Sunday, February 14, 2016

ये प्यार वो प्यार


कैफी आजमी साहब ने लिखा है-
बस एक यही झिझक है हाले दिल सुनाने में, कि तेरा जिक्र भी आएगा इस फसाने में
बरस पड़ी थी जो रुख से नकाब उठाने में, वो चांदनी है अभी तक गरीबखाने में
दोस्तों वैलंटाइन-शैलंटाइन तो ठीक है। प्रपोज-डे, चॉकलेट-डे, रोज-डे और टैडी बियर-डे भी मनाते रहिए पर भाई इश्क की शिद्दत कम नहीं होनी चाहिए। वह इश्क जिसका जिक्र कैफी साहब की लाइनों में है। गुलज़ार के शब्दों में समझना हो तो वो वाला प्यार जिसमें चांद शाम को चोरी-चोरी, चुपके-चुपके खिड़की से दाखिल होकर जानिया से मिलता है।
यकीनन प्यार में वो तासीर आज भी होगी ही। हर युग में रही है। हां, फर्क हमेशा आता रहा है। पुराने जमाने में हमारे नानाओं ने नानियों को गांव के मेलों में चुपके से चूड़ा-गट्टा खिलाया था तो मम्मी-पापाओं ने मेफेयर में कॉलेज से बंक मारकर फिल्म देखी होगी। अपन के जमाने में भी रेजीडेन्सी से लेकर पिकनिक स्पॉट तक ऐसी कई जगहें थीं, जो प्यार करने वालों से गुलज़ार होने लगी थीं पर आज इश्क इंस्टेंट है। बेहद तेज। पहले के मुकाबले ज्यादा आसान, मिलनसार और सहनशील। एक बार मुखातिब होने के बाद काफी मामले तो मोबाइल पर वॉट्सऐप या फेसबुक चैट पर ही निपट जाते हैं। कुछ आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा नहीं था। हमारे एक दोस्ता का किस्सा है। नवासी-नब्बे की बात होगी। उन्हें अपनी ही बिरादरी की एक लड़की बहुत अच्छी लगती थी। रिश्तेदारों की शादी में अक्सर दिख जाती। बात करने की हिम्मत थी नहीं, जो कि उस दौर के ज्यादातर लड़के-लड़कियों में नहीं ही होती थी। जब भाई ज्यादा परेशान हो गए तो तय किया गया कि अच्छा सा ग्रीटिंग कार्ड देकर सीधे प्रपोज किया जाए।
मेरी नजर दोस्त की यामाहा आरएक्स 100 पर थी। लालच यह दिया गया कि अगर मैंने साथ दिया तो वह मुझे मोटरसाइकिल सिखा देगा। मुझे बड़ा आसान काम लगा पर यहीं चूक हो गई। दरअसल, उसके प्रपोजल का ग्रीटिंग कार्ड कोई मामूली कार्ड नहीं था। उसे बनाने में एक महीना लगा। हजरतगंज में यूनीवर्सल से लेकर जनपथ तक घूम घूमकर करीब 200 ग्रीटिंग कार्ड खरीदे। फिर कंप्यूटर पेपर का रोल खरीदा। पचास मीटर लम्बा। उसे कार्ड के साइज में फोल्ड करके खरीदे गए कार्डस की कटिंग करके उन्हें इस सलीके से चिपकाना था कि हर परत पर लिखे मजमून में भाई के जज्बात नजर आए। दिन-रात की मेहनत से वह बेहतरीन कार्ड तैयार हुआ। दोस्त के प्यार और मेरी मेहनत से सराबोर। फिर जाड़ों की एक कोहरे भरी सुबह को वह दिन आ ही गया। अमीनाबाद में महिला कॉलेज के सामने वाली कोचिंग के बाहर प्रपोज किया जाना था। तब तक अपन बाइक चलाना सीख चुके थे। बाइक पर आगे मैं और पीछे दोस्त। कन्या जैसे ही कोचिंग पहुंची, साहब एकदम से उसके सामने सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। कार्ड आगे बढ़ाया और कहा-यह आपके लिए है? उसके बाद सिर्फ एक जवाब मिला-बट व्हाय? और वह धड़धड़ाती हुई कोचिंग में दाखिल हो गई। तब तक मैं भी बाइक में किक मार चुका था। काहे से कि उस दौर में कोचिंग के लड़कों को सीपीएमटी में दाखिले की उतनी फिक्र नहीं होती थी, जितनी अपनी कोचिंग की लड़की की। लात, घूंसा या थप्पड़ कुछ भी मिल सकता था। किसी भी तरह की असहनशीलता से बचने के लिए हम खिसक लिए। महीनों के अरमान चंद सेकंड्स में टूट गए और बट व्हाय के जवाब वाला वह कार्ड बरसों तक रखा रहा।
खैर, वह गुजरे जमाने की बातें हैं। आजकल बढ़िया है। चिट्ठी-पत्री का झंझट ही नहीं। वॉट्सऐप पर इतने सारे स्माइली हैं कि आप एक स्माइली से प्रपोज कर सकते हैं और दूसरे से खारिज। अब खिड़कियों, छतों और छज्जों का झमेला ही नहीं। लाइव चैट कीजिए। पहले जैसे डॉयलाग भी नहीं है कि हम सिर्फ एक बार पैदा होते हैं, एक बार मरते हैं और प्यार भी एक बार ही करते हैं। अब सब कुछ बार-बार अपरम्पार और सबको स्वीकार है। फिर भी असल चीज तो प्यार है, जो रहनी ही चाहिए। गैजेट्स भले ही काफी आ गए हों, टेक्नॉलजी भले ही नई हो पर इश्क तो हर दौर में ऐसा ही रहा है। ऐसा न होता तो अहमद फराज़ साहब ये लाइनें लिखकर क्यों गए होते-
जिसको भी चाहा शिद्दत से चाहा है फराज़
सिलसिला टूटा नहीं दर्द की जंजीर का