Saturday, January 30, 2016

यह तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ


एक-दो दिन पहले की ही बात है। बिहार में एक साहब बड़े नाराज थे। शिकायत थी कि मुख्यमंत्री ने शराब क्यों बंद कर दी? नीतीश कुमार दिख गए एक सभा करते हुए तो भाई ने जूता ही उठाकर दे मारा। पुलिस ने गिरफ्तार किया और नाम पूछा तो उन्होंने बताया पीके राय। घर वालों को शायद पूत के पांव पालने में ही नजर आ गए होंगे तो नाम भी सोच-समझ कर रखा। पी के उन्होंने जूता चलाया और शराबबंदी पर अपनी राय दे दी। यह खबर पढ़ते ही अजीज नाज़ा की मशहूर कव्वाली झूम बराबर झूम शराबी की याद आ गई। उनकी कव्वाली के बीच में दो लाइनें आती हैं-
इसकी बेटी ने चढ़ा रखी है सर पर दुनिया
यह तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ
अपन भी सोचने लगे कि वाकई अगर अंगूर को बेटा हो गया होता तो क्या होता। वैसे इधर लखनऊ या उत्तर प्रदेश में नेता लोग बिहार जैसी हिमाकत नहीं करते। अंगूर की बेटी से मोहब्बत करते हैं। यहां चुनाव से पहले शराबबंदी के नहीं बल्कि शाम की दवाई सस्ती कर देने के वादे होते हैं। जैसे नेता हैं, वैसे ही यहां के लोग भी हैं। बेहद संस्कारी हैं, घर 'बार' का पूरा ख़याल रखते हैं इसलिए ज्यादातर लोग अपने घर से दूर दूसरे के घरों के करीब या तो सड़क को 'बार' बना लेते हैं या फिर कार-ओ-बार चलाते हैं। कार-ओ-बार मतलब कार को चलते-फिरते बार में तब्दील कर देना। इस हद तक सफाई पसंद हैं कि बाहर की पी हुई को विसर्जित करने के लिए अपने घरों के टॉयलेट तक इस्तेमाल नहीं करते। उसके लिए कॉलोनियां या मोहल्ले हैं न। कॉलोनियों, मोहल्लों और स्कूल-मंदिरों के करीब खुले यह 'बार' लोगों को तरह तरह के रोजगार दे रहे हैं। मसलन पुलिस वाले जो कभी भी वेतन बढ़ोतरी की मांग नहीं करते। कभी कोई आंदोलन नहीं करते। इसका श्रेय सड़क पर चल रहे इन मयकदों को ही जाता है। कारों में या गलियों में नॉनवेज की प्लेट, खाली ग्लास, दालमोठ और पानी पहुंचाने वाले बेरोजगारों को तो रोजगार मिलता ही है, कबाड़ियों का कारोबार करने वाले भी शासन सत्ता को धन्यवाद देते हैं। सड़कों पर इस दारूराज की वजह से उनका धंधा काफी अच्छा चल रहा है। इनकी तरक्की का अंदाज आप इससे भी लगा सकते हैं कि मयखानों के बाहर अंडे का ठेला लगाने वाले आज देश के बड़े कारोबारियों में शुमार किए जाने लगे हैं।
और तो और। हिन्दी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले भी इन्हीं अड्डों के इर्द-गिर्द मंडराते हैं। यकीनन लखनऊ में फिल्म इंडस्ट्री का सपना आखिर ऐसे ही तो पूरा होगा। अभी कुछ दिन पहले की बात है। एक राइटर ने बताया कि उन्होंने तो लखनऊ के पत्रकारपुरम चौराहे के पास एक घर में एक कमरा सिर्फ इसीलिए किराए पर लिया है। बगल वाले घर में अंग्रेजी शराबखाना खुला है। कमरे से सटी खिड़की के बाहर रोजाना रात नौ से 12 बजे के बीच बेहतरीन संवाद अदायगी होती है। इन संवादों में माता-बहनों के सम्मान से लेकर घरों के बदलते संस्कारों का जो नज़ारा मिलता है, वह कहीं और मिल ही नहीं सकता। शराबखाने अपने इलाकों की रौनक को देर रात तक दिन जैसा बनाए रखते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए यह मयखाने इस बात का प्रमाण होते हैं कि भारत वास्तव में एक आजाद देश है। आखिर यहां से ज्यादा आजादी और कहां। आप कहीं भी, कभी भी खड़े होकर या बीच सड़क पर कार-ओ-बार से छककर पीजिए और घरों की दीवारों पर हल्के होइए। आखिर कौन रोकता है और किसको गरज पड़ी? यह अलग बात है कि राजधानी लखनऊ समेत यूपी के ज्यादातर शहरों में कानून-व्यवस्था को यही आजादी सबसे ज्यादा बिगाड़ती है। क्राइम की ज्यादातर वारदात सड़क पर खुले हुए इन मयखानों की वजह से ही होती हैं। सड़क पर चलने वाले मयखानों की वजह से कॉलोनियों और मोहल्लों में शरीफ लोगों का रात आठ बजे के बाद घरों से बाहर निकलना मुश्किल है। खैर पुलिस और प्रशासन के लिए यह छोटी-मोटी बात है। वह तो यह भी कह सकते हैं कि शुक्र करिए अंगूर को बेटा न हुआ। बाकी आम शहरियों को तकलीफ होती है तो उनकी तरफ से वसीम बरेलवी साहब का यह शेर और बात खत्म-
पी रहा हूँ कि पीना इन्हें अज़ाब नहीं,
ये मेरे अश्क हैं साकी! तेरी शराब नहीं

Sunday, January 24, 2016

क्या वाकई, केवल बालिगों के लिए

एक शेर कहीं पढ़ा था। शायर कौन हैं, पता नहीं पर है मजेदार। खासतौर पर जब कोई काम सलीके या तमीज़ से न हो तो ऐसे हालात के लिए एकदम मौजू-
मयख़ाना-ए-हस्ती का जब दौर ख़राब आया
कुल्लड़ में शराब आई पत्ते पे कबाब आया...
अमां आजकल की फिल्में देखिए। पत्ते पर कबाब जैसी ही बात है। फिल्में देखना पसंद है तो जाहिर है ट्रेलर भी देखे ही जाते होंगे। ऐसी ही कुछ हालिया फिल्मों के ट्रेलर पर नजर पड़ी तो दंग रह गया। एडल्ट कॉमेडी कहा जा रहा है इन फिल्मों को। सेंसर बोर्ड से पास भी हो गई हैं। यकीनन बोर्ड को लगा होगा कि इन फिल्मों को सिर्फ बालिग ही देखेंगे। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष वही पहलाज निहलानी जी हैं, जिन्होंने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री के छवि चमकाने के लिए एक डॉक्युमेन्ट्री बनाई थी। इसमें दुबई में बनी सड़कों को इंडिया का दिखाया गया था। उस वक्त भी शायद उन्हें नहीं पता होगा कि इंटरनेट पर हर तस्वीर व वीडियो सर्च किया जा सकता है।
गजब विरोधाभास है। एक तरफ संस्कृति, मर्यादा और शालीनता हैं। फिल्म सेंसर बोर्ड है जो जेम्स बॉन्ड की फिल्म में चुंबन दिखाने पर आपत्ति करता है तो दूसरी तरफ यही बोर्ड ऐसे दृश्य व संवाद पास कर देते है, जिन्हें शायद दादा कोंडके भी देख लेते तो सोचते कि उन्हें आज के दौर में फिल्में बनाने का मौका क्यों नहीं मिला? दादा कोंडके के बारे में शायद काफी लोग जानते होंगे फिर भी बताना फर्ज बनता है। पिछली सदी के आखिरी दशकों में कोंडके मराठी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे कामयाब फिल्मकारों में से एक थे। एक के बाद एक उनकी सात फिल्में लगातार सुपरहिट रही थीं जो कि उस वक्त एक रेकॉर्ड था। फिल्म कला, शिल्प, नृत्य या संगीत की दृष्टि से खूबसूरत हों, ऐसा नहीं था। असल में उनकी ज्यादातर फिल्में आम लोगों की उन भावनाओं को गुदगुदाती थीं, जिनके बारे में लोग छिपकर बात करते थे। उनकी फिल्में अश्लील थीं या दर्शकों की सोच, यह बहस का विषय हो सकता है पर यह एक हकीकत है कि द्विअर्थी संवादों, हाव भाव व नृत्य के जरिए उनकी फिल्में काफी मर्दानी भीड़ जुटाती थीं।
हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने घुसपैठ की कोशिश की। तेरे मेरे बीच में और अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में जैसी फिल्में बनाई। पर उत्तर भारत के ज्यादातर हिन्दी दर्शकों ने उन्हें पसंद नहीं किया। भोजपुरी फिल्मों भी ऐसे प्रयोग किए जाते रहे पर इनमें भी अश्लील फिल्मों की जगह उन्हीं फिल्मों को पसंद किया गया जो सामाजिक जीवन पर आधारित थीं। अलबत्ता एडल्ट कॉमेडी के तौर पर यहां शौकीन और छोटी सी बात सरीखी फिल्में जरूर पसंद की गई, जो गुदगुदाती तो थीं पर बिना फूहड़ता के। हिन्दी फिल्मों में डीके बोस सरीखे फूहड़ गानों व फिल्मों का दौर हाल के कुछ वर्षों में आया। वैसे केवल बालिगों के लिए या ओनली फॉर एडल्ट्स के बोर्ड काफी जमाने से सिनेमाघरों के बाहर लगते रहे हैं। लेकिन वह दौर और था। 1953 से 1967 के बीच हॉलीवुड में रोमांटिक कॉमेडी के एक लम्बा दौर चला। इसमें मर्लिन मुनरो जैसी महान अभिनेत्रियों ने काम किया। बाद में कैरी ऑन सीरीज की कई कॉमेडी फिल्में आईं। इससे पहले यूरोप में सत्रहवीं शताब्दी और उससे भी काफी पहले 411 इसवीं के ग्रीक थियेटर में भी वयस्कों के लिए एडल्ट थियेटर था। एडल्ट थियेटर यहां भी किए जाते रहे हैं पर वह वाकई में बालिगों के लिए होता है। हॉलीवुड की एडल्ट फिल्मों भी क्रेज रहा है। पर वह दौर और था। तब मोबाइल फोन नहीं थे, इंटरनेट नहीं था और यूट्यूब नहीं था। अच्छी तरह से याद है कि लखनऊ में मेफेयर सिनेमाघर के बाहर खड़ा गेटकीपर भी स्कूल यूनीफॉर्म  में आए किशोरों को घूर देता था तो वह एडल्ट फिल्म देखने का हौसला छोड़ देते थे पर क्या आज ऐसा है? आज टीन एज के हर बच्चे की जेब में मोबाइल है और उसकी पहली नजर ऐसे ही सॉफ्ट पॉर्न पर पड़ती है, जैसी की सेंसर बोर्ड ओनली फॉर एडल्ट कहकर पास कर रहा है। क्या सेंसर बोर्ड का इन एडल्ट फिल्मों के ऑफीशियल ट्रेलर्स पर कोई नियंत्रण है ? अगर नहीं है तो फिर अब ऐसी फिल्मों को ए सार्टिफिकेट देने की जरूरत भी क्या है?

Saturday, January 16, 2016

लड़ोगे तो जीतोगे


न वो ज़हीर और न मैं मुन्ना भाई। पर सिचुएशन बिल्कुल वैसी ही। फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस के एक सीन जैसी। जिमी शेरगिल संजय दत्त से कहते हैं, 'भाई मुझे बचा लो, तुम्ही मुझे बचा सकते हो।' ...और मेरे सामने मेरे सबसे जूनियर साथियों में से एक था जो कह रहा था, 'सर मैंने कभी शराब नहीं पी, कभी सिगरेट नहीं पी तो फिर मुझे कैंसर क्यों? वह भी थर्ड स्टेज।' एकदम से झटका देने वाली बात थी। उसकी आंखों में आंसू थे और मेरी आंखें उसके सामने रहने तक उन्हें जज्ब किए हुए थीं। वह कह रहा था, 'मेरे जैसे सिर्फ पांच पर्सेंट मामलों में ही मरीज बचता है, मुझे टाटा कैंसर इंस्टिट्यूट मुंबई जाने को कहा गया है।' मेरे मन में यह सवाल था कि इस पांच पर्सेंट पॉजिटिविटी से 95 प्रतिशत डर और निराशा को कैसे जीता जाए?  मुझे अचानक याद आई एक मराठी मित्र शेखर देशमुख और उसके जज्बे की। उसे फोर्थ स्टेज का कैंसर था, वह बीमारियों से खूब लड़ा और आज उनसे जीत कर आराम की जिंदगी जी रहा है। उसकी हिम्मत को मैं हमेशा जोश मलीहाबादी के इस शेर के जज्बे जैसा ही समझता हूं-
वहाँ से है मिरी हिम्मत की इब्तिदा वल्लाह
जो इंतिहा है तिरे सब्र आज़माने की...
नौजवान साथी और उसकी तकलीफ को कुछ समय के लिए ब्रेक देते हैं। बात करते हैं शेखर देशमुख की। आज से करीब छह साल पहले सुबह दस बजे के करीब शेखर का मोबाइल पर मेसेज आया।
...आफ्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट प्रोसेज ऑफ न्यू सेल्स फार्मेशन कॉजेज फ्लक्चुएशन इन बीपी, वेट गेन-लॉस, टेरिबल वीकनेस, स्टमक डिसऑर्डर... कुड नॉट वॉक और सिट फॉर लास्ट 10 डेज, इट्स लाइक गोइंग टु बैक इनफैन्ट्स स्टेज़ बट फ्यू डेज़ बैक आई डिसाइडेड टु टुक फर्स्ट बेबी स्टेप विदआउट सपोर्ट... इट फील्स लाइक बिगनिंग ऑफ ए न्यू लाइफ...शेखर
लब्बोलुबाब यह कि उसकी हालत ठीक नहीं थी। कैंसर के इलाज के लिए किए गए स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद उसका शरीर एक शिशु की तरह हो गया था, जिसे हर हरकत के लिए सहारे की जरूरत थी। संदेश पढ़ते ही मैं समझ गया कि उसकी हालत ठीक नहीं है। मैंने फोन पर ही मेसेज करके ढांढस बंधाया और मदद के लिए पूछा। उसने साफ कहा कि मदद के लिए उसके संपादक हैं। वह कैंसर से लड़ेगा और जीतेगा। उसकी बात में दम था। इलाज के दौरान काफी दिक्कतें आईं। कभी पैसों की कमी, कभी असहनीय कमजोरी तो कभी पेट खराब। कभी ब्लड प्रेशर में उतार चढ़ाव तो कभी वजन में कमी पर वह लड़ा और लड़ता रहा। इस लड़ाई को जीतकर शेखर आज गर्व के साथ फिर से एक मराठी अखबार में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहा है। 
फिर से वापस आते हैं, अपने उस साथी पर जिसे हाल ही में थर्ड स्टेज कैंसर का पता चला। यकीनी तौर पर मैं अगर अपने उस साथी से यह कहता कि वह कैंसर से जीत सकता है तो शायद उसे लगता कि मैं नकली ढांढस बंधा रहा हूं। कुछ हद तक यह बात सही भी है। पर अगर उस पीड़ा से गुजरकर और जीतकर आने वाला शेखर जैसा शख्स यह कहे कि नहीं तुम्हारी पांच प्रतिशत संभावना तो काफी ज्यादा है। तुम तो सिर्फ 26 साल के हो, तुम्हारी रोगों से लड़ने की क्षमता तो काफी ज्यादा है। तुम तो आराम से कैंसर को हरा सकते हो क्योंकि मैं तो पैंतीस पार करने के बाद कैंसर से लड़ा हूं, तो इस बात के मायने होते हैं। इनमें दम होता है क्योंकि यह बात कैंसर से लड़ने और जीतने वाले शख्स ने कही है। शेखर ने दो रात पहले मेरी भी काउंसिलिंग की और मेरे कैंसर पीड़ित साथी की भी। यकीन मानिए शेखर की बातों ने मेरे उस साथी पर जादू सा असर डाला है। मेरा नौजवान साथी अब कैंसर से लड़ने को तैयार है और हम उसके जीतकर वापस आने पर फिर से उससे रिपोर्टिंग करवाने के लिए। सिर्फ हम ही क्यों, आप के बीच भी जो लोग ऐसी परेशानियों से लड़ रहे हैं, वे यकीन मानें कि अगर हिम्मत और जज्बे के साथ लड़ेंगे तो यकीनन जीतेंगे। बस खुद से मत हारिए। कुंवर नायारण की कविता की लाइन से बात खत्म-
कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नही। वही हारा जो लड़ा नहीं।

Saturday, January 9, 2016

अदृश्य पूंछ वाले लोग


कहते हैं जब वक्त खराब हो तो ऊंट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट लेता है। इस बात में कुछ न कुछ सच्चाई तो जरूर होगी। कभी न कभी, कहीं न कहीं ऊंट पर बैठे किसी आदमी को कुत्ते ने काटा ही होगा। कहावतें ऐसी ही थोड़े बन जाती हैं। यह जरूर है कि कभी-कभी लोकोक्तियां एकदम 180 डिग्री घूमकर दूसरे सिरे पर भी नजर आती हैं। इसकी मिसाल हाल ही में देखने को मिली, जब एक आईएएस अफसर के घर डकैती पड़ी। जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर जैसे कुत्ते एयरकंडीशंड कमरों में बंधे रह गए। चोरों की तकदीर देखिए देसी चाकू लगाकर इंग्लिश रिवाल्वर तक लूट ले गए। अफसर महोदय के साथ हुए इस हादसे से मुझे अचानक राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय की एक कविता याद आ गई-
वे सब कुत्ते दोगले हैं
जो गर्दनें
मोटे पट्टों और कीमती जंजीरों को सौं कर उन्हें प्यारे हैं
असलियत उनमें है
जो अपनी टांगों के बूते
अपनी दिशा खोजते हैं
और पालिका की दृष्टि में
लावारिस हैं, आवारे हैं
यकीनन पाण्डेयजी ने कुत्तों की नस्ल पर कविता लिखने से पहले जरूर अध्ययन किया होगा। आज के परिवेश में कुत्तों की मूलत: दो नस्लें हैं। पहले घरों में रहने वाले डॉगीज और दूसरे सड़क पर रहने वाले कुत्ते। अपनी हमदर्दी डॉगीज और कुत्तों दोनों के ही साथ है पर सड़क वाले कुत्तों के साथ थोड़ी ज्यादा। दरअसल, इस कुत्ता प्रेम के पीछे एक प्राचीन कथा है। सच है या झूठ, पता नहीं पर कथा है। पुराने वक्त में आदमी और जानवर सब जंगलों में ही रहते थे। धीरे-धीरे दोनों ही प्रजातियां समझदार होने लगीं। ज्यादातर जानवरों को लगता था कि उनके लिए जंगल ही ठीक हैं। और ज्यादातर इंसानों को लगा कि उन्हें खेती-बाड़ी करके गांव बसाने चाहिए। जंगल में बंटवारे का वक्त आया तो जिन्हें आज जंगली कहा जाता है, ऐसे सभी जानवर एकतरफ हो गए। दुधारू जानवरों को इंसानों ने खुद ही अपने साथ ले लिया। बच गए कुत्ते। कुत्तों ने खुद तय किया कि वे इंसानों के साथ रहेंगे। कुत्ते आ तो गए गांव और शहरों में, पर उनमें से कुछ को ही घरों में जगह मिली। बाकी सब सड़क के हवाले हो गए और इंसानों के बचे-खुचे खाने पर उनकी जिंदगी चलने लगी। बदले में अजनबियों पर रात भर भौंककर वे चौकीदारी करते हैं।
बरसों से यह सिलसिला चला आ रहा था, लेकिन घरों में रह रहे इंसान और कुत्तों, दोनों की ही आदतें बदलने लगी हैं। कुत्ते अब भी रात में बदस्तूर भौंकते हैं पर डॉगीज को इंसानों की तरह लिहाफ चाहिए। वॉर्मर और एयरकंडीशनर चाहिए। साहबों को मेमसाहब का साथ मिले न मिले पर डॉगीज उनके साथ कारों में घूमते हैं। आरामतलब जीवनशैली ने अब उन्हें शुगर, ब्लड प्रेशर और मोटापे जैसी बीमारियां तक होने लगी हैं। आप बड़े-बड़े बंगलों और फ्लैट्स में जाकर देखिए। ऐसे-ऐसे आलसी कुत्ते मिलेंगे, जिन्हें उठाने के लिए मालिक उन्हें धकियाते हैं। पक्के फर्श पर चल चलकर उनकी टांगे टेढ़ी हो चुकी हैं और वे तेज दौड़ नहीं सकते। मोटे पट्टों और खूबसूरत जंजीरों में ये डॉगीज़ महज शोपीस हो गए हैं, जो चोर के घुसने पर भी अपनी नींद में खलल डालना पसंद नहीं करते। डॉगीज दुम भी हिलाते हैं तो लगता है अहसान कर रहे हैं। दूसरी तरफ कुत्तों को देखिए। थोड़ी सी बची हुई रोटियों के एवज में सीलिंग फैन जैसी पूंछ हिलाते हैं। वैसे इनसे भी ज्यादा तेज पूंछ हिलाने वाली एक और नस्ल है। अदृश्य पूंछ वाले इंसानों की। समाज के हर क्षेत्र में आपको इनकी खासी तादाद नजर आएगी। मनुष्य के पूवर्ज चौपाया थे, पूंछ भी होती थी। धीरे-धीरे क्रमिक विकास में वह दो पांव पर आया। फिर पूंछ भी गायब हो गई पर पूंछ हिलाने की आदत कुछ लोगों में कायम रहती है। अदृश्य पूंछ वाले लोग ऐसे ही साधक हैं। इस साधना पर काफी कुछ पहले भी लिखा जा चुका है। मैं तो डॉगीज और कुत्तों की बात कर रहा था। बातों के इस सिलसिले को अब हरिवंश राय बच्चन की इन पंक्तियों के साथ विराम-
रात-रात भर श्वान भूकते। पार नदी के जब ध्वनि जाती,
लौट उधर से प्रतिध्वनि आती समझ खड़े समबल प्रतिद्वंद्वी 
दे-दे अपने प्राण भूकते। रात-रात भर श्वान भूकते।
जी श्वान से यहां मतलब कुत्तों से है, डॉगीज तो खैर-

तब जब तुम्हारे

तब जब तुम्हारे इन गालों पर गहरी झुर्रियां होंगी
तब जब पोपले से मुंह मे नकली बत्तीसियां होंगी
तब जब मेरे घुटनों में दौड़ने की ताकत ही न होगी
क्या तब मेरे सामने कुछ देर तुम अकेले बैठ पाओगी

जानता हूं तुम तब भी सारा वक्त किचन में बिताओगी
आखिर कब बताओगी तुम खुद से इतना घबराती क्यों हो





Sunday, January 3, 2016

...तो साबित करिए कि नोएडा सियासत का मगहर नहीं

बहुत पुरानी मान्यता है। काशी में मरोगे तो स्वर्ग जाओगे, मगहर में मरे तो आदमी अगले जनम में गधा बनता है। यह बात कबीर ने भी सुनी थी। उस वक्त काशी का यह हाल था कि देश भर के बुजुर्ग काशी में आकर इकट्ठे हो जाते थे और अपनी मृत्यु का इंतजार करते थे। मरकर सीधे स्वर्ग जाने की चाहत में। कबीर दास जी को जब लगा कि उनकी मृत्यु करीब है तो उन्होंने मगहर जाने का फैसला किया। उनके अनुयायी परेशान हो गए और उनसे पूछने लगे कि ऐसा क्यों? जवाब में कबीर दास जी ने कहा-
ज्यों काशी त्यों ऊसर मगहर राम बसै हिय मोरा
जो कबीर काशी मरै रामहिं कौन निहोरा
मतलब मैं जीवन भर राम का उपासक रहा। अब अगर मैं काशी में मरकर स्वर्ग जाता हूं तो फिर इसमें उनका क्या अहसान रहा। मैं तो मगहर में ही मरूंगा। अगर राम जी में सच्चाई और प्रताप होगा तो वहां मरकर भी मैं स्वर्ग ही जाऊंगा। यकीनन कबीर स्वर्ग ही गए होंगे। वह वाकई महान थे। उनका एक-एक दोहा ऐसा है, जिस पर शोध ग्रन्थ बन सकते हैं। मसलन मुझे उनका एक दोहा बहुत पसंद है-सज्जन से सज्जन मिलें होवें दो-दो बात, गहदा से गहदा मिलें खावें दो-दो लात। तो भइया अपनी कोशिश तो यही रहती है कि दूसरे किस्म के लोगों से जितना बच सको, बचो। लड़ाई में क्या रखा है। फिर भी मित्र हैं तो कभी-कभी नाराज हो ही जाते हैं। लात वात की नौबत तो नहीं आती पर बातों की मार होती है। ऐसे ही एक मित्र नोएडा में रहते हैं। उनकी नाराजगी यह है कि मैं दिल्ली तक जाता हूं पर उनके घर नहीं जाता। एक दिन गुस्सा गए और बोले कि तुम क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हो जो नोएडा नहीं आओगे? बड़ा सटीक पंच मारा था भाई ने। यूपी के मुख्यमंत्री अब वाकई नोएडा नहीं जाते। इस डर से कि वहां गए तो चुनाव हार जाएंगे। यह अंधविश्वास क्यों है? 
यह शोध का विषय है पर लोग बताते हैं कि चुनाव से पहले स्व़  वीर बहादुर सिंह नोएडा गए थे तो वह चुनाव हार गए। उसके बाद एनडी तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, मायावती और राजनाथ सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ था। तभी से यह मान लिया गया है कि मुख्यमंत्री रहते जो नेता नोएडा जाता है, वह चुनाव हार जाता है। यूपी में गांधी, नेहरू, लोहिया से लेकर अंबेडकर तक के विचारों पर चलने वाले मुख्यमंत्री हुए हैं। ज्यादातर टीचर थे और अभी वाले तो एनवायरमेंटल इंजीनियर हैं। सवाल उठता है आखिर यह अंधविश्वास क्यों? नोएडा मुख्यमंत्रियों के लिए अभिशप्त क्यों है? अभिशप्त है भी या किसी पोंगा पंडित की फैलाई हुई अफवाह से नेता डरे हुए हैं। वैसे नोएडा दूसरे कारणों से नेताओं के लिए जरूर खतरनाक रहा है। जैसे अभी यादव सिंह और जमीनों से जुड़े घोटालों को लेकर है। नोएडा इतना खतरनाक है कि मुख्यमंत्री वहां न भी जाएं तो भी हरवा देता है। मिसाल के तौर पर नोएडा के निठारी कांड में काफी बच्चों की हत्या हुई थी। देश-दुनिया में हल्ला मचा था फिर भी उस वक्त के मुख्यमंत्री खुद वहां नहीं गए। नोएडा न जाकर भी वह चुनाव हार गए। कबीर के दोहों की याद इसीलिए आ रही है क्योंकि अंधविश्वास अच्छी बात नहीं। यूपी में इस वक्त देश के सबसे युवा और पढ़े लिखे मुख्यमंत्री हैं। ऐसा हो सकता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वह अपनी व्यस्तता या संयोगवश नोएडा न गए हों। पर अब इतनी चर्चाओं के बाद उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह चुनाव से पहले नोएडा जाएं। यह साबित करने के लिए कि नोएडा सियासत का मगहर नहीं और वह खुद अंधविश्वासी नहीं। अगर उनकी सरकार अच्छा काम करेगी तो जनता उन्हें क्यों नहीं जिताएगी। उन्हें खुद पर भरोसा करना होगा। आखिर कबीर ने भी तो मगहर जाने का साहस अंधविश्वासों को खत्म करने के लिए ही किया था न। यह मौका अब यूपी के सीएम के पास है। वैसे बात खराब लग रही हो तो कबीरदास जी के ही इस दोहे के साथ बाय बाय-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय|