Sunday, December 27, 2015

मुकरी और नेतागीरी की ठुमरी


हाल ही में गांव से आए एक युवा से मुलाकात हुई। पूछने लगा कि डीडीसीए को लैपटॉप किराए पर कैसे दिए जाते हैं ? मैंने साफ कहा नहीं मालूम तो बेचारा मायूस हो गया। कहने लगा-अखबारों में पढ़ा कि दिल्ली क्रिकेट असोसिएशन वाले सोलह हजार रुपये रोज पर लैपटॉप किराए पर लेते हैं। मेरे दिमाग की भी अचानक बत्ती जली। फिर मन में सवाल उठा कि काले अंग्रेज कौन हैं? कुछ साल पहले अन्ना आंदोलन के दौरान यह नारा चला था कि काले अंग्रेजों भारत छोड़ो। हुआ यूं कि उस युवा से बातचीत से कुछ देर पहले ही इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के बारे में कुछ पढ़ रहा था तो नजर पड़ी भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की लिखी कुछ लाइनों पर। वहां लुटेरों के संदर्भ में अंग्रेजों का जिक्र था। उन्होंने लिखा था-

भीतर भीतर सब रस चुसै । हँसि हँसि का तन मन धन मूसै । 

जाहिर बातन मैं अति तेज । क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।

पढ़ते ही समझ में आ गया कि इशारा किस तरफ था। आज से डेढ़ सौ साल पहले यकीनी तौर पर अंग्रेजों की छवि हमारे देश में लुटेरों की थी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने जो लाइनें लिखी थीं, वह दो सहेलियों की बातचीत पर आधारित हैं। एक सहेली दूसरी से किसी ऐसे शख्स के बारे में बता रही है जो मीठी-मीठी बातें करने वाला धोखेबाज और धूर्त है। उस शख्स की तुलना अंग्रेज से की गई है। भारतेन्दु ने साहित्य की जिस विधा में यह लाइनें लिखी हैं उन्हें मुकरी कहते हैं। मुकरी को स्पष्ट करना जरूरी है। सबसे पहले यह बता दूं कि फिल्मी कॉमेडियन मुकरी से इस शब्द का कोई वास्ता नहीं। मुकरी का बड़ा साधारण सा मतलब है मुकर जाना। इस तरह के लेखन में भी यही होता है। चार लाइनों की इस रचना में पहली तीन लाइनों में कोई घटना या प्रसंग होता है। आखिरी लाइन में उसे खारिज करते हुए एक पहेली सी बुनती है। जैसा कि ऊपर दर्ज भारतेन्दु की लाइनों में नजर आती है-क्यों सखि सज्जन नहीं अंग्रेज ? तो घूम फिर कर अंग्रेज शब्द पर आते हैं और इसे मुकरी से जोड़ते हैं। साहित्यिक विधा मुकरी हो या आज की शासन सत्ता में बैठे लोग। मुकर जाना दोनों की प्रवृत्ति है। मुकरी मे आखिरी लाइन में मुकरा जाता है और सियासत में चुनावों या वादों के बाद। मिसाल के तौर पर खाऊंगा न खाने दूंगा जैसे सियासी नारे की दूसरी लाइन पहली लाइन को खारिज करती हुई पहेली पूछती दिखती है कि क्या वाकई में ?

 हर तरफ नारे वाले संदर्भ में लोग खाते-पीते नजर आ रहे रहे हैं। जिधर देखिए भारतेन्दु की मुकरी वाले अंग्रेज ही नजर आते हैं। जिन्हें अन्ना आंदोलन के वक्त काले अंग्रेज कहा गया। यानी आजादी से पहले जो काम अंग्रेज कर रहे थे, अब वही हमारे अपने बीच के जोशीले वादे करने वाले नेता कर रहे हैं। अब लैपटॉप का मामला ही ले लीजिए। यूपी सरकार ने जितने लड़के-लड़कियों को लैपटॉप दिए हैं, अगर उन सब ने दिल्ली क्रिकेट क्लब को किराए पर दे दिए होते तो सब के सब करोड़पति हो गए होते। थोड़ा सा तालमेल होता तो यूपी के मुख्यमंत्री सारी दुनिया में डंका पीट सकते थे कि उन्होंने तीन साल में यूपी के नौजवानों को करोड़पति बना दिया। पर नहीं, अंधा बांटे रेवड़ी तो अपने अपने को दे। सब दिल्ली वाले खा पचा गए। यहां बेचारे नौजवान यूट्यूब पर शॉर्ट फिल्में ही देखते रह गए। वैसे सही बताऊं-हर बार दिल करता है कि कुछ अच्छी अच्छी बातें लिखूं। मसलन बेरोजगारी दूर हो गई है, भ्रष्टाचार मिट गया है। जाम खत्म हो गया है, मुफ्त शिक्षा और इलाज मिल रहा है, रेलवे के टिकट सस्ते हो गए हैं, पेट्रोल डीजल तो नालियों में बह रहा है और हर गरीब की कटोरी में अरहर की दाल है पर हर बार कुछ न कुछ फ्रस्टेशन निकल ही आता है। जैसे इस बार भारतेन्दु की मुकरी और नेतागीरी की ठुमरी। पर अब और ज्यादा नहीं। अपने और आप जैसे लोगों के दिल की बात अदम गोंडवी की इन लाइनों के जरिए और बात खत्म-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है