Saturday, May 21, 2016

ढाई सौ रुपए में नैनीताल टूर-1989

1989 की बात है। 18 साल की उम्र थी। बचपन की मासूमियत के जवानी के नूर में तब्दील होने वाले दिन थे।
उस साल हम लोगों ने इंटरमीडियट का एक्जाम बस पास ही किया था। खुशी कुछ ज्यादा थी क्योंकि हममें से कुछ को तो पास होने तक की उम्मीद नहीं थी। जुलॉजी का पर्चा बेहद खराब हुआ था। इतना खराब कि साथ के एक लड़के ने जहर तक खा लिया था। अपन भी भयंकर डिप्रेशन में जी रहे थे। खैर नतीजे आए थे तो खराब पर्चे में ठीकठाक नंबर मिले। हमने यूपी बोर्ड में कॉपी जांचने की महान परम्पराओं को सिर माथे रखा और जश्न की तैयारियों में जुट गए। कुल छह दोस्त थे। मैं, अनूप श्रीवास्तव, रवि श्रीवास्तव और लक्ष्मण सिंह रावत तो जुबली कॉलेज के बायो ग्रुप के एक ही सेक्शन वाले थे। बाकी दो मैथ्स साइड वाले निश्चल भटनागर और रंजीत दास। मिलकर प्लान किया कि आठ दिनों के लिए नैनीताल चलेंगे। नैनीताल ही क्यों ? इसकी वजह थे जनाब रंजीत दास जो नए नए दोस्त बने थे। साथ पढ़ते नहीं थे। उनसे मुलाकात के निश्चल भटनागर के घर पर हुई थी।

1989 के उस दौर में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। रंजीत के पापा मरहूम गोपालराम दास जी उस वक्त उत्तर प्रदेश  के पर्यटन राज्य मंत्री थे। तब यूपी में उत्तराखंड भी शामिल था। हमारे आने जाने और ठहरने का इंतजाम वही करने वाले थे। इस इंतजाम से मैं बहुत खुश था। वह इसलिए क्योंकि तब तक मुझे घर से सिर्फ दो रुपए रोज का खर्च मिलता था। दसवीं तक तो सिर्फ एक रुपया और आठवीं तक दस पैसे रोज ही मिलते थे। ट्यूशन्स पढ़ाना शुरू कर चुका था पर वह पैसा भी सौ रुपए महीने से ज्यादा नहीं था। कुल मिलाकर जेब खाली ही रहती थी। पर दोस्तों पर भरोसा था। थोड़ी हिम्मत करके पापा से पैसे मांगे तो डेढ़ सौ रुपए मिले। इतने से काम नहीं चलना था। पड़ोस में नाना रहते थे। कुछ उनकी मिन्नतें कीं। सौ रुपए वहां से मिले। ढाई सौ रुपए इकट्ठे करने से पहले मैं एक बड़ी मुसीबत दूर कर चुका था। वह थी नैनीताल जाने की इजाजत। दरअसल मैं कभी भी घरवालों के बिना लखनऊ से बाहर नहीं गया था। उस वक्त अाज की तरह न मोबाइल फोन्स थे और न ही घर मेंं टेलीफोन लगा था। पापा जाने की इजाजत नहीं दे थे। वह डरते थे कि आठ दिन तक इतनी दूर नैनीताल में मैं दोस्तों के साथ महफूज रह पाऊंगा या नहीं। खैर अनूप और रंजीत ने घर आकर पापा को भरोसा दिलाया कि आप चिंता न करिए। कोई दिक्कत नहीं होगी। यानी अब हमारे पास अपनी जिंदगी के पहले आउट बाउंड पर खर्च करने के लिए पैसे भी थे और इजाजत भी। उस वक्त मुझसे ज्यादा खुश और अमीर शायद ही कोई हो।


जाने की तारीख करीब आई और हम सब नैनीताल एक्सप्रेस से नैनीताल के लिए रवाना हो गए। रंजीत साथ में नहीं थे। उसे किच्छा में उसके मामा के घर से लेना था। लिहाजा रात भर ट्रेन यात्रा करके हम सुबह किच्छा पहुंचे। फ्रेश होकर नाश्ता किया और टैक्सी से नैनीताल रवाना हुए। बादलों से भरी खूबसूरत पहाड़ियों और उनके बीच सुंदर नैनी झील को देखते ही सबकी थकान गायब हो गई। एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरह पहाड़। पूरा रास्ता ऐसा ही था। कभी बादल ऊपर हम नीचे और कभी बादल नीचे तो हम ऊपर। कुछ ही देर में हम नैनीताल पहुंच गए। टैक्सी स्टैंड पर हम सब ने अपने अपने सूटकेस गाड़ी से उतारे। अब हमें यहां से पैदल नैनीताल क्लब जाना था। रंजीत के पापा बागेश्वर के विधायक थे और वहीं उसका घर था। लिहाजा नैनीताल भी उसके लिए घर जैसा ही था। सामान उतारते ही कुलियों ने घेर लिया। हमने कहा नैनीताल क्लब, उन्होंने सामान उठाया और दौड़ते हुए चले गए। मैं तो  घबरा गया। मैने रंजीत की तरफ देखा तो वह हंसने लगा, बोला परेशान न हो, सामान सही जगह पहुंच जाएगा। खैर हम लोगों ने पैदल मार्च शुरू किया। गर्मियों की छुट्टियां थी। लिहाजा काफी भीड़ थी पर यकीन मानिए आज के जैसी नहीं। आप आराम से घूम सकते थे और चल फिर सकते थे। वहां की हरियाली, झील में तैरती नावों की रंगीनियां और खूबसूरती देखते देखते हम कब नैनीताल क्लब पहुंच गए, पता ही नहीं चला। दोपहर हो चली थी। रिशेप्सन की औपचारिकताएं रंजीत ने पूरी कीं। हमारा सामान क्लब के एक बड़े से हॉल में पहुंचाया जा चुका था। वहां कुल दस बेड थे। हर एक पर दो लोग सो सकते थे और हम थे सिर्फ छह। सब ने तय किया कि एक एक बेड पर एक एक व्यक्ति सोएगा। खैर तब तक जोरोंं की भूख लग रही थी। हम सब क्लब के डाइनिंग रूम में पहुंचे थे। मंत्री जी के मेहमान थे लिहाजा बेहतरीन आवभगत हो रही थी।
वैसे भी तब का नैनीताल क्लब आज के मुूकाबले ज्यादा खूबसूरत था। वहां का डाइनिंग हाॅल भी और डाइनिंग रूम भी। हाल ही मेंं पिछले साल जब बच्चों को लेकर मैं दोबारा नैनीताल क्लब गया तो वैसी रौनक नहीं थी। खैर अभी की बातें बाद में। पहले 1989 में वापस चलते हैं। खाना सर्व किया गया। बढ़िया दाल फ्राई, मिक्स वेज और आलू की सब्जी के साथ रोटी और चावल। जोर की भूख लगी थी। खूब जमकर खाया। क्लब के ड्राइंग रूम में कई फैमिली पहले से ही बैठी थीं। एक मोहतरमा हसन जहांगीर का उस वक्त का मशहूर हिन्दी पॉप -हवा हवा ऐ हवा खुशबू लुटा दे- सुन रही थीं। हसन जहांगीर पाकिस्तानी पॉप सिंगर था जो उस वक्त हिन्दुस्तान में बहुत पापुलर था। वैसे उस वक्त सबसे ज्यादा पापुलर आमिर खान थे जिनकी कयामत से कयामत तक हाल ही में रिलीज हुई थी। बहरहाल हम लोग भी अपना वॉकमैन लेकर गए थे। उस वक्त सबसे ज्यादा हिट गाने फिल्म लाल दुपट्टा मल मल का के थे। वही कैसेट हमारे वॉकमैन में लगा हुआ था। अब हम घूमने निकले। हममें से एक के हाथ में कैमरा थे तो दूसरे की कमर की बेल्ट में लटका वॉकमैन। हम इनका इस्तेमाल अदल बदल कर किया करते थे। उस वक्त तक फैशन की जरा भी तमीज नहीं थी। पैंट के साथ स्पोर्ट्स शूज पहना करते थे। लिहाजा हाथ में कैमरा या साथ में वॉकमैन हो तो खुद की नजर में अपनी हैसियत थोड़ी ऊपर हो जाती थी। यही सोचते थे कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे पर्यटक  खासतौर पर हमउम्र लड़कियां भी ऐसा ही सोचती होंगी। बात लड़कियों की छिड़ी तो यहां यह जिक्र जरूरी है कि उस पूरे टूर में हम सबके के लिए सबसे बड़ा आकर्षण लड़कियों को देखना और उनके बारे में बात करना ही होता था। हमारी फोटोग्राफी का फोकस भी हम दोस्तों के चेहरों पर नहीं बल्कि दांये बांये से गुजर रही लड़कियों पर ही रहता। उम्र का असर और परिवार से दूर होने की आजादी। शायद यह सबका मिलाजुला असर था।
मल्ली ताल से तल्ली ताल घूमते घूमते शाम होने को आई। बादल भी घिर आए थे। हम सब वापस नैनीताल क्लब यानी अपने ठिकाने की ओर चल दिए। रूम पर पहुंचकर कुछ देर आराम किया और फिर डाइनिंग रूम में डिनर के लिए पहुंचे। यहां यह बता देना जरूरी है कि उस वक्त तब हममें से कोई भी सिगरेट, बीयर या शराब नहीं पीता था। खाना खाकर एक बार फिर हम लोग टहलते हुए झील तक गए और देर रात वापस कमरे पर पहुंचे। अब आई सोने के बारी। दोपहर में हमने तय किया था कि हम सब अलग अलग एक बेड पर एक सोएंगे। पर तब तक प्लान बदल चुका था। हममें से सबको पता था कि निश्चल भटनागर को रात में डर लगता है। वह जब टॉयलेट गया तो सबने उसे डराने का प्लान बनाया। उसके वापस आते ही हम लोगों ने डरावनी कहानियां सुनानी शुरू कीं। जब डर का माहौल बनने लगा तो हमने तय किया कि अब हम एक बेड पर दो लोग सोएंगे। निश्चल मेरे हिस्से लगा। मैने और डरावनी कहानियां सुनानी शुरू कीं। नैनीताल क्लब के इसी कमरे में हुए एक लड़की की हत्या की झूठी कहानी और उसके आत्मा बन जाने के किस्से। तब तक बाहर जोरदार बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी। डर के माहौल का क्लाईमेक्स कुछ यूं बना कि मैं अचानक उठा और अनूप व रवि के बीच में जाकर लेट गया-यह कहते हुए कि मुझे उधर डर लग रहा है। अब निश्चल अकेला था। वहां सबसे प्रार्थना कर रहा था कि भाई मुझे अपने साथ लिटा लो और हम सब साजिशन उसे डराने के लिए नहीं माने। वह रात इतनी मजेदार बीती कि क्या बताएं। निश्चल रात भर हम लोगों को गालियां देता रहा और कोसता रहा। हम कब सो गए, पता ही नहीं चला। सुबह देर से उठे और सोकर उठते ही हंगामा हो गया। लक्ष्मण और निश्चल की रात के किस्सों को लेकर लड़ाई हो गई। यूं समझिए कि  मारपीट की नौबत आ गई। मैं बीचबचाव करने गया तो निश्चल मुझ पर भी हमलावर हो गया। खैर मुझे भीतर ही भीतर हंसी आ रही थी। किसी तरह सबको शांत कराया और हम नाश्ता करने नीचे पहुंचे।
उस दिन सबके अपने अपने प्लान थे। कोई एक राय बन ही नहीं रही थी।  जिनकी जेबों में ज्यादा पैसे थे, उनके प्लान अलग। जो मुझ जैसे थे, उनके अलग। बहरहाल मैने और निश्चल ने फोकट वाला प्लान बनाया कि चाइना पीक पर चढ़ा जाए। मेरे ख़याल से नीचे से पांच किलोमीटर की चढ़ाई तो होगी ही। बाकी लोग मल्ली ताल की ओर निकल गए। हम दोनों चाइना पीक के रास्ते पर। रास्ते भर खूब गप्पबाजी हुई। आधे रास्ते पहुंचते पहुंचते हम थकान से निढाल होने लगे। खासतौर पर निश्चल की हालत ज्यादा खराब थी। कुछ दूर और चलने पर वह कहने लगा-भाई मैं नहीं चढ़ पाऊंगा। मेरा कुछ दिन पहले ही ऑपरेशन हुआ है। यह सुनकर मेरी हालत खराब। छोड़कर जाने का सवाल नहीं था और पीठ पर लादकर ले न जा पाता। खैर जैसे तैसे हिम्मत भरकर धीरे धीरे निश्चल को भी ऊपर तक चढ़ा ले गया। वहां का नज़ारा वाकई मदहोश कर देने वाला था। ठंडी खुशबूदार हवा। चीड़ देवदार के लम्बे पेड़। एक छोटा सा रेस्ट्रां भी था वहां। टैम्परेचर नीचे के मुकाबले सात आठ डिग्री तो कम होगा ही। न कोई फ्रीज न बिजली। जरूरत भी नहीं थी। कोल्डड्रिंक की बोतले और जूस के पैकेट ऐसे ही ठंडे थे। कंजूस द ग्रेट सुधीर यानी मैने दस रुपए खर्च किए थे। जूस पिया और कुछ खाने को लिया। हम घंटों वहां बैठे रहे। वहां एक दूरबीन लगी थी। हमें दिखाने की कोशिश की गई कि दूर चीन देश यहां से नजर आता है। खैर हमें बादलो में छिपी कुछ चोटियों के सिवा कुछ नहीं दिखा। चाइना पीक मेरे लिए दूसरी दुनिया  जैसी थी। उस वक्त तब मैने इतनी सुंदर जगह नहीं देखी थी। मुकाबले के लिए मुझे देहरादून की सहस्त्रधारा और मसूरी का कैम्पटीफॉल ही याद आता था जहां मै घर वालों के साथ जा चुका था। चाइना पीक उन सबसे से ज्यादा सुंदर जगह थी। मुझे वहां के पेड़ों के तनों पर लिखे लड़के लड़कियों के नामों में दिलचस्पी थी। सोच रहा था कि यह नाम लड़कों ने अकेले ही आकर लिखे होंगे या उनकी साथी भी साथ आई होगी। और अगर आई होगी तो इस खूबसूरत जगह पर उससे ज्यादा खूबसूरत लम्हा ओर क्या होगा। मैने भी लोहे की एक कील उठाई और एक नाम खुरचने की कोशिश की। फिर अचानक मैं रुक गया। मैने अपने भीतर चल रहे एकतरफा प्रेम के युद्ध को युद्धविराम दिया। यह सोचकर कि जब दूसरी तरफ से भी ग्रीन सिग्नल होगा तो साथ में आकर दोनो नाम लिखूंगा।
दोपहर बीत रही थी। वापस चलना शुरू किया। चूंकि ढलान थी इसलिए अब उतनी थकान नहीं थी। हां थोड़ा संभल संभल कर चलना पड़ा क्योंकि बारिश में रास्ता गीला हो चुका था। शाम होते होते हम तल्ली ताल पहुंच चुके थे। तब मोबाइल नहीं होते थे। दोस्तों को सिर्फ मानसिक तरंगों से जुड़ना पड़ता था और हम जुड़े हुए थे। हमारे दोस्त हमें वहां घूमते हुए मिल गए। सैकड़ों दूसरे पर्यटकों के बीच। हम सब वहां से नैना देवी मंदिर गए। दर्शन किए। अगले दिन के लिए तय हुआ कि सब लोग बोटिंग करेंगे। अगले दिन हम लोगों ने बोटिंग की। एक बोट पर तीन तीन। खूब फोटोग्राफी हुई। अनूप और रंजीत बीच बीच मे अक्सर गायब हो जाते थे। कहां जाते थे नहीं मालूम पर हमें शक था कि यह लोग कुछ खर्च करना चाहते हैं। साथ में रहेंगे तो ज्यादा खर्च होगा इसलिए कट लेते हैं। तो छह सात दिन इसी तरह बीते। खूब घूमे। क्लब में रहने आए काफी लोगों से दोस्ती हुई। बीच बीच में आपस में झगड़े भी किए। हां और एक खास बात। इस दौरान हमारा मन किया कि कुछ घर वालों के लिए ले जाया जाए। मल्लीताल की बाजार में मैने आसपड़ोस व घर वालों के लिए माले पसंद किया। दुकानदार ने दाम कुछ ज्यादा बताए तो मैने  नहीं लिया। क्लब वापस आया तो हमारे ग्रुप में शामिल एक दोस्त ने कहा-तुमने माला क्यों नहीं लिया। मैने कहा-महंगा था। उसने फिर पूछा-कितने चाहिए। मैने कहा चार। उसने करीब बीस माले निकाले और दस मुझे दे दिए और बोला रख ले क्या याद करेगा। मैने कहा अबे इतने सारे, तूने कब लिए। जवाब मिला-जब मै मोलभाव कर रहा था। मुझे याद आ गया उसका हुनर। दरअसल हमारे दो दोस्तों को तकरीबन यह बीमारी सी थी कि वह कहीं भी खड़े हो जाएं तो चोरी कर लेते थे। हमारे क्लास में भी ज्यादातर लोगों के कलम चोरी हो जाते थे। बहरहाल अच्छे दिन बीते। फिर वापसी की तैयारी शुरू हुई। लौटते वक्त रुड़की से निकलने वाली एक तेज रफ्तार नहर व एक झरने पर भी वक्त बिताया। यह बातें 27 साल पुरानी हैं। काफी कुछ भूल चुका हूं पर फिर जाने कितना कुछ ऐसा है जो यादों के झरोखों से अक्सर झांकता है। उस तांकझांक की इस झांकी को कोशिश करके कैद कर लिया। ताकि आगे भूल भी जाऊं तो पढ़कर याद कर सकूं। उस वक्त ढाई सौ रुपए में मैने आठ दिन नैनीताल के गुजारे थे। बेहद खूबसूरत दिन। थैक्स टू रंजीत। हम सब दोस्त अब अलग अलग हैं। अनूप लखनऊ में ही डिप्टी सीएमओ है। निश्चल चंडीगढ़ के एक अखबार में पत्रकार। रंजीत के बारे में किसी ने बताया कि वह उत्तराखंड के सीएम का निजी सचिव है और बाकी लोगों से काफी समय से मुलाकात नहीं हुई।

Tuesday, May 17, 2016

भार्गव आंटी-आप बहुत याद आती हैं...

फोन, फेसबुक और व्हाट्सअप। सुबह से फोन चार्जर पर ही लगा हुआ था। सालगिरह मुबारक हो या हैपी बर्थ डे। यह सुनना आखिर किसे खराब लगेगा। पर जब कॉल पर कॉल चढ़ी रहे और व्हाट्सअप फेसबुक की घंटियां लगातार बजती रहें तो सोचना पड़ता है? आखिर कैसे इतने सारे लोगों का शुक्रिया अदा करूं?
 सोचा कुछ नया करता हूं। उन लोगों को याद करता हूं जो मुझे ऐसी ही बधाइयां उस वक्त देते थे,सेलिब्रेट करते थे जब मैं वह नहीं था जो आज हूं। उनमें पहला नाम याद आता है मुझे अपनी आंटी मृदुला भार्गव जी का। वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। मृदुला आंटी से मेरी मुलाकात 1993-94 के दौरान हुई। मैने पत्रकारिता में डिप्लोमा कोर्स के लिए लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ काम्युनिकेशन हजरतगंज में दाखिला लिया था। आंटी ने भी यही कोर्स ज्वाइन किया था। वैसे वह महिला कॉलेज में इंटरमीडियट क्लासेज में इंग्लिश पढ़ाती थीं। कोर्स के दौरान ही उनसे बातचीत होने लगी। कोर्स खत्म होते होते उनसे अच्छी पहचान हो गई। फिर मैने शाम के अखबार में नौकरी करनी शुरू कर दी। इस बीच नरही की भार्गव लेन स्थित उनके घर भी आना जाना होने लगा।
मेरे और मृदुला आंटी के बीच एक बेहतरीन केमेस्ट्री थी। शायद इसलिए कि वह जानती थीं कि मेरी मां नहीं हैं। और शायद इसलिए भी कि मैं जानता था कि वह अपने बेटे रजत को बहुत मिस करती हैं। रजत आंध्र प्रदेश कैडर के आईएएस हैं। जाहिर है काफी व्यस्त रहते थे। उनकी पत्नी भी आईआरएस थीं। लिहाजा उन दोनों के पास वक्त कम था। आंटी लखनऊ में ही जॉब करती रहीं, उन्हें यह शहर बहुत पसंद था। ऐसे में हमारी खूब बातचीत होती। मैं तब तक कुछ निजी कारणों से घर छोड़ चुका था। हॉस्टल में रहता था। लिहाजा अक्सर शाम का खाना आंटी के साथ होता। वह बड़े प्यार से तरह तरह की चीजें बनाकर खिलाती थीं। 
उनके पति यानी भार्गव अंकल इरीगेशन में चीफ इंजीनियर से रिटायर हुए थे। हर दर्जे के ईमानदार। लोग उन्हें झक्की समझते थे। एक एक्सीडेंट के बाद उनके दिमाग पर थोड़ा असर भी हुआ था। लिहाजा उनके काम को अक्सर सनक समझा जाता। वह रोजाना सुबह पांच बजे तड़के बोटेनिकल गार्डेन जाते थे। नियम के इतने पक्के थे कि चाहें जितनी मूसलाधार बारिश हो, वह छतरी लेकर घूमने जाते। तमाम सरकारी विभागों के खिलाफ उनके पास अलग अलग फाइलें थीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग छिड़ी रहती। उससे वह बेचारे अकेले ही लड़ रहे थे। एक बार वह लखनऊ संसदीय सीट पर अटल बिहारी वाजपेयी जी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव भी लड़ गए। उनका चुनाव चिह्न पतंग था और वह पीठ पर पतंग बांधकर गली गली वोट मांगने के लिए अकेले  घूमते। आंटी को अंकल का यह रवैया पसंद नहीं था। वह उन्हें समझा समझाकर हार चुकी थीं। मैं जब कभी भी शाम को आंटी के पास पहुंचता तो अंकल मुझे पहले घेर लेते। उनके पास मोटी मोटी फाइलें होती थीं। वह मुझे समझाने में लग जाते। खबर बनवाने के लिए। मैं निरीह सा आंटी की तरफ देखता। आंटी समझ जातीं। वह तकरीबन लड़-भिड़कर जबरदस्ती अंकल को ऊपर वाले कमरे में भेज देतीं। फिर शुरू होती मेरी आवभगत। मैं जब भी जाता तो सबसे पहले मुझे वह चिलगोजे और पिस्ते खाने को देतीं। उसके बाद चाय नाश्ता और फिर रात का खाना। उनसे खूब बातें होतीं। मैं अपनी एक एक बात उनको बताता। बचपन से लेकर तब तक की। घर के बारे में, दोस्तों के बारे में, यूनीवर्सिटी के बारे में और जर्नलिज्म के बारे में। इस बीच रजत भैया भी कभी कभार आते। उनसे भी अच्छी दोस्ती हो गई थी।
यह बात शायद 1996 की है। मई का महीना था। बात बात में मेरे मुंह से बर्थ डे का किस्सा निकला। दरअसल तब मुझे अपना बर्थ डे मनाना बहुत पसंद था। जब तक घर पर रहा, उस दिन खूब धूम होती। अक्सर कानपुर से रिश्तेदार आते थे। दोस्तों का जमावड़ा लगता। जर्नलिज्म में आने से पहले ही घर छूट चुका था। जेब में इतने पैसे कभी होते ही नहीं थे कि चार लोगों को भी ठीकठाक पार्टी दे सकूं। तब तक मैने लखनऊ यूनीवर्सिटी में एमए राजनीति शास्त्र में एडमिशन ले लिया था। ठीकठाक मित्रमंडली थी और पार्टी देने के पैसे नहीं। आंटी को पता चला तो उन्होंने खूब डांटा और कहा-मेरे रहते तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। तैयारियां शुरू कर दीं। पहले तो नए कपड़े दिलवाए। फिर केक ऑर्डर हुआ। उसके बाद दोस्तों की लिस्ट मांगी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस पार्टी में यूनीवर्सिटी से शिल्पी, अपर्णा, आराधना, पुराने दोस्तों में रंजना, प्रवीन और परिवार के कुछ लोग शामिल थे। उन्होंने तैयारियां शुरू कीं। वह लायंस क्लब की मेम्बर थीं। उनकी क्लब की दोस्तों ने तय किया कि वह लोग अपने अपने घर से कुछ कुछ बनवाकर भेजेंगी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि छोले और पनीर की सब्जी लामार्टिनियर वाली अग्निहोत्री आंटी के यहां से आए थे। उनका बेटा मीतू अमिताभ भी आया था। तो खैर बेहतरीन पार्टी हुई। खूब गाने गाए गए जमकर मस्ती हुई। एक बेहतरीन दिन था। आज अचानक जब काफी लोगों की बधाइयां आने लगीं तो मुझे आंटी याद आ गईं। सोचा उनसे जुड़ी यादों को ब्लॉग पर दर्जकर आप से शेयर किया जाए। शेयर करने के पीछे एक मंशा यह भी थी कि मैं उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता दर्ज कर सकूं जो परिवार से न होते हुए भी परिवार से बढ़कर कर रहे। शायद मेरी मां होतीं तो बिलकुल भार्गव आंटी जैसी ही होतीं। उनमें उतनी ही ममता थी, जितनी मेरी स्वर्गीय मां। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब कैंसर की आखिरी स्टेज में आंटी अस्पताल में तकलीफ से जूझ रही थीं तो मैने उनसे पूछा था-आंटी आप को क्या महसूस हो रहा है। उन्होंने जवाब दिया था-मुझे लगता है कि मुझे सफेद कपड़े पहने हुए देवदूत ऊपर खींच रहे हैं। वहां बहुत सुहाना मौसम है, जितना ऊपर जाती हूं मेरी तकलीफ कम होती जाती है। लेकिन नीचे से तुम, रजत और अपनी बेटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि-तुम लोग मुझे नीचे खींच रहे हो, यहां बहुत तकलीफ है, दर्द है। कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गईं। वह चली गई पर मुझे हमेशा याद रहती हैं। हमेशा यह अहसास रहता है कि आखिरी पलों में उनकी नजर में मेरा दर्जा वही था, जो उनके अपने बेटे और बेटी का था।

ज्ञान बाबा की पार्टी
बर्थ डे का जिक्र चल ही रहा है तो ज्ञान बाबा की पार्टी मैं कैसे भूल सकता हूं। मेरी पहली नौकरी थी संसार लोक अखबार में। पांच सौ रुपए महीने मिलते थे और फिर वही मुसीबत यानी बर्थ डे आ गया। दोस्तों की फरमाइश पार्टी की और जेब में पैसे नहीं। ज्ञान बाबा यानी ज्ञान सक्सेना नए नए मित्र बने थे। वह सीनियर थे और आज अखबार के रिपोर्टर थे। उन्होंने कहा, चिंता मत करो, बर्थ डे मनेगी। कोहिनूर होटल में सारे मित्र बुलाए गए। कई पत्रकार और अफसर भी आए। दोस्त और घर के लोग तो खैर थे ही। शानदार पार्टी हुूई। अब सवाल यह खड़ा हुआ कि पेमेन्ट कैसे और कितना किया जाए। कुछ पै
से ज्ञान बाबा ने डाले, कुछ हमने और बाकी लिफाफे फाड़कर निकाले गए। मैनेजर बाबा का दोस्त था। सो नो प्रॉफिट नो लॉस पर भुगतान कर दिया गया। सबने खूब वाह वाह की पर मुझे उसी पार्टी में मशहूर कार्टूनिस्ट मंजुल का बनाया एक ग्रीटिंग कार्ड संजीव भाई ने दिया। उसमें स्प्रिंग पर बैठा एक चूहा जोर से जम्प ले रहा था। किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं  पर मैने व्यंग्य को समझ लिया। मंजुल का इशारा किस ओर था। मुझे चूहों वाली छलांग नहीं लगानी थी लिहाजा उस तरह की पार्टी मैंने फिर कभी नहीं की। अपनी हैसियत को समझा और उसी के हिसाब से जीने का फैसला किया।