Saturday, January 16, 2016

लड़ोगे तो जीतोगे


न वो ज़हीर और न मैं मुन्ना भाई। पर सिचुएशन बिल्कुल वैसी ही। फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस के एक सीन जैसी। जिमी शेरगिल संजय दत्त से कहते हैं, 'भाई मुझे बचा लो, तुम्ही मुझे बचा सकते हो।' ...और मेरे सामने मेरे सबसे जूनियर साथियों में से एक था जो कह रहा था, 'सर मैंने कभी शराब नहीं पी, कभी सिगरेट नहीं पी तो फिर मुझे कैंसर क्यों? वह भी थर्ड स्टेज।' एकदम से झटका देने वाली बात थी। उसकी आंखों में आंसू थे और मेरी आंखें उसके सामने रहने तक उन्हें जज्ब किए हुए थीं। वह कह रहा था, 'मेरे जैसे सिर्फ पांच पर्सेंट मामलों में ही मरीज बचता है, मुझे टाटा कैंसर इंस्टिट्यूट मुंबई जाने को कहा गया है।' मेरे मन में यह सवाल था कि इस पांच पर्सेंट पॉजिटिविटी से 95 प्रतिशत डर और निराशा को कैसे जीता जाए?  मुझे अचानक याद आई एक मराठी मित्र शेखर देशमुख और उसके जज्बे की। उसे फोर्थ स्टेज का कैंसर था, वह बीमारियों से खूब लड़ा और आज उनसे जीत कर आराम की जिंदगी जी रहा है। उसकी हिम्मत को मैं हमेशा जोश मलीहाबादी के इस शेर के जज्बे जैसा ही समझता हूं-
वहाँ से है मिरी हिम्मत की इब्तिदा वल्लाह
जो इंतिहा है तिरे सब्र आज़माने की...
नौजवान साथी और उसकी तकलीफ को कुछ समय के लिए ब्रेक देते हैं। बात करते हैं शेखर देशमुख की। आज से करीब छह साल पहले सुबह दस बजे के करीब शेखर का मोबाइल पर मेसेज आया।
...आफ्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट प्रोसेज ऑफ न्यू सेल्स फार्मेशन कॉजेज फ्लक्चुएशन इन बीपी, वेट गेन-लॉस, टेरिबल वीकनेस, स्टमक डिसऑर्डर... कुड नॉट वॉक और सिट फॉर लास्ट 10 डेज, इट्स लाइक गोइंग टु बैक इनफैन्ट्स स्टेज़ बट फ्यू डेज़ बैक आई डिसाइडेड टु टुक फर्स्ट बेबी स्टेप विदआउट सपोर्ट... इट फील्स लाइक बिगनिंग ऑफ ए न्यू लाइफ...शेखर
लब्बोलुबाब यह कि उसकी हालत ठीक नहीं थी। कैंसर के इलाज के लिए किए गए स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद उसका शरीर एक शिशु की तरह हो गया था, जिसे हर हरकत के लिए सहारे की जरूरत थी। संदेश पढ़ते ही मैं समझ गया कि उसकी हालत ठीक नहीं है। मैंने फोन पर ही मेसेज करके ढांढस बंधाया और मदद के लिए पूछा। उसने साफ कहा कि मदद के लिए उसके संपादक हैं। वह कैंसर से लड़ेगा और जीतेगा। उसकी बात में दम था। इलाज के दौरान काफी दिक्कतें आईं। कभी पैसों की कमी, कभी असहनीय कमजोरी तो कभी पेट खराब। कभी ब्लड प्रेशर में उतार चढ़ाव तो कभी वजन में कमी पर वह लड़ा और लड़ता रहा। इस लड़ाई को जीतकर शेखर आज गर्व के साथ फिर से एक मराठी अखबार में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहा है। 
फिर से वापस आते हैं, अपने उस साथी पर जिसे हाल ही में थर्ड स्टेज कैंसर का पता चला। यकीनी तौर पर मैं अगर अपने उस साथी से यह कहता कि वह कैंसर से जीत सकता है तो शायद उसे लगता कि मैं नकली ढांढस बंधा रहा हूं। कुछ हद तक यह बात सही भी है। पर अगर उस पीड़ा से गुजरकर और जीतकर आने वाला शेखर जैसा शख्स यह कहे कि नहीं तुम्हारी पांच प्रतिशत संभावना तो काफी ज्यादा है। तुम तो सिर्फ 26 साल के हो, तुम्हारी रोगों से लड़ने की क्षमता तो काफी ज्यादा है। तुम तो आराम से कैंसर को हरा सकते हो क्योंकि मैं तो पैंतीस पार करने के बाद कैंसर से लड़ा हूं, तो इस बात के मायने होते हैं। इनमें दम होता है क्योंकि यह बात कैंसर से लड़ने और जीतने वाले शख्स ने कही है। शेखर ने दो रात पहले मेरी भी काउंसिलिंग की और मेरे कैंसर पीड़ित साथी की भी। यकीन मानिए शेखर की बातों ने मेरे उस साथी पर जादू सा असर डाला है। मेरा नौजवान साथी अब कैंसर से लड़ने को तैयार है और हम उसके जीतकर वापस आने पर फिर से उससे रिपोर्टिंग करवाने के लिए। सिर्फ हम ही क्यों, आप के बीच भी जो लोग ऐसी परेशानियों से लड़ रहे हैं, वे यकीन मानें कि अगर हिम्मत और जज्बे के साथ लड़ेंगे तो यकीनन जीतेंगे। बस खुद से मत हारिए। कुंवर नायारण की कविता की लाइन से बात खत्म-
कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नही। वही हारा जो लड़ा नहीं।