गूलर का फूल

बारिश का मौसम है। नीम की रसीली निमकौरियाँ टपाटप टपक रही हैं। खरे दादा की बगिया भी खूब हरियाई हुई है। बगिया के बाहरी कोने में लगे पेड़ में लाल-लाल गूलर लगे हैं। भीतर बगिया में अमरूद, शहतूत और मौसमी भी लगी हुई हैं। दादा ने बड़े जतन से लखनऊ की गरमी में भी मौसमी उगायी है, जिन तक आमतौर पर चौथी क्लास में पढऩे वाले चीटू जैसे छोटे बच्चों की पहुँच कम ही है। हाँ, अमरूद के मौसम में बगिया जरूर उजड़ती है। खरे परिवार की लाख पहरेदारी के बावजूद बच्चों की वानर सेना घुसपैठ का मौका ढूंढ़ ही लेती है। बड़े बच्चों के झुंड में चीटू भी हाथ साफ कर लेता है। एक बार मौका मिला तो फिर बच्चे बगिया की ऐसी सफाई करते हैं कि क्या अमरूद और क्या मौसमी, कच्चा हो या पक्का सब जेबों में या फिर नेकर में खुसी हुर्ई शर्ट के भीतर। आज फिर इस टिड्डे दल ने बगिया को उजाड़ दिया था। दादा ने बगिया को देखा तो उनका हार्ट फेल होते-होते बचा। खरे दादा निकल पड़े शिकायत करने। पहली शामत चीटू की थी।

घर के बाहर कुंडी खटकी और आवाज़ आई-अरे भाई मिश्रा जी, घर में हो क्या?
चीटू के पापा कुछ देर पहले ही घर पहुँचे थे। उनकी कुछ खास आदतें हैं। जैसे जब कभी वह बाहर से घर वापस आते हैं तो कम से कम आधा घंटे तक उनका पारा सातवें आसमान पर रहता है। उनकी हनक और सनक से घर वाले तो घर वाले बाहर वाले भी काँपते हैं। पर बेचारे खरे दादा की बगिया उजड़ी थी। तबाही मचाने वालों की उनकी फेहरिस्त में पहला नाम चीटू का ही था।
तीसरी बार जैसे ही आवाज आई-मिश्रा जी...
वो बिना कमीज-बनियान सिर्फ तहमद लपेटते हुए ही बाहर निकल आए और बोले-बताइए।
खरे दादा उनका रौद्र रूप देखते ही दहल गए और रिरियाते हुए बोले-कुछ नहीं मिश्राजी, बस मैं ये कह रहा था कि चीटू को थोड़ा संभालिए। नाले वाले फिरोज, चांद और ननके के साथ रहेगा तो बिगड़ जाएगा। आज इन लोगों ने पूरी बगिया तहस-नहस कर दी। अरे अगर इसे अमरूद या मौसमी चाहिए तो घर आ जाया करे, मैं खुद ही दे दिया करूंगा।
इतना कहकर खरे दादा तो खिसक लिए। बड़ी उमस थी उस वक्त।
ऊपर से जब भी मिश्राजी गुस्सा करते तो चीटू ऐसे ही पसीने में नहा जाता था। मिश्राजी ने पहले तो रेडियो तेज किया। फिर आव देखा न ताव कपड़े पीटने वाली मुगरी उठाई और दे-दनादन पीठ लाल कर दी।
साथ ही बोल रहे थे-भूखा रखता हूँ तुझे, साले बदनामी कराता घूम रहा है पूरे मोहगे में। चीटू हाथ जोड़े रोने लगा।
'पापा नहीं, मैं तो गूलर तोड़ रहा था। बगिया में गया ही नहीं।'
इतना सुनते ही मिश्राजी ने हुक्मनामा सुना दिया-आज खाना नहीं मिलेगा इसे। बेटा गूलर ही खाना अब।
यह सारी बातें घर वालों के बीच ही रहीं। बाहर तो लोगों को सिर्फ गाना ही सुनाई पड़ रहा था। मिश्राजी बड़े तमीज वाले हैं। घर में जब भी मारपीट करते हैं तो रेडियो जोर से बजा देते हैं। ताकि गली के लोगों तक रोना-धोना और गालीगलौज न पहुँचे।
चीटू चुपचाप छत पर निकल लिया।
तब तक आँटी बोलीं-जरा राजू को बाहर घुमा लाओ, खाना बनाना है।
आँटी यानी चीटू की दूसरी माँ।
चीटू गुस्से में तो था ही (सोचने लगा)-खाना तो मिलना नहीं है मुझे। इस राजू को और घुमाओ।
डेढ़ साल का राजू न जाने क्यों जोर-जोर से रो रहा था।
खैर चीटू ने राजू को गोद में उठाया और फिर पहुँच गया टीले पर मंदिर के पास गूलर के पेड़ के नीचे। गूलर का यह पेड़ उसका ही नहीं, मोहल्ले के सारे बच्चों और बुजुर्र्गों का दोस्त है। इसकी छाँव में गली की पंचायत से लेकर देश की राजनीति तक पर चर्चा होती है। शाम का वक्त है। चाची पहले से ही बैठी हुर्ईं हैं। चाची पूरे मोहल्ले की चाची हैं। मिश्राजी भी उन्हें चाची कहते हैं और चीटू भी।
चीटू को उनकी एक बात सबसे अच्छी लगती है कि रेडियो के तेज गानों के बावजूद वो आसानी से जान जाती हैं कि मिश्राजी ने घर में कब किसको पीटा।
चीटू की रोनी सूरत देखते ही उन्होंने कहा-क्या हुआ?
वो पहले से ही भरा हुआ था। तुरंत फफक पड़ा-पापा ने मारा है।
चाची ने तुरंत धोती के पल्लू से आँसू पोछे और बोलीं-तुम्हारी आंटी ने बचाया नहीं।
वो कुछ नहीं बोला।
चाची ने साथ बैठी औरतों के साथ हाथ नचा-नचाकर प्रवचन शुरू कर दिया- यही होता है सगी माँ के मरने पर। तीन महीने हुए नहीं, दूसरी ब्याह लाए मिश्रा। अब बच्चों की तो छीछालेदर हो गई।
शुक्लाइन ने सुर में सुर मिलाया-बताओ भला।
चीटू का मुँह और उतर गया।
सामने से रमन चाचा आते हुए दिखाई दिए।
चाची को देखते ही चाचा बोले-चाची पाँव लागी।
खुश रहो-तुम तो गुलरी केर फूर हुर्ई गए, हौ कहाँ।
बाकी बातें क्या हुई, चीटू ने ध्यान नहीं दिया पर गुलरी केर फूर यानी गूलर के फूल को लेकर उसकी जिज्ञासा जाग उठी।
पूछ ही बैठा-चाची ये गूलर का फूल क्या है?
चाची बोलीं-कभी गूलर का फूल देखा है।
उसने कहा नहीं।
चाची बोलीं-मैंने भी नहीं देखा पर हमारे नाना को एक फूल मिला था। उन्होंने एक चुड़ैल की चुटिया काटी थी। उसी चुड़ैल ने लाकर दिया था।
चीटू की आँखें फैल गईं-हैं... चुड़ैल की चुटिया।
'हाँ... अगर कोई चुडै़ल की चुटिया काट ले तो फिर चुड़ैल उसकी जिंदगी भर गुलामी करती है। मेरे दादा ने उसकी चुटिया तभी वापस की जब उसने गूलर का फूल लाकर दिया।'
चाची के चेहरे पर फ्लैशबैक में जाने जैसे भाव थे-जब तक नाना के पास गूलर का फूल रहा, उनके घर बड़ी जमींदारी रही। बड़े-बड़े अंग्रेज बहादुर भी आते थे उनसे मिलने। फिर फूल चोरी हो गया।
चीटू को समझ नहीं आया कि गूलर के फूल में ऐसी क्या बात है?
चाची बोलीं-चीटू अगर गूलर का फूल मिल जाए तो हर मुराद पूरी हो जाती है।
तब तक चाची का बुलावा आ गया और वो वापस चली गईं।
चीटू भी उनके पीछे-पीछे अपने घर चला गया। राजू रो रहा था, उसे आँटी के हवाले किया।
मिश्राजी बरामदे की अलमारी में परदे के पीछे से मुंह पोछते हुए निकले।
हुक्म मिला-जाओ ऊपर।
चीटू समझ गया, ये रोज का नियम था। अंग्रेजी दारू की एक अद्धी हर दूसरे दिन खुलती था। भुने हुए काजू, कटा हुआ पनीर और सलाद।
हाँ, खास बात यह थी कि उन्हें पीते हुए कोई नहीं देख पाता।
मिश्राजी का मानना था कि शराब पीना बुरी बात है। लिहाजा बच्चों के सामने नहीं पीनी चाहिए। अलबत्ता सिगरेट वो चीटू से मंगाकर ही पीते थे।
तब तक चीटू को भी भूख लगने लगी। पेट में चूहे कूद रहे थे और आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी।
मन ही मन सोचने लगा-मम्मी होती तो कितना अच्छा होता। मजाल क्या थी कि पापा इस तरह से पीट पाते। बेचारी खुद आगे आकर मार खा लेती थीं पर मुझे नहीं पिटने देतीं।
अचानक याद आई-कितनी अच्छी भिंडी बनाती थीं वो। पराठों के साथ।
भगवान, क्या मम्मी वापस नहीं आ सकतीं?
अचानक चीटू को चाची की बात याद आई-गूलर का फूल और इच्छा पूर्ति।
अगर गूलर का फूल मिल जाए तो? हाँ तब तो जरूर मम्मी फिर से जिंदा हो जाएँगी।
चीटू को अस्पताल में लेटी मम्मी का चेहरा याद आने लगा।
डॉक्टर कह रहे थे-नाइंटी पर्सेन्ट बर्न है, नो होप।
पाँव के नाखून से सिर के बालों तक वो बुरी तरह से झुलसी हुर्ई थीं।
चेहरे की खाल जगह-जगह से उधड़कर लटक रही थीं।
तभी उन्होंने चीटू को बुलाया।
उनकी हालत देखकर चीटू रोने लगा। मम्मी का चेहरा एक अजीब सी भावहीन द्रणता ओढ़े हुआ था। शायद तकलीफ और दर्द का अहसास ही खत्म हो चुका था।
वो बोलीं-पास आओ बेटा।
चीटू उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
उन्होंने बिना सिर या गरदन हिलाए उसकी आँखों में देखा और बोलीं-बेटा, खूब पढऩा, बड़े आदमी बनना और हाँ अपने पापा का हमेशा कहना मानना।
उसके बाद उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
चीटू को सब ने बाहर निकाल दिया।
सुबह पाँच बजे के करीब उनकी मौत हो गई।
चीटू की सोच की तंद्रा टूटी-वो सोचने लगा कि ये मम्मी भगवान के घर जाते-जाते क्या कह गईं?
पापा कितने बेरहम हैं। इतना मारते हैं। खाना भी बंद कर देते हैं।
भूख और जोरों से लगने लगी थी।
तब तक मिश्राजी की आवाज आई-नीचे आओ।
सब लोग खाना खाकर बिस्तर पर जा चुके थे।
मिश्राजी आंगन में पड़े तखत पर बैठे हुए थे। दोनो हाथ पीछे की ओर करके टेक लगाए हुए। आसमान में बादल थे और मिश्राजी के चेहरे पर दारू का सुरूर घुमड़ा पड़ रहा था।
चीटू जानता था अब पापा के लेक्चर का टाइम हो गया, मगर उनके चेहरे पर अचानक दार्शनिक भाव आ गए और उन्होंने बोलना शुरू किया-क्या हूँ मैं? दुश्मन हूँ् तुम्हारा। यही सोचते होगे पर तुम, पर तुम नहीं जानते कि तुम्हारे बाप को अपने बच्चों की इज्जत कितनी प्यारी है। मैं कैसे जीया मुझे कोई परवाह नहीं पर कोई साला आकर मेरे बच्चों को कुछ कहे...उसकी माँ...।
फिर अचानक उनकी आँखों से आँसू निकलने लगे।
तुम क्या सोचते हो, तुम्हें मारकर या भूखा रखकर मुझे सुख मिलता है। पर ये प्रताडऩा जरूरी है नहीं तो तुम लोग भी बड़े होकर कुछ नहीं बन पाओगे। मेरे जैसे रह जाओगे।
फिर अचानक उठे और किचन से खाने की थाली लाकर चीटू के सामने रख दी।
अचानक उसे पापा अच्छे लगने लगे। वो खाने पर टूट पड़ा।
मिश्राजी सोने चले गए।
चीटू के पेट की भूख शांत हो चुकी थी पर पीठ का दर्र्द तेज हो उठा।
वो पापा के बारे में सोचने लगा-सुबह फिर ताव खाएँगे और किसी न किसी बात पर मारेंगे। मम्मी की फिर याद आयी। दिमाग में अभी भी गूलर का फूल नाच रहा था। सब लोग सो चुके थे। उसने चुपचाप बाहर वाले दरवाजे की कुंडी खोली। रात के पौने बारह बज चुके थे। चाची ने कहा था कि गूलर का फूल रात में ठीक बारह बजे दिखता है। जिन्न और अप्सराएँ उन्हें तोडऩे आते हैं। अंधेरे में डरते-डरते चीटू पेड़ के नीचे पहुँचा। ऊपर कुछ नजर नहीं आ रहा था। हरे-हरे पत्तों के बीच गूलर की मोटी-मोटी डालियाँ दैत्य के हाथ-पाँव जैसी नजर आ रही थीं। बारह बज चुके थे। कहीं कोई फूल नजर नहीं आया। वो हारकर वापस घर आ गया। बहुत देर तक नींद नहीं आई। पीठ दुख रही थी। आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। चीटू के बचपन का यह सिलसिला लम्बे अरसे तक चला। चीटू को जब मार पड़ती, कोई तकलीफ होती या दुख होता, उसे सिर्फ गूलर के फूल में उम्मीद नजर आती। हमेशा उम्मीद रही कि एक न एक दिन जरूर गूलर का फूल मिलेगा।
वह फूल के आगे अपनी ख्वाहिश रखेगा-मेरी मम्मी को जिंदा कर दो।
चीटू को खुद पता नहीं चला कि कब वो इस सच को समझने लगा। सच यानी गूलर का फूल कभी नहीं खिलता और न ही कभी वो मम्मी वापस आती है, जो भगवान के घर चली गई।
अब वो गूलर के नीचे नहीं जाता.. बड़ा जो हो गया है...

Comments

  1. kahani achhi hai kahanikar banne ki soch rahe hai kya

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  2. bahut acchi lagi, aaj pata chala acche editor to ho hi, kahanikar usse bhi acche ho.
    bina teep-tippani ki iccha ke likhte raho,logo ke dil-o-dimag par chate raho.

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  3. बहुत खूब। क्या कहने सुधीर जी। मजा आ गया। मैं तो एक सांस में पढ़ गया। वाकई मजा आ गया। ये बताइए कहानी पहले की है या हाल ही में लिाी है। भई सच बताऊं तो मैं आपके इस रूप से तो वाकिफ ही नहीं था। पहली बार पता चला कि आप कहानी भी लिखते हैं।
    चीटू बालक था तब तक वह गूलर के फूल का इंतजार करता रहा, बड़ा हो गया तो समझदार हो गया। अभी तक किसी के गायब होने पर उसे ईद का चंद होना कहते हैं, पहली बार गूलर के फूल का इस्तेमाल सुना। और हां... मिश्रा जी की पिटाई करने और चिल्लाने की स्टाइल बड़ी अच्छी थी, रेडियो तेज करके। संगीत की धुन पर.....। शानदार कहानी के लिए मेरी ओर से शुभकामनाएं स्वीकार करें। कहानी पढ़ाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  4. bahut umda...puri kahani ne band ke rakha...gud keep it up :]

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  5. kya baat hai dear,kya apna profession badalne ki soach rahe ho,It is a good story,apni kahaniyo ka SANGRAHA kar kitaab publish karvao,my dear LEKHAK JI...........

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  6. अच्छी कोशिश। बधाई।

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  7. khani bht acchi hai sir ji. umeed hai dusri khani bhi jald padhne ko milegi....

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  8. badhia prastuti...umeed hai agey bhi jarri rahegi...

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  9. Umda shuruat! ham to kisi halke fulke andaj ki apeksha kar rahe they lekin apne to gambhir punch maar dia. Badhai aur swagat! Umeed ki jati hai ki ye munch apke vyktitva ke ek aur pahlu ko samne layega! Shubhkamnayen!

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  10. भाई मैं इस समय कुछ कहने कि स्थिति में नहीं रह गया हूँ. तुम्हारे इस "गूलर का फ़ूल" ने तो रुला दिया. आँखे नाम हैं, गला रुंधा और पता नहीं क्यों हाथ काँप रहे हैं. जैसे मेरे किसी अपने या कहे पड़ोस के चीटू की कहानी सुना गए तुम.!!!!
    एक और बात समाज की फितरत और ख़ास तौर पर छोटे मोहल्लों में सामाजिकता, प्रतिष्ठा का मिथ्याभास आदि का जो चित्र "गूलर के फूल" में खिंचा है वह अनायास ही पाठक को माहौल का आभास करा देता है. भाषा प्रवाहमय तथा सुस्पष्ट है. इसके अलावा 'गूलर का फूल होना' मुहावरे में तुमने जिस अभिलाषा, आकांक्षा को समेटा है वह अद्भुद है.
    कहानी में भले ही न हुआ हो लेकिन मुझे विश्वास है कि मेरे इस चीटू की वह तमन्नाएँ एक दिन ज़रूर पूरी होंगी.
    ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है और इतनी धमाकेदार शुरुआत के लिए बहुत-बहुत बधाई!!!!!!
    सप्रेम....
    मनीष...

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  11. कहानी में मैं इतना गुम हो गया, लगा कि मैं चिंटू के हर उस दर्द और आसुओं का साक्षी हूँ जो उसने सहा | मैं, चिंटू के अमरुद चुराने की ख़ुशी से लेकर आखो में पाने की चमक, मार और आंसू , माँ के जाने का खालीपन.... वो सब मैं महसूस कर रहा था पर मुझे दुःख इस बात का रहा कि चाहकर भी मैं चिंटू का हाथ थाम नहीं पाया |
    हाँ...........पर ख़ुशी इस बात कि हैं कि इस पूरे सफ़र में आखों ने पूरा साथ दिया |

    भीड़ में यूँ न छोड़ो मुझे घर लौट के भी आ ना पाऊँ माँ
    भेज न इतना दूर मुझको तू, याद भी तुझको आ ना पाऊँ माँ
    क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ , तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ
    तुझे सब हैं पता हैं न माँ
    तुझे सब हैं पता,,मेरी माँ

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  12. बहुत खूब बड़े भईया,
    चींटू की व्यथा का दिल से अहसास हुआ, बस कहानी पढ़ते-पढ़ते गांव का जोहड़, बगिया, शहतूत, नीम ...........सब याद आ गए। आंसू छलके नहीं, बाकी कुछ रहा नहीं। वाकई में लगा जैसे मैं कहानी के हर एक दृश्य को देख-समझ रहा हूं। कहानी पढ़कर यह भी पता चला कि आप महान व्यक्तित्व के धनी हैं.......किसी ने सच ही कहा है 'लेखनी में लेखक का व्यक्तित्व छलकता है।
    सर ........अब आप एक अच्छी सी पुस्तक के प्रकाशन की तैयारी करें।
    -------------दिल से बधाई स्वीकार करें--------------

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  13. सुधीर जी आपने बड़े पुराने माहौल को जीवंत कर दिया. कथाकार मेरी समझ से उस कलाकार की भांति होता है जो ब्रश की जगह कलम से चित्रित करता है.
    मार्मिक कहानी लिखने के लिए अनेक बधाई.

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  14. Good Story. Keep it up. Every body need a insipiration no matter what it is. A Gullar flower is good enough.

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  15. nice!...dard vo hi janta h, jise chot lagti h...

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  16. इतिहासकारों, लेखकों, राजनेताओं और अन्‍य जानी मानी हस्तियों ने aapki की प्रशंसा की है और शेष ne aapke दिए गए योगदान की सराहना की है। जबकि ये टिप्‍पणियां aapki की महानता का केवल कुछ हिस्‍सा प्रदर्शित करती हैं, फिर भी इनसे हमें अपनी मातृभूमि(tang gali) पर गर्व का अनुभव होता है Jisne aise saput
    ko janm diya

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  17. sudhir bhai agali kahani(sachchayi) kab aa rahi hai.

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  18. sudhir ji aapne kahani to bahut acchi likhi hai.hmne peli baar aapka blog padha lekin ab regularly follow karungi.

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  19. बधाई। लयबद्ध और उम्‍दा कहानी है। आपके संवेदनशील होने का भी परिचय देती है। भविष्‍य में अच्‍छा लेखक बनने की सम्‍भावना नजर आती है। लिखते रहें....कामयाब हों....शुभकामनाएं। हां... प्रोफाइल में फोटो क्‍लोजअप हो तो ठीक है। सुदर्शन चेहरा साफ नजर आना चाहिए।
    रमेश शर्मा

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  20. story is gud.sudhir,r u planning to b e a story writer.while reading d story i liked chitu's character who loves her mother so much dat he wants nothing else except her mother.is there ne real life connection?

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  21. ek aisi kahani jo pathak ko sath chalne ke liye vivash karti he aur dekhte hi dekhte kathakar pathak ki bhumika ko tabdil kar ke use kahanikar banane jaisa ahsas karvate hain. sab kuch teek chalte-chalte achank kathakar pathak ko ek patli gali se nikal aise virat falak par le jate hain jahan koi dusra nahi le ja sakta, na pathak ke prayas na ahasas.
    ye kaam ek kathakar hi kar sakta he.
    jhakjhorne wali ek prabhavi aur maulik kahani...

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  22. sir namaskar....

    ye kahanii to bahut hi marmik hai jo ek sshhhannn ke liye bhi isse padhne se rukne nahi daiti... iss par mai to itna hi kahna chahuga...


    हार ही जीत का श्रोत.जीत उसी की होती है
    हार जिसे हौसला देती है
    ना थम ना रुक बढ चल
    ऊंचाईयां हौले हौले ही मिलती है.

    ना डर ना घबरा इसे गले लगा
    हार नहीं दुष्मन किसी की
    हार तो प्रेरणा है
    उसी से विजय की राह मिलती.

    हार सदा अहसास कराती
    जीत में खुशी होती है
    ये तो बस पथ प्रदर्शक
    जो चल पड़े जीत उसी की होती है.

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  23. बहुत ही सुंदर और मार्मिक कहानी। उम्मीद है ये यात्रा जारी रहेगी...

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  24. mai yah nahi janta ki yah ek kahanikar ke roop mien yah yatra ki suruaat hai ya yatra apne pure sawab mien hai magar itna jaroor janta hun ki agar yah saphar jari raha to anant kaal tak log apke kahaniyon ko yaad karenge

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  25. kahani ne hamare bachpan ki yaad dila di,jab hum jhund bana kar aam ya amrood todne jaya karte the.vo khushi apni kamai se khareed kar khaye amrood se nahi milti hai jo un churaye huye amrood kha ke milti thi.Aap mahadevi verma jaise man ko choone wali rachna likhte jaye ,yahi hamari bestwishes hai

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  26. शब्दों के पेड़ पर कल्पना का जो गूलर का फूल खिलाया है.......उसकी सचाई में चीटू ही क्या...मैं भी अनवरत पहले अक्षर से आखिरी अक्षर तक बढ़ा चला गया। गूलर के फूल ने क्या बांधकर रखा......गजब सर.......गजब

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  27. jindagi ki shakh ka ye phool...gular k phool se kam nhi.....heart touching

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