Sunday, February 21, 2016

देखते कि मुल्क सारा यूं टशन में, थ्रिल में है


लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट। राइट-लेफ्ट, राइट-लेफ्ट। कोई दाएं भाग रहा है, कोई बाएं और सीधे चलने वालों का दिमाग चकरा रहा है। नैशनल बनाम एंटीनैशनल। झंडा बनाम डंडा। छीन कर लेंगे आजादी, फेंक कर देंगे आजादी। 250 रुपये में स्मार्ट फोन और 150 रुपये किलो दाल। अमां क्या है यह सब? हिन्दुस्तान की बरबादी के नारे लगाने वाले पलीता लगाकर चले गए और यहां अपने ही लोगों पर पटियाला कोर्ट में लात घूंसे चल रहे हैं। जिरह अदालत, सीधे फैसला। नेता, एंकर, वकील सब जज बने हुए हैं। खुद ही फैसला करे दे रहे हैं कि कौन देशद्रोही और कौन देशभक्त। देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि बस गदर के सनी दयोल की तरह हैंडपम्प ही नहीं उखाड़ा। जज साहब हैरान हैं, देश परेशान है। हर तरफ सवाल है कि भाई यह हो क्या रहा है? और इस झुंझलाहट के बीच याद रही हैं पीयूष मिश्रा की कुछ लाइनें-
इस मुल्क ने हर शख्स को एक काम सौंपा था
हर शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी
जिसे देखो वही माचिस जला रहा है। अब देखिए न। यूनिवर्सिटीज का काम है पढ़ना-पढ़ाना। वहां सियासत हो रही है। देश की मुर्दाबाद हो रही है। मीडिया का काम है सच दिखाना। पर सच क्या है, यह रिसर्च का विषय बनता जा रहा है। सच्चे विडियो, झूठे विडियो। बेचारी पब्लिक फर्क ही नहीं कर पा रही है। कौन सही और गलत कौन। किसको देखें, किसको छोड़ें। एजेंडे वालों के एजेंडे हैं पर बाकी तो नेक बंदे हैं। मीडिया हो या वकील, सियासत हो या बुद्धिजीवी। हर वह शख्स परेशान है, जिसका उद्धव से लेना है और माधव को देना। मुझे अच्छी तरह से याद है कि बचपन में जिस हज्जाम के यहां बाल कटाने जाता था, वहां एक छोटा सा बोर्ड मुझ में हमेशा एक जिज्ञासा पैदा करता। उस पर लिखा होता था-यहां पर मजहबी और सियासी गुफ्तगू करना मना है। कल रात सपने में अचानक फिर से वह बोर्ड नजर आया। अब सोच रहा हूं कि इस बोर्ड को देश में कहां-कहां टांगने की जरूरत है। बाल काटने वाले चचा वाकई कितने सयाने थे। उनमें इस देश और समाज के बारे में कितनी गहरी समझ थी। अब देखिए गजब हाल है कि नहीं। दिल्ली में बैठकर पाकिस्तान जिंदाबाद हो रहा है और हिन्दुस्तान का झंडा लेकर लोग अपनों को ही कूट रहे हैं।
हर वह शख्स जिसके हाथ में जिम्मेदारी है, उस पर गौर कीजिए। महंगाई, बेकारी, गरीबी और करप्शन पर कितनी जबरदस्त इंटलैक्चुअल बहसें करते हैं। जेएनयू में भी करते हैं और बीएचयू में भी करते हैं। पर यह बहसें वे लोग करते हैं, जिनके जीवन से सीधे उनका वास्ता नहीं। असल बहस तो हमारी कॉलोनी में नीम के पेड़ के नीचे होती है। दोपहर में घरों से कामकाज निपटाकर काम वाली बाइयों की गुफ्तगू होती है। इसमें सिर्फ साहब मेमसाहब के झगड़े और आस-पड़ोस की लगाई-बुझाई ही नहीं होती। देश की साठ से सत्तर फीसदी आबादी का सच भी सुनने को मिलता है। मसलन एक काम वाली बाई कह रही थी कि दाल तो अब महीने में एक-दो बार ही बनती है। वह पानी में बेसन डालकर कढ़ी उबालती है और उसमें खटाई डालकर बच्चों को खिला देती है। पैंसठ वाली दाल 250 तक पहुंची और अब 150 रुपये किलो पर आकर अटक गई है। लिहाजा यह तरीका निकाला है, उसने बच्चों के लिए रोटी-दाल का कॉम्बिनेशन बनाए रखने का। यह बहसें इंटलैक्चुअल्स के बीच नहीं, गरीब आबादी में हैं। पेट्रोल 110 डॉलर प्रति बैरल से उतरकर 25 डालर तक पहुंच गया पर उतना सस्ता नहीं हुआ। छोड़िए, महंगी चीजों की बातें। जय बोलिए यूपी सरकार की। चलिए जश्न मनाते हैं अंग्रेजी शराब के 25 पर्सेंट सस्ती होने का और गुनगुनाते हैं पीयूष मिश्रा की इन चार और लाइनों को-
रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां
देखते कि मुल्क सारा यूं टशन में थ्रिल में है
आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा

और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है