाबू आखिर कब समझोगे इशारे


राजनीति में क्रिमिनल की एंट्री, आप ही रोक सकते हैं


सचिन और अमिताभ होने के मायने


'आदमी की निगाह में औरत' ने बदली सोच


सचमुच नाज़-ए-लखनऊ हैं केपी सक्सेना


शिकागो एयरपोर्ट... बड़ी मुश्किल में फंस गए थे हम

यह नजारा तीन साल पहले दिसम्बर में शिकागो एयरपोर्ट का है। बड़ी मुश्किल में फंस गए थे हम। मोबाइल काम नहीं कर रहा था। माइनस 14 टैम्परेचर, बर्फ गिर रही थी, ज्यादा पैसे थे नहीं पास में और शिकागो से दिल्ली आने वाली हमारी एयर इंडिया की फ्लाइट छूट चुकी थी। हम मैक्सिको से वापस आ रहे थे। खैर हमने शिकायत की अमेरिकन एयरलाइंस के अफसरों से क्योंकि उनकी फ्लाइट लेट होने के कारण हमारा जहाज उड़ चुका था। कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है। हम जिस बात को लेकर परेशान थे, वही खुशी का सबब बन गई। हम से अमेरिकन एयरलाइंस वालों ने कहा कि अब एक दिन शिकागो घूमिए। बढ़िया होटल में ठहराया, खाने पीने के लिए कुछ डॉलर भी दिए ओर फिर अगले दिन की फ्लाइट में सीट दिलाने का वादा किया। यह एक सरप्राइज था, हमें अमेरिका में उतरना ही नहीं था और हम शिकागो घूम लिए। अगले दिन जब हम रवाना हुए तो सबके चेहरे विजयी मुद्रा में खिले हुए थे-

महात्मा गांधी की पोती इला गांधी जी से मुलाकात


यूएन क्लाइमेट समिट कवर करने के लिए डरबन गया था। वहां मुलाकात हुई महात्मा गांधी की पोती इला गांधी जी से। एक दिन कुछ वक्त था, हमने उनका नम्बर पता किया, बात की और पहुंच गए उनके घर। वाकई में गांधी जी जिस सादगी के लिए जाने जाते हैं, वह उनके संस्कारों में नजर आई। उन्हें खुद चाय बनाकर पिलाई और लगा ही नहीं कि हम पहली बार उनसे मिले हैं। उनसे भारत ओर यहां की राजनीति पर काफी चर्चा हुई। इला गांधी का जन्म दक्षिण अफ्रीका में ही हुआ। उन्होंने बच्चों, महिलाओं और भारतीयों के लिए काफी काम किया है। वहां की राजनीति में भी काफी सक्रिय रही हैं। नौ साल के लिए उन्हें हाउस अरेस्ट भी रहना पड़ा। नेल्सन मंडेला को आजाद कराने के मूवमेंट से भी जुड़ी रहीं। उनसे मिलना और कुछ वक्त उनके साथ गुजारना निश्चित तौर पर एक सुखद अहसास है, गांधी से तो हम मिल ही नहीं सकते थे, कम से कम उनकी पोती के साथ मिलकर ही यह समझ में आया कि उनकी महान विरासत को उनके वंशज कैसे सहेजे हुए हैं-

रोली और लाली

रुई के फाहे जैसे छह नन्हे पिल्ले। दो झक सफेद और चार चितकबरे। यानी काले सफेद का मिक्स। लाली ने बच्चे दे दिए थे। कालोनी के ज्यादातर बच्चों का मालूम था कि उनके खिलौने आने वाले हैं। जीते जागते खिलौने। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था। सारा दिन सामने पार्क में धमाचौकड़ी मची रहती। नन्हीं रोली को जाने किसने बताया दिया था कि पिल्ले को कान पकड़ कर टांगो। अगर वो चिल्लाए तो ठीक, नहीं तो समझो कुत्ता चोर टाइप है। रोली की लीडरशिप में बच्चों ने सारे पिल्लों को जांच लिया था, कोई चोर नहीं निकला। सारे पिल्ले रोए। इस जांच पड़ताल से नाराज लाली ने एक बच्चे के हाथ में दांत मार दिए। उसे चौदह इंजेक्शन लगवाने पड़ेगे। खामियाजा नन्हे पिल्लों को भुगतना पड़ा। रोली एंड कंपनी अक्सर उन्हें दूध, बिस्कुट, ब्रेड और कभी कभी चिप्स तक दे देती थी। सब बंद हो गया। बच्चों के एक्जा़म भी करीब थे। तीन पिल्ले एक एक करके मर गए। बाकी के तीन और लाली की मायूस आंखें रोली को भीतर ही भीतर परेशान करतीं। इस बार फिर छह पिल्ले हुए हैं। गोलमटोल। लाली किसी को पास नहीं आने देती। पर करीब दस बारह दिन बाद छह नन्हे शैतान खुद ब खुद सड़क और फिर पार्क तक पहुंच गए। बच्चों की आंखे चमक रही थीं। इस बार किसी बच्चे ने नहीं जांचा कि कौन सा पिल्ला चोर है। लाली भी दूर से चुपचाप देखती। किसी को नहीं काटा। पर इस बार ठंड बहुत थी। रोली ने एक दिन देर रात बालकनी से देखा। नन्हे पिल्ले रो रहे थे। ठंड की वजह से। सब एक के ऊपर एक। उसका मन किया मम्मी से चादर मांग कर उन्हें उढ़ा दे। यह ख्वाहिश जाहिर करते ही उसे डाट पड़ गई। ठंड में कुड़ कुड़ करते बच्चों को देख रात भर सो नहीं पाई। अगले दिन संडे था। सुबह देर से उठी तो बच्चों का झुंड नीचे शोर कर रहा था। उसने नीचे झाका तो दिल धक से रह गया। सफेद वाला एक पिल्ला मर चुका था। लाली बार बार उसे सूंघ रही रही थी। बाकी के पिल्ले उसके ऊपर लेटकर मानो गरमी देकर उसे जिलाने की कोशिश कर रहे थे। रोली यह देखकर रोने लगी। मम्मी को जब पता चला तो उन्हें भी दुख हुआ। कुत्ते के बाकी पिल्लों को बचाने के लिए अब सारे बच्चे जुट चुके थे। हर बच्चा कुछ न कुछ लाया कालोनी में ही सीढ़ियों के नीचे एक पुरानी रजाई बिछाई गई। हर बच्चा फटी चादरें, रुई और खाने पीने का सामान लेकर आया और फिर लाली के पिल्लों को वहां रख दिया गया। लाली खुद वहां आ गई। बच्चों को देखकर वह दुम हिलाने लगी। बच्चों को भी समझ आ गया कि वह थैंक्यू बोल रही है और रोली मन ही मन सोच रही थी, इस बार लाली के बाकी पिल्ले जरूर जिंदा रहेंगे-

एक खास दिन मिसाइलमैन एपीजे कलाम के साथ

मिसाइलमैन एपीजे कलाम ने कहा-दुनिया भर के लेखकों से मैं कहना चाहता हूं। वह, यह जानने की कोशिश करें कि आखिर कैसे गांधी जी की बात हजारों गांवों के लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती थी। उस वक्त आज की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो था नहीं। दरअसल यह गांधी की लिखने की ताकत का कमाल था, वह बेहतरीन लिखते थे और रोजाना कम से कम एक पेज जरूर लिखते थे। गांधी कहते थे-कुछ करने से पहले उस सबसे गरीब आदमी का चेहरा याद करो, उसकी मजबूरियां याद करो जिसे तुमने देखा और फिर सोचो कि मैं कैसे उसकी मदद कर सकता हूं-
सच में आज कलाम साहब के साथ बिताया वक्त जिंदगी के कुछ सबसे खास लम्हों में से एक था। मैं जानता हूं कि लिटरेचरर कार्निवाल में आए बच्चों ने उनसे बहुत कुछ सीखा- खासतौर पर मैंने-

लगातार काम के बाद तीन दिन जिम कार्बेट में

करीब आठ महीने लगातार काम के बाद तीन दिन जिम कार्बेट में बिताए। बेहद रिफ्रेशिंग। एकदम तरोताजा महसूस कर रहा हूं। चालीस फिट ऊपर से सीधे नीचे नदी में गिरना हो या हवा में नदी के ऊपर से एक तरफ से दूसरी ओर जाना। सबकुछ जीवन दर्शन में बदलाव लाने वाला साबित हो रहा है। दो बड़ी बातें समझ आईं, अगर टीम के साथ एकजुट होकर काम करते हैं तो मुश्किल कुछ भी नहीं और जोखिम हर जगह है जिसे उठाने को तैयार रहना चाहिए।

ओंटेरियो झील पर सीएन टावर के नीचे



लेक ओंटेरियो को झील कहना हर लिहाज से गुस्ताखी होगी। टोरंटो में हार्बर पर खड़े क्रूज व बड़ी बड़ी बोट्स। अमेरिका के न्यूयार्क प्रांत को कनाडा के ओंटेरियो राज्य से जोड़ने वाली इसकी सैकडों मील की लम्बाई। हजारों तरह की वनस्पतियों, पेड़ पौधों और जीव जन्तुओं वाली बायोडायवर्सिटी मुझे हमेशा मजबूर करती है कि मैं इस झील को समुद्र के रूप में याद करूं। टोरंटो यात्रा के दौरान रोजाना मेरी सुबह और शाम इस झील के के किनारे ही बीतती थी। सुबह अक्सर हमारे साथ अरुण त्रिपाठी होते थे। वरिष्ठ पत्रकार हैं अरुण जी। 2006 में मैं हिन्दुस्तान लखनऊ में सीनियर रिपोर्टर था और वह दिल्ली में सीनियर न्यूज एडिटर। हम दोनो साथ ही टोरंटो गए थे। खैर बात सुबह की हो रही थी तो अरुण जी का जि़क्र आया। शाम वाले साथी और थे। अब बात की जाए सीएन टावर की। यह टावर टोरंटो की दूरसंचार सेवाओं को दुरुस्त रखने के लिए बनाया गया था पर अब यह पर्यटन केन्द्र के तौर पर जाना जाता है। काफी लम्बे अरसे तक यह विश्व का सबसे ऊंचा टावर माना जाता रहा। बाद में दुबई में बुर्ज खलीफा बनने के बाद यह पीछे छूट गया। फिर भी टोरंटो आने वाले हर पर्यटक इसकी ऊंचाइयों पर जाकर शहर व झील के नजारों को देखना नहीं भूलता। इसे सत्तर के दशक में बनाया गया था। वैसे यह सारी जानकारियां तो आप गूगल से भी ले सकते हैं। मैं तो बस फील का जिक्र करना चाहता हूं। अगस्त के महीने में जाइए, सबसे बढ़िया समय होता है। बहुत मजा आएगा-
 

टोरंटो के गोलगप्पे

टोरंटो में रहते रहते करीब दस बारह दिन बीत गए। कांटीनेंटल खाते खाते जी ऊब चुका था। सादा सादा, स्वाद के नाम पर नमक या काली मिर्च। आखिर कब तक। फिर खोज शुरू हुई भारतीय स्वादों की। चूंकि यहां भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं तो जाहिर है रेस्टोरेंट तो थे ही। तो फिर एक दिन हम निकल पड़े जेरार्ड रोड की ओर। यहां भारतीय और खासतौर पर दक्षिण एशियाई मुल्कों से जुड़े लोगों की बाजार है। साड़ी सूट जैसे विशुद्ध भारतीय परिधान भी यहां आपको मिल जाएंगे। खैर हमने धावा बोला साउथ इंडियन फूड चेन के मशहूर रेस्टोरेंट उडुप्पी पर। दोसा और रसम चावल खाकर तृप्त होने के बाद हमने इस बाजार को घूमना शुरू किया। यहां भारतीय फिल्मों के पोस्टरों के साथ इंडियन म्यूजिक शॉप भी दिखायी पड़ी। इसी दुकान में भेलपूड़ी, दही भल्ला और गोलगप्पे जैसी भारतीय चाट भी मिल रही थी। वैसे यह बताना जरूरी है कि मैने आजतक इतना महंगा गोलगप्पा आजतक नहीं खाया। पूरे चालीस रुपए का का एक। कुछ लोगों ने पान खाए। वैसे अच्छी बात यह रही कि जिन भारतीय लोगों ने यहां इंडियन रेस्टोरेंट या खानपान की दुकानें खोली हैं, वह क्वालिटी बहुत अच्छी रखते हैं। खाने का मजा जरूर आता है। टोरंटो में जेरार्ड रोड के अलावा भी कई जगहों पर भारतीय रेस्टोरेंट हैं। इनमें ज्यादा भीड़ नहीं होती क्योंकि ज्यादातर इनमें स्थानीय भारतीय या इंडियन टूरिस्ट ही खाने पहुंचते हैं। इक्का दुक्का विदेशी भी आते हैं पर जस्ट फॉर चेंज के मूड में। भारतीय डिशेज यहां लोकप्रिय हो रही हैं, लोग इन्हें जानते भी हैं पर वह लोगों की जुबान पर वैसे नहीं चढ़ीं, जैसे मैक्सिकन, चाइनीज़, थाई या इटैलियन फूड। हां समोसा जरूर यहां के कई स्टोर्स में दिख जाता है। सादे नमकीन आलू वाला जिसे यहां आप किसीी भी हालत में खाना शायद ही पसंद करें-

एक दिन रिचर्ड गेर के साथ

चूंकि मेरी पढ़ाई हिन्दी मीडियम की रही थी, इसलिए शुरुआती दिनों में हॉलीवुड या दूसरी अन्य विदेशी फिल्मों के बारे में जानकारी थोड़ी कम ही थी। अलबत्ता कुछ विदेशी स्टार्स जरूर ऐसे थे जिन्हें महज मै अपनी जनरल नॉलेज बढ़ाने के नजरिए से पहचानने और याद रखने की कोशिश करता। इन्हीं में शामिल हैं अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स और अभिनेता रिचर्ड गेर। इन्हें मैं तब से पहचानता हूं जब मैंने दसवीं क्लास पास की थी। अब इसे इत्तेफाक कहें या मेरी किस्मत। हॉलीवुड स्टार्स के साथ मेरी पहली मुलाकात भी रिचर्ड गेर के साथ हुई। 13 अगस्त 1996 को टोरंटो में। हम इंटरनेशनल एड्स कान्फ्रेंस में गेट्स फाउंडेशन की मदद से काइज़र फाउंडेशन वालों के साथ गए थे। रिचर्ड गेर भी इसी मकसद से स्टार टीवी और गोदरेज ग्रुप के साथ हीरोज प्रोजेक्ट चला रहे थे। इसी सिलसिले में काइज़र वालों ने हमारी एक एक्सक्लूसिव मुलाकात रिचर्ड, परमेश्वरन गोदरेज और उस वक्त के स्टार टीवी के सीईओ पीटर मुखर्जी के साथ कराई। रिचर्ड बेहद जमीनी शख्स निकले। यहां यह बताना वाजिब होगा कि रिचर्ड गेर का हालीवुड में वही रुतबा रहा है जब बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन का। दोनो तकरीबन समकालीन ही हैं। जिस वक्त अमिताभ दीवार और जंजीर के जरिए मुंबई में पांव जमा रहे थे, लगभग उसी वक्त यानी सत्तर के दशक की शुरुआत में रिचर्ड गेर फिल़्म अमेरिकन जिगेलो के जरिए लोगों के दिल पर छा रहे थे। बहरहाल हमारी मुलाकात दिलचस्प रही। उन्होंने भारत में चल रहे अपने प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी। करीब दो घंटे तक साथ रहे और इस दौरान एक बार भी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह कितने बड़े स्टार है। मेरी लिए उनसे सीखने के लिए शायद यही सबसे बड़ृी बात थी-हमेशा जमीन पर रहना-

पांच दिन यूरोप में


यह एम्सटर्डम है। हालैंड की राजधानी। 2006 की वल्र्ड एड्स समिट में जाने से पहले ही हमने यूरोप घूमने का प्लान बना लिया था। राजस्थान पत्रिका के हमारे साथी हरेन्द्र ने एम्सटर्डम, डेन हॉग और पेरिस में होटल की बुकिंग करा ली थी। वैसे हमें जर्मनी भी जाना था पर वक्त की कमी के कारण वो बुकिंग कैंसिल करानी पड़ी। पांच दिन की यह यूरोप यात्रा पूरी तरह से हमारी जेब पर निर्भर थी। हम तीन थे मैं हरेन्द्र और लोकसत्ता मुंबई के शेखरदेशमुख। हम तीनों ने ही कनाडा यात्रा के दौरान रोजाना मिलने वाले खर्च को बचाया, कुछ पास से मिलाया और यूरोप घूम लिया। दरअसल केएलएम एयरलाइंस की जिस फ्लाइट से हम दिल्ली से टोरंटो गए, उसको आते और जाते वक्त एम्सटर्डम में ब्रेक लेना था। लिहाजा हमने उसी टिकट में थोड़ा संशोधन कराकर पांच दिन का प्रोग्राम बना लिया। चूंकि यह पहली विदेश यात्रा थी और कोई टूर आपरेटर या गाइड भी साथ नहीं था, इसलिए काफी कुछ सीखा। हालैंड में तो खैर लोग अंग्रेजी बोलते थे लेकिन पेरिस में। वहां तो कोई अंग्रेजी में जवाब नहीं देता। हां इनफार्मेशन सेंटर जरूर अपवाद थे।





यह है कैनकुन। दक्षिणपूर्व मैक्सिको का एक खूबसूरत बीच। इसे अमेरिका का गोवा भी कहा जाता है। मेरे पीछे कैरेबियन सागर है। बेहद साफ और चमकदार। 2010 में मैं यहां गया था। दुनिया में जितनी भी सुंदर जगहें देखी हैं, उनमें से एक है कैनकुन। यहां के एयरपोर्ट से शहर के बीच के तीस किलोमीटर की हरियाली अद्भुत है। स्थानीय भाषा में कैनकुन का मतलब नेस्ट ऑफ स्नैक्स होता है। सांप तो नहीं दिखे पर कई विचित्र किस्म के जीव मैने यहां देखे। इनमें विशालकाय छिपकलियां भी शामिल हैं। 1974 के बीच यह जगह एक बड़े टूरिस्ट डेस्टिनेशन के तौर पर डेवलप हुई। भारतीयों के लिए दूरी जरूर ज्यादा है। यहां से अमेरिका और फिर न्यूयार्क से चार घंटे की फ्लाइट

यह कैरेबियन सागर है। मुझे तैरना नहीं आता पर मौसम बढ़िया था और पानी इतना साफ कि खुद रोक नहीं सका। थोड़ी हिम़्मत की और उतर गया पानी में। मेरे साथी सिद्दार्थ पाण्डेय ने वादा किया था कि अगर मैं डूबा तो वो बचा लेंगे। खैर यह नौबत नहीं आई क्योंकि उस दिन समुद्र में हाईटाइड या ज्वार नहीं था और मैं बहुत ज्यादा आगे भी नहीं बढ़ा। कैरेबियन सागर के आसपास ही वेस्टइंडीज के टापू वाले देश हैं। हमेशा अफसोस रहेगा कि काफी पास होने के बावजूद मै वहां नहीं जा पाया। हमारे देश के हजारों गिरमिटिया मजदूर तीन चार पीढ़ी पहले वहां जाकर बसे थे और अब वहीं के होकर रह गए हैं-

यह हैं दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में एक माया संस्कृति के कुछ अवशेष। इस जगह का नाम चेचेनइत्जा है। मैक्सिको के दक्षिणपूर्वी हिस्से के युक्तान प्रांत में कैनकुन से करीब दो सौ किलोमीटर दूर। दुनिया भर के लाखों पर्यटक हर साल यहां आते हैं। मेरे पीछे एक पिरामिड है जो माया वास्तुशास्त्र और उनकी ज्योतिषीय जानकारियों का अद्भुत नमूना है। हॉलिवडु से लेकर बॉलिवुड तक कबीलों, खजानों और तंत्र मंत्र पर जितनी फिल्में बनती हैं उनमें से ज्यादातर के पीछे माया सभ्यता की परम्पराओं का जिक्र होता है। अफ्रीका और भारतीय कबीलों की कई संस्कृतियों और माया सभ्यता के बीच काफी समानताएं भी दिखती हैं। मसलन यहां के लोग भी शेर और हाथी को पूजते थे जिस तरह हमारे यहां मां दुर्गा की सवारी और गणेश जी मानते हैं। ढेरों अन्धविश्वासों के साथ साथ इस सभ्यता में काफी कुछ वैज्ञानिक भी था। खासतौर से वास्तुशास्त्र। इन पिरामिडों की छाया से अलग अलग मौसम में अलग अलग आकृतियां बनती हैं। हमने खुद शाम के एक वक्त एक पिरामिड की छाया से मुंह खोले सांप की आकृति बनते देखी। यह माया सभ्यता के लोगों की अद्भुत निर्माण शैली का प्रतीक है-


टॉरटिया यानी मैक्सिकन रोटी। आमतौर पर मैक्सिकन जायके एशियन खासतौर भारतीय स्वाद के थोड़ा करीब हैं। यहां यूरोप की तरह ठंडा और बेस्वाद खाना नहीं है। टमाटर, लाल मिर्च और दूसरे तीखे मसालों से यहां की डिशेज का स्वाद काफी कुछ अपना सा लगता है। टॉरटिया का इस्तेमाल बिलकुल अपनी चपाती की तरह होती है। चाहें सब्जियां आदि भरकर टेको बना लो या फिर अलग अलग तरह के रोल बनाकर कोई अन्य डिश। रोटी मक्का के आटे की बनती है। वैसे काफी जगहों पर गेहूं के आटे का भी इस्तेमाल होता है। होटल व रेस्टोरेंट्स में टॉरटिया पारम्परिक तौर तवे पर बेल और सेंक कर बनती है पर यहां ऐसी मशीनें भी हैं जिनसे एक घंटे साठ हजार रोटियां तक बन जाती हैं। मैक्सिकन जायकों में मीट व सीफूड की बहुतायत है। वैसे मेरी अपनी पसंद तो टेको और सीफूड था। यहां इटैलियन और चाइनीज़ फूड भी आसानी से मिल जाता है। एक दो इंडियन रेस्टोरेंट भी हैं-

कैनकुन में मुख्य शहर से बाहर डाउन टाउन जाते ही आपको इस तरह आर्मी की गाड़ियां नजर आएंगी। इन पर मशीनगनों के साथ खड़े सैनिक अनायास भय का अहसास कराते हैं। दरअसल मैक्सिकों में पिछले कुछ सालों से ड्रग माफिया वार चल रही है। इसमें पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह युद्ध ज्यादातर उन इलाकों में होते हैं जहां देश की सीमाएं हैं। कैनकुन के इलाके में भी करीब एक हजार किलोमीटर लम्बी सीमा है। वैसे अच्छी बात यह है कि कभी इस लड़ाई में टूरिस्टों को कोई नुकसान नहीं हुआ। हम यहां करीब दस दिन तक रहे, कभी भी किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। कैनकुन जाइए और आराम से घूमिए-



यह है मैक्सिकन हैट। मैक्सिको आने वाले ज्यादातर पर्यटक इस हैट को यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाना नहीं भूलते। हालांकि मैं भूल गया। इस तरह की हैट ज्यादातर इस देश के कस्बाई इलाकों में लोगों के सिर पर दिखती है। टूरिस्टों में भी यह काफी लोकप्रिय है। वैसे मैक्सिको के अलावा इस तरह की हैट्स स्पेन में भी काफी पसंद की जाती हैं। मैक्सिकन हैट डांस भी काफी मशहूर है। इस डांस में थ्री पीस सूट के साथ ऐसी हैट पहने हुए प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए टैप डांस करता है। अपने स्टैप्स और हावभाव से उसे प्रभावित करना चाहता है। दूसरी तरफ प्रेमिका जो साधारण से कपड़े पहने हुए होती है, वह इस डांस से कतई प्रभावित नहीं होती और उसे इग्नोर करती है। डांस के आखिरी हिस्से में प्रेमी अपनी हैट उतारकर जमीन पर फेंक देता है और कुछ फुर्तीले स्टैप्स दिखाता है। मसलन वह अपनी टांगों को अपने सिर के ऊपर ले जाकर अपनी स्मार्ट्सनेस दिखाता है। इससे खुश होकर उसकी साथी फिर साथ में डांस करने लगती है। बहरहाल ऐसा करने का कोई अवसर मेरे पास नहीं था। इस बारे में मुझे यहां पूछने पर ही पता चला।

 
विदेश से अगर आपको दोस़्तों-रिश्तेदारों के लिए गिफ्ट खरीदने हों और ज्यादा खर्च भी न करना हो तो फ्लीया मार्केट सबसे अच्छा विकल्प होता है। इसकी तुलना अब लखनऊ के लव लेन से कर सकते हैं। फ्लीया मार्केट जैसे बाजार ज्यादातर देशों में होते हैं अलग अलग नामों से। मिसाल के तौर मैं अगर कैनकुन की बात करूं तो यहां काफी अच्छी चीजें मिल रही थीं। पर जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो वहां डरबन बीच पर लगी दुकानों के सामान न तो ज्यादा अच्छे थे और न ही सस्ते। लिहाजा खरीददारी देखभाल कर ही करनी चाहिए और हां मोलभाव सबसे जरूरी है। कई बार चीजें कई गुना महंगी करके बतायी जाती हैं। मैने कैनकुन की इस बाजार में इतना ज्यादा मोलभाव किया कि दुकान चला रही महिला झल्ला गई। एक स्वेटर मुझे बेचने के बाद उसने मुझसे मेरा नाम पूछा, मैने कहा सुधीर, उसने गुस्से में कहा-नो सुधीर यू आर चीपो फिलिपो, मैं हंसता हुआ चला आया-


 यकीन मानिए, यह मेरे पुराने ई 63 नोकिया मोबाइल से खींचा गया फोटोग्राफ है। सिर्फ दो मेगापिक्सल वाले कैमरे से। कैनकुन के ग्रैंड कैनकुन होटल की खासियत यही है कि यहां के ज्यादातर कमरों से समुद्र में उगते हुए सूरज की खूबसूरती को रोज सुबह निहार सकते हैं। मैने तो पहली ही रात पौने छह बजे का अलार्म लगाया। रात में मेरे रूम पार्टनर सिद्धार्थ और मैने तय किया था कि दोनो लोग देखेंगे पर वह गहरी नींद सो रहा था। मै चुपचाप एक कुर्सी लेकर कमरे के बाहर टैरेस पर आ गया। सूरज अभी निकला नहीं था। कैरेबियन सागर के क्षितिज पर जैसे ही लालिमा गहरी हुई, मैने मोबाइल कैमरा ऑन कर लिया। यकीन मानिए इतना सुंदर नजारा नहीं देखा। धीरे धीरे अंडे की जर्दी जैसा नारंगी सूरज उदय हो गया। सूरज उगने और डूबने के नजारे दुनिया के कई मुल्कों में बेहद खूबसूरत होते हैं। पर पहाड़ों और समुद्र के किनारे इनकी बात ही कुछ और होती है। खासतौर पर फोटोग्राफी करने में-
 मैक्सिको से भारत लौटते वक्त शिकागो होकर आना था हालांकि हमको वहां रुकना नहीं था। अमेरिकन एयरलाइंस में कुछ तकनीकी गड़बड़ी के कारण फ्लाइट लेट हो गई। इस वजह से दिल्ली जाने वाली हमारी फ्लाइट छूट गई। खैर, अमेरिकन एयरलाइंस वालों ने उस रात हमें होटल रेडिसन में ठहराया और कहा-कुछ घंटे शिकागो घूम लीजिए, फिर कल अगली फ्लाइट लीजिएगा। हमारी तो निकल पड़ी, खासतौर मैं क्योंकि मेरे पास एक गरम जैकेट थी और वहां काफी बर्फबारी हो रही थी। तापमान करीब माइनस आठ था। मै होटल पहुंचा और निकल पड़ा घूमने। पास में ही एक मॉल था। वहां जाकर खरीदारी की। फिर बाहर निकलकर बर्फबारी का मजा लिया। हम चार लोग थे। एनडीटीवी के सिद्धार्थ पाण्डेय, टेलीग्राफ के जयंतो और लोकमत के राजू नायक। ठंडे इतनी ज्यादा थी कि सबकी हालत खराब हो गई। उपाय सूझा कि रम पी जाए। कैप्टन मॉर्गन रम ली और शिकागो का मशहूर पिज्जा होटल के कमरे में ही मंगाया गया और फिर शुरू हुआ जश्न। वो रात कभी नहीं भूलती। बेहद ठंडी रात। रात दो बजे तक हम अमेरिका के होटल के उस कमरे में हिऩ्दी गानों पर नाचते रहे। बड़ा सुकून था कि अच्छी खरीदारी हो भी गई। मैने एक कैमरा और जैकेट ली। साथियों ने कई इलेक्ट्रानिक गैजेट्स खरीदे। वहां सस्ते मिल रहे थे। हां एक मलाल जरूर था कि हमारे पास शिकागो में चंद घंटे ही थे, ज़्यादा घूम नहीं सके। यादगार के नाम पर शिकागो के फिफ्थ वल्र्ड बैंक के सामने खिंचवाई गई यह तस्वीर ही है कि हमने कैसे शिकागो का मजा लिया। सच तो यही है कि हम वहां कुछ खास देख नहीं पाए। सिवा ओ हेर एयरपोर्ट, होटल रेडिसन और एक मॉल के- खैर फिर कभी शिकागो भी देखा जाएगा और अमेरिका भी-
 
यह नियाग्रा फॉल। सन 2007, यह पहला मौका था जब मुझे पासपोर्ट बनवाने की जरूरत पड़ी। काइज़र फाउंडेशन यूएस से मुझे एचआईवी एड्स पर रिपोर्ट करने के लिए एक फैलोशिप मिली। इसी दौरान कनाडा के टोरंटों में वल्र्ड एड्स कान्फ्रेंस हुई। मुझे भी इसमें जाने का मौका मिला। जिंदगी के वो पल सबसे ज्यादा रोमांचित करने वाले थे। मुझे पहली बार दिल्ली में कनाडा एम्बेसी में हुई एक पार्टी में जाने का मौका मिला। इसमें बताया गया कि कनाडा कैसा देश है, वहां की क्या खासियत है। कनूाडा के राजदूत हम लोगों से मिले। अगस्त के महीने में हम टोरंटो पहुंचे। हम कान्फ्रेंस से पांच दिन पहले ही पहुंच गए थे। इस दौरान हैल्थ जर्नलिज्म पर हमारी कुछ वर्कशॉप थीं। इसी दौरान काइज़र फाउंडेशन वाले हमे नियाग्रा फॉल दिखाने ले गए। अमेरिका और कनाडा के बीचोबीच नियाग्रा नदी के यह विशालकाय जलप्रपात सेवन वन्डर्स में गिने जाते रहे हैं। वाकई में यह आश्चर्य ही हैं। अथाह जलराशि इतनी तेजी से नीचे गिरती है कि उससे बादल बन जाते हैं जो मीलों दूर से आसमान में नजर आते हैं। फॉल्स के नीचे जाने के लिए क्रूज टाइप के बड़े बड़े मोटरबोट होते हैं। इनमें जाने से पहले नीली पॉलीथिन का एक रेनकोट पहनना होता है क्योंकि यहां काफी ज्यादा नमी होती है जिसमें लोग भीग जाते हैं। हम बोट से वहां गए और दुनिया की सबसे खूबसूरत मानी जाने वाली इस जगह के यादगार लम्हों को जेहन में समेट लाए। वाकई यह ऐसे पल थे जो कभी नहीं भूले। टोरंटो से नियाग्रा तक के करीब चार घंटे के बस के सफर की बात न की जाए तो यह गलत होगा। सफर बेहद खूबसूरत था। इस दौरान हमने कनाडा के कंट्री साइड को देखा। वाइनरीज देखीं जहां दुनिया की सबसे अच्छी माने जाने वाली वाइन बनती हैं। वाइनरीज़ के मालिक सीधे हैलीकाप्टर से खेतों में उतरते हैं। रास्ते में पड़ने वाले ढाबों में कोई भी तली भुनी चीज नहीं मिली। फल, जूस और ड्राइफूट जैसी चीजें। एकदम अलग और नया अनुभव था देने वाली थी यह यात्रा-
 हर किसी की जिंदगी में ऐसे लोग आते ही हैं जो गहरा असर छोड़ते हैं। मेरे जीवन के कुछ ऐसे लोगों में कल्पना जैन भी हैं। काफी पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में हैल्थ एडिटर रही हैं। फिलहाल हावर्ड यूनीवर्सिटर में फैकेल्टी हैं। मेरी इनसे पहली मुलाकात शायद 2006 के आखिर या 2007 में हुई थी। उस वक्त कल्पना काइज़र फाउंडेशन की इंटरनेशनल फैलो थीं। उन्हीं के जरिए मुझे भी भारत में काम करने के लिए यह फैलोशिप मिली। इस फैलोशिप के दौरान मैने पहली बार हेल्थ जर्नलिज्म की गहराई और गंभीरता को सही अर्थों में समझा। कल्पना जैन पहली ऐसी जर्नलिस्ट हैं जिन्होंने एचआईवी पॉजिटिव लोगों की तकलीफ और उनके प्रति समाज के नजरिए को एक किताब के जरिए लोगों के सामने रखा। उनकी किताब का नाम पॉजिटिव लाइव्स है जिसे पेंग्विन ने छापा। यकीन मानिए कि मुझे पहले रोग, रोगियों औरक सेहत से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता न के बराबर थी, कल्पना जैन से मिलने के बाद मैने लोगों के दर्द को समझा। टोरंटों में ऐसी कई वर्कशॉप और सेशन हुए जिसने मुझे जर्नलिज्म के प्रति कहीं ज्यादा मेच्योर किया- खैर यह फोटो उसी दौरान नियाग्रा फॉल्स भ्रमण की है-
 नियाग्रा नदी अमेरिका और कनाडा के बीच का नेचुरल बॉर्डर है। 19वीं शताब्दी में इस नदी पर कोई पुल नहीं था। तब न्यूयार्क की एक कंपनी मेड ऑफ मिस्ट दोनों देशों के लोगों को इधर से उधर लाने ले जाने के लिए मोटरबोट की फेरी चलाती थी। इस मोटरबोट को ही मेड ऑफ मिस्ट कहते हैं। बाद में नदी पर ब्रिज बन गया। इससे बोट वालों की आमदनी एकदम से घट गई। बाद में इसे एक टूरिस्ट बोट में बदल दिया गया। आज हर साल लाखों लोग अमेरिका और कनाडा की साइड से इस विशाल जलप्रपात को देखने आते हैं। यहां आने वाले मिस्ट ऑफ मेड फेरीबोट के जरिए ही इस प्रपात के करीब तक जाना होता है। यह बेहद खूबसूरत नजारा होता है। पानी की फुहारों और सूर्य की रोशनी के परावर्तन से अक्सर अक्सर इंद्रधनुष दिखता है। मै जिस दिन गया, मुझे भी वो नजारा नजर आया। यहां जाने के लिए सभी लोगों को एक रेनकोट दिया जाता है जिस पर मेड ऑफ मिस्ट लिखा होता है। इसे लोग यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं।
 सपनों की तामीर का शहर टोरंटो
मेरे सपनों की तामीर का शहर। भूगोल पढ़ना बहुत अच्छा लगता था बचपन से। कौन सा देश कहां है, महाद्वीप कितने हैं और कौन सा महासागर सबसे गहरा। प्रेयरीज घास के मैदान कहां हैं और आल्पस हिल्स की रेंज किस कांटीनेंट है। यह सारी बातें मुझे बचपन से रटी हुई थीं और आज भी हैं। बड़ी ख्वाहिश थी कि इन सारी जगहों को जिन्हें मैने पढ़कर याद किया है, उन्हें देख के समझूं। मेरी यह ख्वाहिश पूरी हुई और टोरंटो वह पहला शहर था जहां पहली बार विदेश की जमीन पर मैने पांव रखे। एक लम्बी लेमोजि़न सरीखी टैक्सी हमे लेने के लिए एयरपोर्ट पर खड़ी थी। आखिर हम उस वक्त दुनिया के सबसे बड़े रईस बिल गेट्स के फाउंडेशन के मेहमान जो थे। टोरंटो एयरपोर्ट शायद दुनिया का पहला ऐसा एयरपोर्ट है जहां अंग्रेजी और फ्रेंच के साथ साथ गुरुमुखी में भी शहर का नाम लिखा है। भारतीय बड़ी तादाद में यहां रहते हैं। खासतौर पर सिख् और गुजराती सिन्धी। यहां की सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी का नाम खालिस्तान ट्रांसपोर्ट कंपनी है। भारतीय खाने, कपड़े, म्यूजिक और तमाम दूसरी चीजों की यहां बड़ी बाजारें हैं। घूमने लायक काफी जगहें हैं। ओंटेरियो झील के किनारे बसा यह शहर कनाडा के सबसे शहरों में से एक है। मै यहां वल्र्ड एड्स कान्फ्रेंस को कवर करने के सिलसिले में पहुंचा था-