Tuesday, December 17, 2013

खून बरसा है खेतों मे इस बार
सुना है खूब वोट उगेंगे इस बार
कलफ लगे खादी के सफेद कुर्ते वाले
भाई बंदी की तकरीरें करेंगे इस बार



काश लाशें बोल पातीं
वो जोर जोर चिल्लातीं
चिता मे शोर मचातीं
कब्रों से आवाज लगातीं
नेताओं.. वोट ले लो वोट
..मेरे खून से सने वोट



शब्द अम्रृत शब्द हैं विष
शब्दों से वार भी होते हैं
शब्द जीता दे शब्द हरा दे
शब्दों मे आकार भी होते हैं
 



हवा कुछ भीगी भीगी सी है
ये सीलन जाने क्या करेगी
हाँ ये दीवारें बदरंग तो हुई हैं
पुराने रंग झाँक रहे हैं इनमे से


वक्त किताब नहीं होता। इसके पन्ने भी नहीं होते। आप वापस कुछ नहीं पलट सकते। सिर्फ अहसास कर सकते हैं, बीते हुए पलों की उन खुशबुओं का, जो करीब न होते हुए भी खुद को महसूस कराती हैं, जो न होकर भी बसी होती हैं जेहन में, एक झूठ की तरह, एक फरेब की तरह, एक मृगतृष्णा सी, जो नहीं होकर भी दिखती है रेगिस्तान में पानी सी-