Saturday, January 30, 2016

यह तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ


एक-दो दिन पहले की ही बात है। बिहार में एक साहब बड़े नाराज थे। शिकायत थी कि मुख्यमंत्री ने शराब क्यों बंद कर दी? नीतीश कुमार दिख गए एक सभा करते हुए तो भाई ने जूता ही उठाकर दे मारा। पुलिस ने गिरफ्तार किया और नाम पूछा तो उन्होंने बताया पीके राय। घर वालों को शायद पूत के पांव पालने में ही नजर आ गए होंगे तो नाम भी सोच-समझ कर रखा। पी के उन्होंने जूता चलाया और शराबबंदी पर अपनी राय दे दी। यह खबर पढ़ते ही अजीज नाज़ा की मशहूर कव्वाली झूम बराबर झूम शराबी की याद आ गई। उनकी कव्वाली के बीच में दो लाइनें आती हैं-
इसकी बेटी ने चढ़ा रखी है सर पर दुनिया
यह तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ
अपन भी सोचने लगे कि वाकई अगर अंगूर को बेटा हो गया होता तो क्या होता। वैसे इधर लखनऊ या उत्तर प्रदेश में नेता लोग बिहार जैसी हिमाकत नहीं करते। अंगूर की बेटी से मोहब्बत करते हैं। यहां चुनाव से पहले शराबबंदी के नहीं बल्कि शाम की दवाई सस्ती कर देने के वादे होते हैं। जैसे नेता हैं, वैसे ही यहां के लोग भी हैं। बेहद संस्कारी हैं, घर 'बार' का पूरा ख़याल रखते हैं इसलिए ज्यादातर लोग अपने घर से दूर दूसरे के घरों के करीब या तो सड़क को 'बार' बना लेते हैं या फिर कार-ओ-बार चलाते हैं। कार-ओ-बार मतलब कार को चलते-फिरते बार में तब्दील कर देना। इस हद तक सफाई पसंद हैं कि बाहर की पी हुई को विसर्जित करने के लिए अपने घरों के टॉयलेट तक इस्तेमाल नहीं करते। उसके लिए कॉलोनियां या मोहल्ले हैं न। कॉलोनियों, मोहल्लों और स्कूल-मंदिरों के करीब खुले यह 'बार' लोगों को तरह तरह के रोजगार दे रहे हैं। मसलन पुलिस वाले जो कभी भी वेतन बढ़ोतरी की मांग नहीं करते। कभी कोई आंदोलन नहीं करते। इसका श्रेय सड़क पर चल रहे इन मयकदों को ही जाता है। कारों में या गलियों में नॉनवेज की प्लेट, खाली ग्लास, दालमोठ और पानी पहुंचाने वाले बेरोजगारों को तो रोजगार मिलता ही है, कबाड़ियों का कारोबार करने वाले भी शासन सत्ता को धन्यवाद देते हैं। सड़कों पर इस दारूराज की वजह से उनका धंधा काफी अच्छा चल रहा है। इनकी तरक्की का अंदाज आप इससे भी लगा सकते हैं कि मयखानों के बाहर अंडे का ठेला लगाने वाले आज देश के बड़े कारोबारियों में शुमार किए जाने लगे हैं।
और तो और। हिन्दी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले भी इन्हीं अड्डों के इर्द-गिर्द मंडराते हैं। यकीनन लखनऊ में फिल्म इंडस्ट्री का सपना आखिर ऐसे ही तो पूरा होगा। अभी कुछ दिन पहले की बात है। एक राइटर ने बताया कि उन्होंने तो लखनऊ के पत्रकारपुरम चौराहे के पास एक घर में एक कमरा सिर्फ इसीलिए किराए पर लिया है। बगल वाले घर में अंग्रेजी शराबखाना खुला है। कमरे से सटी खिड़की के बाहर रोजाना रात नौ से 12 बजे के बीच बेहतरीन संवाद अदायगी होती है। इन संवादों में माता-बहनों के सम्मान से लेकर घरों के बदलते संस्कारों का जो नज़ारा मिलता है, वह कहीं और मिल ही नहीं सकता। शराबखाने अपने इलाकों की रौनक को देर रात तक दिन जैसा बनाए रखते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए यह मयखाने इस बात का प्रमाण होते हैं कि भारत वास्तव में एक आजाद देश है। आखिर यहां से ज्यादा आजादी और कहां। आप कहीं भी, कभी भी खड़े होकर या बीच सड़क पर कार-ओ-बार से छककर पीजिए और घरों की दीवारों पर हल्के होइए। आखिर कौन रोकता है और किसको गरज पड़ी? यह अलग बात है कि राजधानी लखनऊ समेत यूपी के ज्यादातर शहरों में कानून-व्यवस्था को यही आजादी सबसे ज्यादा बिगाड़ती है। क्राइम की ज्यादातर वारदात सड़क पर खुले हुए इन मयखानों की वजह से ही होती हैं। सड़क पर चलने वाले मयखानों की वजह से कॉलोनियों और मोहल्लों में शरीफ लोगों का रात आठ बजे के बाद घरों से बाहर निकलना मुश्किल है। खैर पुलिस और प्रशासन के लिए यह छोटी-मोटी बात है। वह तो यह भी कह सकते हैं कि शुक्र करिए अंगूर को बेटा न हुआ। बाकी आम शहरियों को तकलीफ होती है तो उनकी तरफ से वसीम बरेलवी साहब का यह शेर और बात खत्म-
पी रहा हूँ कि पीना इन्हें अज़ाब नहीं,
ये मेरे अश्क हैं साकी! तेरी शराब नहीं