Saturday, February 27, 2016

लोग गाते-गाते चिल्लाने लगे हैं


कुछ दिन पहले की बात है। आधी रात के करीब एक पुराने दोस्त ने मेरी फेसबुक वॉल पर अपनी व्यथा चेप दी। चेप दी मतलब टैग कर दी। टैग कर दी सम्मानजनक भाषा है, पर अगर आप से कोई पूछे बिना मार्क जुकरबर्ग की ओर अलॉट किए गए आपके खेत में जुताई करे तो इसे चेपना कहते हैं। बेचारे अपने एक बहुत अजीज दोस्त के रवैये से परेशान थे। बहस के दौरान मामला गर्म होने पर दोस्त ने उन्हें ताकीद की थी कि ध्यान रखो-तुम मुसलमान हो और मैं ब्राह्मण। अब बरसों से दोस्त के साथ एक ही थाली में खाने वाला मुसलमान परेशान था कि बीस बरस की दोस्ती में आज यह याद दिलाने की नौबत क्यों आई? खैर इस मसले को यहीं छोड़ते हैं, बात इस हद तक पहुंची तो यकीनन दोनों की ही गलती होगी पर यह हाल सिर्फ मेरे दो दोस्तों का नहीं। इस तरह के टकराव सारे देश में नजर आ रहे हैं। ऐसे हालात पर दुष्यंत कुमार एक शेर याद आता है-
कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
जी हां, लोग आजकल वाकई चिल्लाने लगे हैं। संसद से लेकर सड़क और कंप्यूटर से लेकर मोबाइल तक। ऐसी चिल्ल-पों मची है कि समझ ही नहीं आ रहा। सही क्या और गलत कौन? अच्छी बात यह है कि लोग इस भड़ैती में असल दिक्कतें भूले हुए हैं। जगह जगह तिरंगे झंडे फहरा रहे हैं। भारत माता की जय कर रहे हैं। कुछ लोग नारे लगाकर आजादी ढूंढ रहे हैं। अक्सर मन में यह सवाल उठता था कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती क्या है? जवाब अब मिलने लगा है। कितनी भी परेशानियां हों, आम लोग हमेशा देशभक्त रहते हैं। आजाद हुए सरसठ साल हो गए। मसले वहीं के वहीं हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, भ्रष्टाचार और महंगाई। पर हम सबकुछ सह लेते हैं। यकीनन यह इस देश के नेताओं की महान योग्यता है कि वह अपने वोटरों की उम्मीद और ख्वाबों को कभी टूटने नहीं देते। नेताओं को वशीकरण मंत्र आता है। वह तिलिस्मी हैं। उनके जादू से क्या लोअर क्लास और क्या मिडिल। सब सम्मोहित नजर आते हैं।
इतिहास उठाकर देख लीजिए। जब कभी असल मुद्दों पर जनता का ध्यान जाना शुरू होता है, वैसे ही कोई भावुक मुद्दा अचानक बहस का विषय बन जाता है। नब्बे के दौर में आरक्षण और मंदिर मस्जिद विवाद था तो आजकल देशभक्ति बनाम देशद्रोह। नेता चाहे दून स्कूल का पढ़ा हो या चाय बेचकर कढ़ा हो। सबमें यह क्षमता होती है कि वह बड़े से बड़े पढ़े-लिखे वकील, टीचर, पत्रकार, मैनेजर और सरकारी आदमी को अपनी चॉइस के विषयों पर सोचने को मजबूर कर दे। जैसे कि आजकल नेताओं ने दुर्गा, महिषासुर, तिरंगा झंडा और देश विरोधी नारे जैसे मसले जनता को दिए हैं। नेताओं का हिप्नोटिज्म या सम्मोहन ऐसा है कि असल नुकसान और मुद्दे लोगों को दिखना ही बंद हो जाते हैं। अब पड़ोस के राज्य हरियाणा की हालत देखिए। तीन दिन में 28 लोग मार दिए गए, सैकड़ों घायल हुए, पैंतीस हजार करोड़ रुपये के करीब की प्रॉपर्टी फूंक दी गई। महिलाओं को गाड़ियों से खींच कर रेप किया गया। हजारों लोग जहां के तहां अटक गए। अस्पताल, स्कूल, बैंक और मॉल सब फूंक दिए। पक्ष और विपक्ष सब खामोश क्योंकि बवाल करने वाला समुदाय बहुत बड़ा वोटबैंक है। चूंकि यह नुकसान न तो वामपंथियों को खलता है और न दक्षिण पंथियों को। न बीजेपी, कांग्रेस, एसपी और बीएसपी को। इसलिए सब झंडों और डंडों के बीच उलझे हैं। कोई उपद्रवियों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग नहीं कर रहा। आखिर हम सब देशभक्त जो हैं, हमारा देश, हमारे लोग। हरियाणा में आग लगाने वाले कोई पाकिस्तान से थोड़े न आए थे। हमारे इस भोलेपन को नजर मख्मूर सईदी का यह शेर और बात खत्म-
हवा के दोश (कंधे) पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं
किसी झोंके से पूछेंगे कि है हमको किधर जाना